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कोजागर पूजा व्रत कथा (Kojagara Puja Vrat Katha)

कोजागरा पूजा व्रत कथा

कोजागरा पूर्णिमा का व्रत और कथा सुनने से धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता लक्ष्मी, भगवान विष्णु और देवराज इंद्र की कृपा प्राप्त होती है. माना जाता है कि इस रात जागकर माता लक्ष्मी की पूजा करने से घर में सुख, समृद्धि और खुशहाली आती है. साथ ही आर्थिक संकट दूर होने, कर्ज से मुक्ति मिलने और नौकरी व कारोबार में उन्नति के योग बनते हैं.

कोजागर पूजा व्रत कथा
कोजागर पूजा व्रत कथा

कोजागरा व्रत को लेकर भी विभिन्न क्षेत्रों में कई कथाएं प्रचलित हैं. इनमें से जो सबसे प्रचलित कथा हैं, हम आपको उसके बारे में बताते हैं. प्राचीन काल में एक साहूकार था. जिसकी दो बेटियां थी, उनकी माता लक्ष्मी बड़ी आस्था थी और दोनों ही पूर्णिमा का उपवास रखती थी. साहूकार की बड़ी बेटी इस व्रत को पूरा करती थी, और पूरे विधि विधान से संपन्न करती थी. लेकिन, उसकी छोटी बेटी अज्ञानतावश व्रत को अधूरा छोड़ देती थी. व्रत को अधूरा छोड़ने के कारण देवी लक्ष्मी उससे रुष्ट हो गई. जिससे साहूकार की छोटी बेटी के पुत्रों की मृत्यु होने लगी. जब भी वह किसी बच्चे को जन्म देती, उसके कुछ ही देर बाद उसके बेटे की मृत्यु हो जाती थी. साहूकार की छोटी बेटी इससे काफी परेशान हो गई, और उसने एक ऋषि को अपनी इस परेशानी के बारे में बताया. ऋषि साहूकार की छोटी बेटी को देखकर सारा माजरा समझ गए थे. उन्हें साहूकार की छोटी बेटी को उसकी गलती के बारे में बताया कि वह पूर्णिमा के व्रत को अधूरा छोड़ देती है, और पूर्ण विधिविधान से उस व्रत को नहीं करती है. उन्होंने साहूकार की बेटी को कहा कि अगर तुम पूर्णिमा का व्रत विधिपूर्वक पूर्ण करती हो, तो तुम्हारी संतान जीवित रह सकती है.

 

ऋषि की सलाह के बारे उसने पूर्णिना का व्रत विधिविधान से पूरा किया. जिसके फलस्वरूप उसे संतान की प्राप्ति हुई, लेकिन कुछ दिनों बाद उसकी भी मौत हो गई. वह परेशान हो गई, तब उसे अपनी बड़ी बहन की याद आई. उसने लड़के को एक छोटी चौकी के आकार का लकड़ी पर लेटा दिया, और उस पर कपड़ा ढंक दिया. उसके बाद वह अपनी बड़ी बहन को बुलाकर लाई, और बहन को उसी पर बैठने का इशारा किया. बड़ी बहन इस बात से अंजान थी कि वहां पर उस बच्चे की लाश पड़ी हुई है. वह जैसे ही उसे पीढ़ा पर बैठने लगी, उसका लहंगा बच्चे को छू गया और बच्चा अचानक से जीवित हो उठा और रोने लगा. यह माजरा देख बड़ी बहन ने फटकार लगाते हुए कहा कि तू मुझे कलंक लगाना चाहती थी, मेरे बैठने से यह मर जाता. बड़ी बहन की बात सुनकर छोटी बहन ने विनम्र भाव से कहा कि यह पहले ही मर चुका था. तेरे तप और पुण्य से ही यह जीवित हुआ है. तुझ पर माता लक्ष्मी की असीम कृपा है. इस घटना के बाद साहूकार ने नगर में पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया. तभी से इस दिन को उत्सव के रूप में मनाया जाता है, देवी लक्ष्मी की पूजा की जाने लगी.

 

लक्ष्मी जी की आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता

मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निशिदिन सेवत,हरि विष्णु विधाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥
उमा, रमा, ब्रह्माणी,तुम ही जग-माता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत,नारद ऋषि गाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥
दुर्गा रुप निरंजनी,सुख सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत,ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम पाताल-निवासिनि,तुम ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी,भवनिधि की त्राता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥
जिस घर में तुम रहतीं,सब सद्गुण आता।
सब सम्भव हो जाता,मन नहीं घबराता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥
तुम बिन यज्ञ न होते,वस्त्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव,सब तुमसे आता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥
शुभ-गुण मन्दिर सुन्दर,क्षीरोदधि-जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन,कोई नहीं पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥
महालक्ष्मी जी की आरती,जो कोई जन गाता।
उर आनन्द समाता,पाप उतर जाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता॥

-----समाप्त-----

समाप्त

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