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देवियों में त्रिपुर सुंदरी हैं सबसे बड़ी तो महाविद्या में पहले नंबर पर क्यों आती हैं महाकाली?

दस महाविद्या में देवी महाकाली को प्रथम स्थान प्राप्त है जबकि देवी त्रिपुरसुंदरी तीसरे स्थान पर हैं. महाकाली का कालरात्रि स्वरूप भयंकर है और वे त्रिपुरसुंदरी का पहला प्रकट रूप हैं। देवी तारा दूसरे स्थान पर हैं, जो अंधेरी रात में उम्मीद की किरण हैं.

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ऋग्वेद में रात्रि को भी देवी मानी गया है, जिन्हें कई विद्वान देवी काली से जोड़ते हैं
ऋग्वेद में रात्रि को भी देवी मानी गया है, जिन्हें कई विद्वान देवी काली से जोड़ते हैं

चैत्र नवरात्रि में हम हर दिन जिन अलग-अलग देवियों की पूजा करते हैं, उनमें देवी काली को छोड़ दें तो बाकी सभी सौम्य व्यवहार वाली देवियां हैं. देवी पूजा और परंपरा में उनको जानने का रहस्य और भी गहरा है. देवी का सबसे बड़ा रहस्य उनका दस महाविद्या स्वरूप है जिनके नाम इन नौ रूपों से बिल्कुल अलग हैं. पिछले भाग (न दुर्गा न काली... देवियों में सबसे बड़ी और पहली देवी कौन हैं?) में आपने जाना कि देवी त्रिपुर सुंदरी सभी देवियों में सबसे प्रमुख देवी हैं. 

पहले पर क्यों नहीं है देवी त्रिपुर सुंदरी?
दस महाविद्या में उनका नाम तीसरे स्थान पर आता है. पहले स्थान पर देवी काली का नाम आता है. महाकाली पहली महाविद्या हैं. इस लिहाज से उन्हें सबसे पहली और बड़ी देवी होना चाहिए था.  सवाल उठता है कि सबसे मुख्य देवी होने के बावजूद देवी त्रिपुर सुंदरी तीसरे स्थान पर क्यों आती हैं. पहले पर क्यों नहीं?

महाकाली का अंधेरी रात से कनेक्शन
असल में सभी देवियां, देवी त्रिपुर सुंदरी का ही अंश हैं. देवी महाकाली उनका सबसे पहला और प्रकट हुआ दिव्य स्वरूप हैं. जब सूरज ढलता है और रात का अंधेरा छा जाता है तो वह देवी काली का ही काल स्वरूप होता है. ऋग्वेद में रात्रि सूक्त लिखा मिलता है. जहां रात को भी एक देवी माना गया है. विद्वान भी महाकाली को रात्रि और निशा देवी कहते हैं. इसीलिए प्रथम विद्या महाकाली का एक नाम कालरात्रि भी है. जिसमें उनका स्वरूप भयंकर काली रात की तरह है. 

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दस महाविद्या में पहली हैं महाकाली
देवी के अंश से सबसे पहले प्रकट होने के कारण ही महाकाली पहले स्थान पर आती हैं, लेकिन वह मुख्य देवी नहीं हैं. दूसरे नंबर पर आती हैं देवी तारा. जो नक्षत्र और तारों की चमक में हैं. यानी जब अंधेरी रात छा जाती है तब उसके प्रभाव को कम करने के लिए और उम्मीद की एक रोशनी के रूप में देवी त्रिपुर सुंदरी के अंश से देवी तारा की उत्पत्ति होती है. फिर देवी खुद को अपने मूल सात्विक स्वरूप में प्रकट करती हैं. इसलिए देवी त्रिपुर सुंदरी तीसरे स्थान पर आती हैं और पहली शक्ति महाकाली बन जाती हैं.

कठिन है त्रिपुर सुंदरी देवी की नियमित साधना
एक और व्यवहारिक वजह ये है कि, त्रिपुर सुंदरी, काली या दुर्गा की तरह लोकप्रिय नहीं हैं, क्योंकि उनकी उपासना के लिए गहरी परिपक्वता और समझ की जरूरत होती है. काली की महाविद्या रूप में साधना भी उतनी ही समर्पण और परिपक्वता मांगती है, जितनी त्रिपुरा सुंदरी या किसी भी महाविद्या की साधना में जरूरी होती है.  अधिकांश लोग काली की पूजा वैदिक या सामान्य तरीके से करते हैं, न कि महाविद्या परंपरा के अनुसार, यही कारण है कि वह अधिक लोकप्रिय हैं. इसी के साथ त्रिपुरसुंदरी सर्वोच्च इसलिए हैं, क्योंकि वह खुद अपने भक्तों का चयन करती हैं.

त्रिपुरसुंदरी उन्हीं साधकों को आकर्षित करती हैं और अपने उपासक बनने की अनुमति देती हैं, जिनमें उनके प्रति सच्ची साधना की इच्छा होती है. इसलिए स्वाभाविक रूप से उनके मानदंड और चयन के मानक बहुत ऊंचे होते हैं. इसीलिए सिर्फ काली के रूप में महाकाली लोक में अधिक पूजी जाती हैं, लेकिन त्रिपुर सुंदरी की सिर्फ खास साधना के दौरान ही पूजा की जा सकती है. 

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दस महाविद्या के नाम और अर्थ

मां काली : समय की देवी, जो अहंकार और अज्ञान का नाश करती हैं.
मां तारा : चेतना की देवी, जो भवसागर से तारने वाली हैं.
मां षोडशी/त्रिपुर सुंदरी : सौंदर्य, सुख और पूर्णता की देवी.

मां भुवनेश्वरी : विश्व की स्वामिनी जो ब्रह्मांड का आधार हैं.
मां भैरवी : विनाश और विनाशकारी ऊर्जा (शक्ति) का रूप.
मां छिन्नमस्ता : आत्म-बलिदान और कुंडलिनी जागरण की प्रतीक, जो स्व-मस्तक काटती हैं.

मां धूमावती : दरिद्रता और दुखों को हरने वाली, जो विधवा या वृद्ध रूप में जानी जाती हैं (अशुभ का नाश करने वाली).
मां बगलामुखी : शत्रुओं का नाश और वाक्-शक्ति प्रदान करने वाली (स्तंभन विद्या).
मां मातंगी : ज्ञान और वाणी (सरस्वती रूप) की देवी, जो कला और संगीत की अधिष्ठात्री हैं.
मां कमला : समृद्धि, धन, और सौभाग्य की देवी (लक्ष्मी रूप).

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