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न दुर्गा न काली... देवियों में सबसे बड़ी और पहली देवी कौन हैं?

चैत्र नवरात्र के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा की जाती है, जो तप और ब्रह्मचर्य का प्रतीक हैं. देवी त्रिपुरसुंदरी को सभी देवियों में सर्वोच्च माना जाता है, जिनसे ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई.

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देवी त्रिपुर सुंदरी को पुराणों में सबसे प्रमुख और प्रधान देवी बताया गया है
देवी त्रिपुर सुंदरी को पुराणों में सबसे प्रमुख और प्रधान देवी बताया गया है

चैत्र नवरात्र का समय जारी है. देवी पूजा का दूसरा दिन है, जिसमें उनके ब्रह्नमचारिणी स्वरूप की पूजा की जाती है. देवी का यह रूप एक तपस्विनी का है. जिसमें वह ब्रह्नचर्य और तप का महत्व बताती हैं. जब हम नवरात्र के नौ दिनों के अर्थ को समझने की कोशिश करते हैं तो देवियों के कई नाम और कई रूप मिलते हैं. फिर यह भी जिक्र मिलता है कि सभी देवियां एक ही शक्ति के अलग-अलग नाम हैं. 

देवियों के नाम को लेकर कन्फ्यूजन!
ये सभी अलग-अलग नाम देवियों के अपने कार्यों और उनकी खास पहचान से जुड़े हुए हैं. जैसे हम एक नाम देवी दुर्गा को लेते हैं. जब देवी ने दुर्गम नाम के एक असुर का वध किया तो उनका नाम दुर्गा पड़ा. सवाल उठता है कि असुर का वध करने से पहले उनका नाम क्या था? ये सवाल और बड़ा होते हुए कन्फ्यूजन तक पहुंच जाता है कि आखिर सबसे बड़ी और पहली देवी कौन हैं?

क्या कहते हैं पौराणिक ग्रंथ?
इस सवाल का जवाब शाक्त परंपराओं के ग्रंथों और पुराणों से मिलता है. मार्कंडेय पुराण में जिक्र मिलता है कि सभी देवियों में सबसे बड़ी और मुख्य देवी आद्या हैं. देवी का नाम आद्या इसलिए है क्योंकि वह शुरुआत का प्रतीक हैं और जब ब्रह्मांड का निर्माण उन्हीं की शक्ति से हुआ है. यही आद्या शक्ति माया कहलाती हैं. देवी भागवत पुराण में यही माया भगवान विष्णु के मस्तक में निवास करती हैं और उनकी योगिनी शक्ति योगमाया बन जाती हैं.  

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त्रिपुर सुंदरी देवी कौन हैं?
लेकिन, असल में भगवान विष्णु, शिव और ब्रह्मा की भी उत्पत्ति जिस शक्ति से हुई है, उनका नाम त्रिपुर सुंदरी है. देवी त्रिपुर सुंदरी तीनों लोकों की प्रधान देवी हैं. वही सभी देवियों में मुख्य हैं और सबसे बड़ी हैं. उनकी ही प्रेरणा से प्रलय के बाद भगवान विष्णु, फिर उनके नाभि कमल से ब्रह्मा जी और उसी कमल के आधार से महादेव शिव उत्पत्ति होती है. 

कैसा है देवी का स्वरूप?
देवी त्रिपुर सुंदरी को त्रिपुर भैरवी भी कहा जाता है. इन्हीं देवी को प्रधान परमेश्वरी भी कहा गया है और जब वह अपने सामान्य स्वरूप में होती हैं तब वह देवी ललिता कहलाती हैं. देवी ललिता का स्वरूप बहुत सुंदर है. वह किशोरी अवस्था यानी 16 वर्ष की कन्या की तरह हैं. उनके 18 हाथ हैं. उनका अस्त्र इक्षुदंड है जो गन्ने का बना धनुष है. उनके दाएं कंधे पर तोता बैठता है, जो कामनाओं का प्रतीक है. 

देवी का स्वरूप बहुत दिव्य और प्रतीकात्मक है. वे श्रीचक्र (श्रीयंत्र) पर विराजमान रहती हैं. सामान्य स्वरूप में उनके चार हाथ होते हैं, जिनमें, पाश (आसक्ति), अंकुश (नियंत्रण), गन्ने का धनुष (मन) और पांच बाण (इंद्रियां) शामिल हैं. यह बताता है कि वे मन, इंद्रियों और इच्छाओं पर नियंत्रण की शक्ति हैं.

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दस महाविद्या में तीसरे स्थान पर आती हैं प्रथम देवी
देवी दशमहाविद्या में त्रिपुर सुंदरी (शोडशी) तीसरे स्थान पर आती हैं. इन्हें शोडशी भी कहा जाता है, क्योंकि यह (16 कलाओं से पूर्ण हैं). यह रूप सौंदर्य, ज्ञान और आध्यात्मिक आनंद का प्रतीक है. देवी ललिता की उपासना श्रीविद्या में की जाती है. यह रहस्यभरी और उच्च साधना मानी जाती है. इसमें श्रीचक्र की पूजा प्रमुख होती है. साधक इसे मोक्ष और आत्मबोध का मार्ग मानते हैं. देवी ललिता त्रिपुर सुंदरी केवल एक देवी नहीं, बल्कि, चेतना (Consciousness), आनंद (Bliss) और ब्रह्मांड की मूल ऊर्जा (Cosmic Energy) का प्रतीक हैं.

देवी पूजा के सभी स्वरूप इसी देवी से निकले हैं. देवी के विराट स्वरूप में जो 18 हाथ हैं, वह उनके दाएं और बाएं भाग में बंटे हुए हैं. जिनसे सौम्य और उग्र दोनों गुणों वाली देवियों की उत्पत्ति हुई है. 
 

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