माघ मेला में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुआ विवाद अभी भी चर्चा का विषय बना हुआ है. इसमें ये सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि क्या स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद वाकई शंकराचार्य हैं? इन सवालों की परतों को एक-एक करके उठाएं तो शंकराचार्य की परंपरा के बहुत से रहस्य सामने आते हैं. इनमें ही एक रहस्य है 'मठाम्नाय' या मठ अनुशासन. मठाम्नाय को एक किताब समझिए, जिसमें शंकराचार्य पद से जुड़े नियम और मठों-पीठों के अनुशासन दर्ज हैं. देश के चारों कोनों में बने मठों के लिए 'मठाम्नाय' एक तरीके से उनके अपने एक संविधान की तरह है, जिसे खुद आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में लिखा था.
आदि शंकराचार्य ने ही की थी रचना
शंकराचार्यों की नियुक्ति, योग्यता और भूमिका को समझने का सबसे प्रामाणिक और जरूरी सोर्स है 'मठाम्नाय अनुशासन'. मठाम्नाय (मठ और आम्नाय) आदि शंकराचार्य की ही लिखी एक रचना है, जो उनके द्वारा स्थापित चार प्रमुख मठों (शारदा, गोवर्धन, द्वारका, शृंगेरी) के नियम और सिद्धांतों का वर्णन करती है, जिसे 'महानुशासन' भी कहते हैं और यह मठों के अनुशासन और कार्यप्रणाली के लिए एक मार्गदर्शक है, जिसमें विद्वानों और पीठाधीश्वरों के कर्तव्य बताए गए हैं.
मठों की परंपरा और व्यवस्था का है जिक्र
मठाम्नाय का अर्थ है 'मठों के आम्नाय यानी परंपरा और नियम' यह रचना मठों की व्यवस्था, उनके सिद्धांत, और पीठाधीश्वरों के आचरण और विद्वानों की जिम्मेदारियों को स्पष्ट करता है. इसके लगभग 73 श्लोकों में मठों की जरूरी परंपरा के विधान हैं, जिसे 'महानुशासन' या 'मठाम्नाय महासेतुः' भी कहा जाता है. यह ग्रंथ मठों के पदानुक्रम और उनके संचालन के लिए वैदिक परंपराओं का पालन तय करता है, और गैर-मान्यता प्राप्त पीठाधीश्वरों के दावों को खारिज करता है. तो शंकराचार्यों की नियुक्ति, उनका बनना और उनका चयन-चुनाव इसी लिखी हुई परंपरा के आधार पर होता है.
सनातन परंपरा में शंकराचार्य केवल किसी मठ के प्रमुख नहीं होते, बल्कि वे आदि शंकराचार्य की बनाई गई दार्शनिक परंपरा के जीवित प्रतिनिधि माने जाते हैं. यह पद ज्ञान, त्याग, तप, शास्त्रबोध और गुरु–शिष्य परंपरा का मिला-जुला रूप है. शंकराचार्य बनने की प्रक्रिया न तो चुनाव से तय होती है, न किसी सरकार की नियुक्ति से. यह एक विशुद्ध धार्मिक और परंपरागत प्रक्रिया है, जिसकी जड़ें वेद, उपनिषद, संन्यास परंपरा और मठीय अनुशासन में गहराई तक जाती हैं.
आदि शंकराचार्य से शंकराचार्य परंपरा की शुरुआत
आदि शंकराचार्य (लगभग 788–820 ई.) को खो चुके अद्वैत वेदांत को समाज में फिर से स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है. माधवीय शंकरविजय और अनंतानंद गिरी के लिखे हुए शंकरविजय और चिद्विलासीय शंकरविजय जैसे ग्रंथों में आदि शंकराचार्य का उल्लेख मिलता है कि उन्होंने पूरे भारत में भ्रमण कर वेदांत दर्शन की स्थापना की. इसी उद्देश्य से उन्होंने चार दिशाओं में चार आम्नाय पीठों की स्थापित किया था.आज यही चार पीठ भारत में सनातन के चार मठ कहलाते हैं.