आषाढ़ मास की अमावस्या आने वाली है. यह तिथि सनातन परंपरा में पितरों के स्मरण, स्नान, दान और तर्पण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है. मान्यताओं के अनुसार इस दिन किए गए पितृ कर्म, दान-पुण्य और विशेष उपाय पूर्वजों की कृपा दिलाते हैं और जीवन की कई बाधाओं को दूर भी करते हैं. आइए जानते हैं कि आषाढ़ अमावस्या का शुभ समय, महत्व, पूजा विधि और इस दिन किए जाने वाले प्रमुख उपाय कौन से हैं.
कब मनाई जाएगी आषाढ़ अमावस्या?
पंचांग के अनुसार अमावस्या तिथि की शुरुआत 13 जुलाई 2026 को शाम 6 बजकर 50 मिनट पर होगी और इसका समापन 14 जुलाई को दोपहर 3 बजकर 14 मिनट पर होगा. उदया तिथि के आधार पर 14 जुलाई को ही आषाढ़ अमावस्या का व्रत, स्नान, दान और पितृ तर्पण करना शुभ माना जाएगा.
शुभ मुहूर्त
स्नान-दान का मुहूर्त (ब्रह्म मुहूर्त)- सुबह 4 बजकर 11 मिनट से सुबह 4 बजकर 52 मिनट तक
पितृ पूजा का समय (अभिजीत मुहूर्त)- दोपहर 12 बजे से लेकर दोपहर 12 बजकर 55 मिनट तक
संध्या काल पूजा मुहूर्त- शाम 7 बजकर 21 मिनट से रात 8 बजकर 22 मिनट तक
पितरों की शांति के लिए क्या उपाय करें?
आषाढ़ अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ को जल अर्पित कर पूजा आरंभ करें करें. तिल के तेल का दीपक जलाकर पितरों का स्मरण करें. काले तिल से पितरों का तर्पण करें. संभव हो तो पिंडदान और श्राद्ध कर्म करें. इसके बाद गरीबों को अन्न, वस्त्र और फल का दान दें. गाय को हरा चारा खिलाएं. शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव की पूजा करें और पितरों के कल्याण की प्रार्थना करें.
पूजा विधि
आषाढ़ अमावस्या पर ब्रह्म मुहूर्त में उठकर किसी पवित्र नदी, सरोवर या कुंड में स्नान करें. यदि यह संभव न हो तो घर में स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें. इसके बाद तांबे के पात्र में जल, लाल पुष्प और चंदन मिलाकर सूर्यदेव को अर्घ्य दें. इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके जल, काले तिल, कुश और पुष्प के साथ पितरों का तर्पण करें. अपनी श्रद्धा के अनुसार ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न, वस्त्र, फल या छाता दान करें. शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना भी शुभ माना गया है.