भगवान श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है. उनकी सामान्य छवि में वह एक वनवासी की तरह दिखते हैं. उन्होंने केसरिया (वल्कल) वस्त्र पहन रखे हैं और जटा-जूट बनाए हुए हैं. इसके साथ ही उनके हाथ में एक धनुष और कंधे पर तरकश (जिसमें) कुछ तीर हैं, दिखाई देता हैं. श्रीराम की यह छवि वनवासी योद्धा की है. लेकिन अगर वह योद्धा हैं तो क्या उनके पास केवल तीर-धनुष ही है?
नहीं श्रीराम के पास कई दिव्य अस्त्र हैं. हालांकि कहानियों में जिस तरह का जिक्र होता है, उन्होंने बहुत अधिक अस्त्रों-शस्त्रों का उपयोग नहीं किया है. जिस तरह महाभारत में श्रीकृष्ण के पास दिव्य रथ, चक्र, गदा, शंख, पाश और तलवार दिखाई देते हैं और उनके नामों का भी जिक्र मिल जाता है, ऐसा जिक्र श्रीराम के साथ नहीं मिलता है. लेकिन ये सच है कि भगवान श्रीराम के पास भी एक से बढ़कर एक हथियार, अस्त्र-शस्त्र थे. जिनमें से उन्होंने कुछ महर्षि वशिष्ठ ने दिए थे. बहुत सारे अस्त्र और शस्त्र उनके गुरु महर्षि विश्वामित्र ने दिए थे तो वहीं ऋषि अगस्त्य ने भी उन्हें कई दिव्यास्त्र दिए थे. भगवान परशुराम, जो खुद भी विष्णु के ही अवतारी थे, उन्होंने भी श्रीराम को एक धनुष और बाण दिया था.
श्रीराम के पास क्या-क्या अस्त्र-शस्त्र और दिव्य वस्तुएं थीं, इन पर डालते हैं एक नजर-
रामायण की कथा में जब महर्षि विश्वामित्र महाराज दशरथ से श्रीराम और लक्ष्मण को मांग कर ले जाते हैं तो ताड़का वध से पहले और उसके बाद वे श्रीराम को कई प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और विद्याएं प्रदान करते हैं. इसका वर्णन वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के 22वें और 27वें सर्ग में किया गया है.
महर्षि विश्वामित्र ने दिए थे दिव्य अस्त्र
विश्वामित्र के आश्रम सिद्धाश्रम जाने के रास्ते में ही श्रीराम ने ताड़का का वध कर दिया था. ताड़का का वध एक तरीके से उनकी परीक्षा थी. इस दौरान उन्होंने एक बहुत ही सामान्य तीर से ताड़का का वध कर दिया था. लेकिन श्रीराम को आगे जो उद्देश्य पूरे करने थे, इसके लिए उन्हें दिव्य विद्या और दिव्य अस्त्रों की जरूरत पड़ने वाली थी.
इसलिए सबसे पहले विश्वामित्र श्रीराम को बला और अतिबला नाम की विद्याएं सिखाते हैं. इन विद्याओं के कारण दोनों भाइयों को कभी कष्ट या थकान का अनुभव नहीं होगा, उन्होंने कहा- तुम पर कोई सोते हुए भी प्रहार नहीं कर पायेगा. तुम्हें कभी भूख-प्यास नहीं लगेगी क्यूंकि ये दोनों विद्याएं परमपिता ब्रह्मा की पुत्रियां हैं. कहा जाता है कि बला और अतिबला के कारण ही लक्ष्मण 14 वर्षों तक निराहार रह सके और उन्होंने नींद भी नहीं ली थी.

श्रीराम के पास थे पांच चक्र
महर्षि विश्वामित्र ने श्रीराम को पांच दिव्य चक्र दिए थे. यह दण्डचक्र, धर्मचक्र, कालचक्र, विष्णुचक्र और ऐन्द्रचक्र थे. श्रीराम को ब्रह्मशीर और ब्रह्मास्त्र दोनों का ज्ञान था. महादेव का त्रिशूल भी उन्हें मिला था. देवराज इंद्र का वज्र भी श्रीराम के पास था. श्रीराम ने गदा युद्ध का अभ्यास भी किया था. शिखरी और मोदकी उनकी गदाएं हैं. भगवान विष्णु का नारायण अस्त्र भी उन्हें विश्वामित्र से ही मिला था.
नंदन नाम की तलवार रखते थे श्रीराम
भगवान विष्णु की तलवार का नाम नंदन है. यह नंदन तलवार वरदान में विद्याधर नाम के एक यक्ष को मिली थी. इसी यक्ष ने यही तलवार श्रीराम के लिए भेंट की थी.तीन दिव्य पाश - धर्मपाश, कालपाश और वरुणपाश भी श्रीराम के पास थे. अग्निदेव ने अपना आग्नेयास्त्र, वायु ने वायव्यास्त्र, गंधर्वों ने सम्मोहनास्त्र, प्रस्वापन, प्रशमन और सौम्य अस्त्र श्रीराम को दिया था.
कामदेव, सूर्यदेव और सोम ने भी दिए थे अपने अस्त्र
कामदेव ने उन्हें मदन अस्त्र भी दिया था. सूर्यदेव का अस्त्र तेजःप्रभ, सोम देवता का अस्त्र - शिशिर, त्वष्टा (विश्वकर्मा) का महान अस्त्र - दारुण और प्रजापति मनु का शीतेषु नामक अस्त्र भी श्रीराम के पास था.
कोदंड, सारंग और विजय धनुष
श्रीराम के पास कोदंड और विजय नाम के दो धनुष भी थे. कोदंड के कारण ही श्रीराम को कोदंडाधिकारी कहा जाता है. सीता स्वयंवर में क्रोधित हुए परशुराम ने श्रीराम को सारंग धनुष दिया था. सारंग धनुष विष्णु का ही है, जो वृष्णिवंशियों के पास धरोहर के रूप में रहा है. इसीलिए श्रीकृष्ण के भी धनुष का नाम सारंग था.
सूर्यदेव ने दिया था अक्षय तरकश
रावण से युद्ध से पहले सूर्यदेव ने दो अक्षय तूणीर( तरकश) भी श्रीराम को दिया था. महर्षि अगस्त्य ने भी उन्हें एक तरकश दिया था, जो दिव्य तीरों से भरा था. महर्षि अगस्त्य ने श्रीराम आदित्य हृदय स्त्रोत का ज्ञान दिया था. यह स्त्रोत अपने आप में ही एक कवच था और शत्रुओं के लिए अस्त्र बन जाता था. इसे श्रीराम ने रावण वध से पहले सिद्ध किया था.
इंद्र ने युद्ध में दिया था रथ और सारथि
रावण के साथ युद्ध के अंतिम चरण में देवराज इंद्र ने श्रीराम को अपना दिव्य रथ (स्वर्णाभ रथ) भेजा था. यह रथ अत्यंत तेजस्वी, स्वर्णिम और देव-शिल्पी द्वारा निर्मित था. इंद्र ने अपने सारथी मातली को इस रथ के साथ भेजा था, जो युद्ध में श्रीराम का सारथी बना था.