चैत्र पूर्णिमा को हनुमान जयंती का उत्सव मनाया जाता है. माना जाता है कि इस दिन वानर राज केसरी और अंजना माता के पुत्र के रूप में हनुमानजी का जन्म हुआ था. अपनी रामभक्ति के लिए प्रसिद्ध, बल के साथ-साथ बुद्धि और विद्या देने वाले हनुमान जी को कलयुग के जागृत देवता के रूप में देखा जाता है. ऐसी मान्यता एक लोककथा से आती है,जिसमें श्रीराम जी ने उन्हें कलयुग में लोगों के संकट हरने के लिए आज्ञा दी थी.
खैर... हनुमान जी से जुड़ी कई मान्यताएं हैं और उनकी तमाम मान्यताओं को लेकर उनके नाम पर कई मंदिर भी हैं. इसके बावजूद एक बात बहुत खटकती है कि रामचरित मानस के जिस अध्याय में सिर्फ उनके कारनामों का जिक्र है, उसका नाम उनके नाम पर क्यों नहीं है? प्रश्न ये भी है कि रामायण और रामचरित मानस दोनों में ही हनुमानजी प्रमुख पात्र हैं, लेकिन उनके नाम पर किसी अध्याय का या कांड का नाम क्यों नहीं है?
सुंदर कांड में हनुमान जी की वीरता का वर्णन
इसका जवाब है कि भले ही सीधे तौर पर किसी कांड या अध्याय का नाम हनुमान जी के नाम पर न हो, लेकिन सुंदर कांड पूरी तरह उन्हीं के कार्यों का वर्णन है. जिसमें सिर्फ वही नायक हैं और वहीं अकेले हैं जो पूरी रामकथा को गति और दिशा देते हुए सुखद अंत तक ले जाते हैं. असल में जहां पूरी रामायण और रामचरित मानस श्रीराम के आदर्शों और उनके कार्यों के बारे में विस्तार से बताती है तो वहीं सुंदरकांड पूरी तरह से हनुमान जी की भक्ति, शक्ति और विजय पर आधारित है.

रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने लगभग सभी कांडों के नाम वाल्मीकि रामायण के अनुसार ही रखे हैं, जो स्थान या परिस्थितियों पर आधारित हैं, जैसे बालकांड (बाल लीलाएं), अयोध्याकांड (अयोध्या की घटनाएं), अरण्यकांड (वनवास की घटनाएं) आदि. फिर जहां हनुमान जी की घटना और प्रसंग का विस्तार से वर्णन आता है तो उसका नाम उनके नाम पर न रखकर सुंदरकांड क्यों रखा गया.
सुंदर पर्वत पर घटी थी घटना
इसका उत्तर लंका की बसावट और भौगोलिक संरचना से मिलता है. लंका तीन पर्वतों के समूह पर बसी थी. तीन पर्वतों के समूहों को एक साथ त्रिकूट कहा जाता है. इनमें पहला था सुबेल पर्वत, जहां युद्ध हुआ. दूसरा था नील पर्वत, जहां लंका नगरी स्थित थी और तीसरा था सुंदर पर्वत, जहां अशोक वाटिका स्थित थी. इसी अशोक वाटिका में रावण ने सीता जी को हरण करने के बाद बंदी बनाकर रखा था. इस कांड की मुख्य घटा, सीताजी का पता लगाना इसी पर्वत पर घटती है, लिहाजा इस कांड का नाम 'सुंदरकांड' रखा गया.
रामचरितमानस के सुंदरकांड में 3 श्लोक, 6 छंद, 60 दोहे और 526 चौपाइयां हैं. इनमें से 30 से अधिक दोहों में भगवान राम का नाम आता है और 'सुंदर' शब्द का प्रयोग 40 से अधिक बार हुआ है. इस कांड में आगे बढ़ते हुए बहुत सारे रहस्य खुलने लगते हैं. इसकी वजह से उत्साह बढ़ता जाता है.
रावण को एक तरह के कूटनीतिक हार भी मिलती है और बड़ा नुकसान होता है. ये सारी घटनाएं न सिर्फ वीरता से भरी हैं, बल्कि इनमें जीत का सुंदर अहसास होता है. श्रीराम का नाम भी बहुत सुंदर-सुंदर उपमाओं के साथ लिया जाता है.

कुछ प्रमुख चौपाइयां, दोहे और छंद तो सुंदर शब्द के प्रयोग से बहुत सुंदर लगते हैं जिन्हें गाने में बहुत मजा आता है.
1. सिंधु तीर एक भूधर सुन्दर. कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥
2. कनक कोटि बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना.
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
3. तब देखी मुद्रिका मनोहर. राम नाम अंकित अति सुन्दर॥
4. स्याम सरोज दाम सम सुंदर. प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
5. सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा. लागि देखि सुन्दर फल रूखा॥
6. सावधान मन करि पुनि संकर. लागे कहन कथा अति सुन्दर॥
7. सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति. सहज कृपन सन सुन्दर नीति॥
8. सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा. लागी देखि सुंदर फल रूखा॥
रामचरितमानस का सुंदरकांड आकार में छोटा है, लेकिन इसमें घटनाएं अधिक हैं. वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में वानर सेना का लंका की ओर प्रस्थान, समुद्र तट पर डेरा, विभीषण का निष्कासन, रावण के जासूसों का राम की सेना तक पहुंचना, राम का समुद्र से मार्ग मांगना और सेतु निर्माण का सुझाव जैसे प्रसंग नहीं मिलते, जबकि ये सभी प्रसंग तुलसीदास के सुंदरकांड में आते हैं. इसलिए यहां से कथा का प्रवाह बहुत सुंदर हो जाता है. इसलिए हनुमान जी की बल, बुद्धि और चतुराई वाला ये कांड सुंदर कांड कहलाता है.