देवी पूजा के दौरान उनके तमाम स्वरूप लोगों के बीच लोकप्रिय और चर्चित हैं. सभी की मान्यताएं अलग-अलग हैं और हर एक मान्यता आस्था को और गहराई देती है. देवी के मूल तीन स्वरूपों महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली हैं और देश के हर हिस्से में स्थित तीर्थ और शक्तिपीठ इन्ही तीनों स्वरूपों की महिमा बताते हैं. यानी सरस्वती, लक्ष्मी और काली भी देवी अंबा या दुर्गा का ही एक रूप हैं. महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित करवीर शक्तिपीठ या महालक्ष्मी तीर्थ इनमें से प्रमुख है. यह देश का सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध लक्ष्मी मंदिर है, जो असल में महालक्ष्मी तीर्थ है.
प्राचीन शक्ति पीठ है महालक्ष्मी मंदिर
यहां की देवी माता महालक्ष्मी हैं, जिन्हें महाअंबा या अंबा माई कहा जाता है. इस मंदिर की खासियत ये है कि यहां सूर्यदेव खुद आकर देवी की तिलक करते हैं और यह दुर्लभ घटना साल में सिर्फ दो बार होती है. यह मंदिर पांच नदियों के संगम पर स्थित है. महालक्ष्मी मंदिर में मां महालक्ष्मी की पूजा तिरुपति बालाजी की पत्नी के रूप में की जाती है और मान्यता है कि उनके दर्शन के बिना तिरुपति की यात्रा अधूरी मानी जाती है.

देवी सती का अंग गिरने से बना शक्तिपीठ
कहा जाता है कि आज भी हर एकादशी को स्वयं भगवान विष्णु यहां के गर्भगृह में विश्राम करने आते हैं. यह स्थान एक सिद्ध शक्तिपीठ माना जाता है, क्योंकि मान्यता के अनुसार यहां देवी की तीसरी आंख गिरी थी. यहां देवी की पूजा महालक्ष्मी और अंबाबाई दोनों रूपों में होती है. मां के चार हाथ हैं, जो जीवन के चार पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, का प्रतिनिधित्व करते हैं.
यहां माता के एक हाथ में मातुलिंग है जो सृष्टि का प्रतीक फल है.
वहीं दूसरे में गदा है जो अपने प्रहार से माया के आवरण को दूर करता है.
तीसरे हाथ में ढाल है जो नकारात्मकता से रक्षा करती है.
वहीं चौथे हाथ में पात्र है जो कृपा, करुणा और समृद्धि के आशीर्वाद से भरा हुआ है.
साल में दो बार, तीन-तीन दिनों के लिए सूर्य की किरणें सीधे गर्भगृह में प्रवेश करती हैं. ये किरणें पहले देवी के मस्तक, फिर वक्षस्थल और अंत में चरणों पर पड़ती हैं, मानो स्वयं सूर्य देव मां भगवती को दंडवत प्रणाम कर रहे हों.