पूर्वी राजस्थान के सबसे बड़े मिट्टी के बांध पांचना बांध का पानी एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है. यह विवाद अब केवल सिंचाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी संघर्ष का रूप ले चुका है. हालात ऐसे हैं कि बांध का पानी न तो पूरी तरह खेतों तक पहुंच पा रहा है और न ही सालों से अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे किसानों की समस्या का समाधान हो पा रहा है.
एक तरफ 39 गांवों के लोग पिछले एक महीने से बांध पर पहरा देकर पानी रोकने पर अड़े हुए हैं. दूसरी तरफ 35 गांवों के किसान हाईकोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए नहरों में पानी छोड़ने की मांग को लेकर धरना दे रहे हैं. दोनों पक्ष अपने-अपने दावों को सही बता रहे हैं, जिससे विवाद लगातार गहराता जा रहा है.
39 गांवों ने बांध पर संभाला मोर्चा
डूब क्षेत्र के किसानों ने 16 मई से पांचना बांध के पास मोर्चा संभाल रखा है. पांचना-गुडला संघर्ष समिति के नेतृत्व में 39 गांवों के लोग दिन-रात बांध पर पहरा दे रहे हैं. उनका कहना है कि बांध निर्माण के दौरान उनकी जमीनें डूब क्षेत्र में चली गईं, इसलिए पानी पर पहला अधिकार उनका होना चाहिए. किसानों का आरोप है कि उनकी जमीनें तो चली गईं, लेकिन उन्हें सिंचाई का वह लाभ कभी नहीं मिला जिसकी उम्मीद बांध निर्माण के समय की गई थी.
35 गांवों के किसान मांग रहे अपना अधिकार
दूसरी तरफ करौली और गंगापुर सिटी सीमा पर स्थित खंडीप गांव में कमांड क्षेत्र के किसान पिछले दस दिनों से धरने पर बैठे हैं. इन किसानों का कहना है कि वर्ष 1992 से 2005 तक उन्हें नहरों के माध्यम से नियमित पानी मिलता रहा है, इसलिए उनका अधिकार नहीं छीना जा सकता. इन किसानों की मांग है कि हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार तुरंत नहरों में पानी छोड़ा जाए ताकि खेती प्रभावित न हो.
हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी नहीं निकला रास्ता
मई 2026 में हाईकोर्ट ने सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि पांचना बांध का पानी जल्द कमांड क्षेत्र की नहरों में छोड़ा जाए. हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब अदालत को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा हो. पिछले करीब 20 वर्षों में यह तीसरी बार है जब अदालत को इस विवाद में दखल देना पड़ा है. इसके बावजूद जमीन पर स्थिति में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है.
28 जून को रेल रोको आंदोलन की चेतावनी
खंडीप में चल रहे आंदोलन की कमान कांग्रेस विधायक रामकेश मीणा संभाले हुए हैं. उनका कहना है कि हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद सरकार कार्रवाई नहीं कर रही है. उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि 27 जून तक सरकार कोई स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत नहीं करती है तो 28 जून को रेल रोको आंदोलन किया जाएगा.
2006 के गुर्जर आंदोलन से जुड़ी हैं विवाद की जड़ें
पांचना बांध विवाद की शुरुआत वर्ष 2006 के गुर्जर आंदोलन के समय से मानी जाती है. बांध निर्माण के दौरान जिन गांवों की जमीनें डूब क्षेत्र में चली गई थीं, उन किसानों ने पानी पर प्राथमिक अधिकार की मांग शुरू की थी. तब से लेकर अब तक नहरों में नियमित रूप से पानी नहीं पहुंच पाया है. वर्तमान में बांध का पानी साल में केवल एक बार श्रीमहावीरजी मेले के दौरान गंभीर नदी में धार्मिक उपयोग के लिए छोड़ा जाता है.
करीब 10 हजार हेक्टेयर भूमि प्रभावित
राज्य के कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने भी इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए मुख्यमंत्री से चर्चा की है. उनका कहना है कि हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद पानी नहीं छोड़ा जाना किसानों के साथ अन्याय है. मंत्री के अनुसार लगभग 9,985 हेक्टेयर कृषि भूमि सिंचाई से वंचित है और करीब 1.25 लाख से अधिक लोग प्रभावित हो रहे हैं. इससे किसानों को आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है.
सरकार बोली, सभी पक्षों से हो रही बातचीत
गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेडम का कहना है कि सरकार इस संवेदनशील मुद्दे का समाधान निकालने के लिए सभी पक्षों से लगातार बातचीत कर रही है. उन्होंने कहा कि सरकार किसी भी किसान के साथ अन्याय नहीं होने देगी. पंच-पटेलों और स्थानीय प्रतिनिधियों के साथ चर्चा कर सहमति आधारित समाधान तलाशने की कोशिश की जा रही है.
लिफ्ट योजना आज तक नहीं उतर सकी धरातल पर
पांचना बांध मूल रूप से फ्लड कंट्रोल परियोजना के रूप में बनाया गया था. बाद में कमांड क्षेत्र को इससे जोड़ा गया. वर्ष 2010 में प्रभावित गांवों तक लिफ्ट योजना के माध्यम से पानी पहुंचाने के लिए 13 करोड़ रुपये मंजूर किए गए थे. हालांकि इतने सालों बाद भी यह योजना धरातल पर नहीं उतर सकी है, जिससे प्रभावित गांवों की नाराजगी लगातार बनी हुई है.
पानी की लड़ाई में दिख रहा सामाजिक और राजनीतिक पहलू
पांचना बांध का यह विवाद अब सिर्फ पानी तक सीमित नहीं माना जा रहा. कई लोग इसे गुर्जर और मीणा समाज के बीच खींचतान के रूप में भी देख रहे हैं. हालांकि दोनों पक्ष खुद को किसानों के अधिकार की लड़ाई लड़ने वाला बता रहे हैं. फिलहाल पांचना बांध का पानी राजस्थान की राजनीति, प्रशासन और किसान आंदोलन के बीच बड़ा मुद्दा बना हुआ है. अब सभी की नजर सरकार के अगले कदम और संभावित समाधान पर टिकी हुई है.