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बंगाल चुनाव में नैरेट‍िव कंट्रोल के ल‍िए ममता ने कैंपेन में क्‍या नया क‍िया?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी को रोकने के लिए ममता बनर्जी ने सियासत के सारे तिकड़म आजमाए. ममता बनर्जी ने कल्याणकारी योजनाओं, चुनाव आयोग पर सवाल खड़ा करते हुए ममता बनर्जी ने महिला और मुस्लिम वोटर को चुनाव कैंपन में ज्यादा तरजीह दी है.

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक चुनावी रैली में. (Photo: PTI)
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक चुनावी रैली में. (Photo: PTI)

ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल का चुनाव चौथी बार जीतने के लिए चौतरफा लड़ाई लड़ी है. सड़क से सोशल मीडिया तक, वाया सुप्रीम कोर्ट. चुनाव आयोग के बहाने बीजेपी के खिलाफ आक्रामक तेवर तो दिखाया ही, ऐन उसी वक्त यह बोल कर कि 'हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है' विक्टिम कार्ड भी अच्छे से खेला है - लेकिन मुकाबला इस बार ऐसा है जिसमें 'खेला होबे' की संभावना पहले जैसी नहीं मानी जा रही है. 

क्योंकि मुकाबला सिर्फ रैलियों और चुनावी स्लोगन तक सिमटा हुआ नहीं है.  जमीन पर सीधी टक्कर है, क्योंकि बीजेपी भी पुरानी गलतियों से सबक लेते हुए चुनाव कैंपेन में रणनीतिक बदलाव किए हैं. बेशक बड़े नेता बंगाल जाकर ममता बनर्जी को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, लेकिन चुनाव जीतने का पूरा दारोमदार स्थानीय नेताओं के जिम्मे छोड़ रखा है.  

ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव अब तक की सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रहा है. 15 साल की सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी माहौल, कल्याणकारी योजनाओं को बीजेपी से मिली चुनौती - और सबसे बड़ा दांव ममता बनर्जी की छवि पर लगा है.  

मौजूदा माहौल में बीजेपी अपने लिए सत्ता की सीढ़ी तक पहुंचने का सबसे बड़ा मौका देख रही है. और, हर हाल में सत्ता हासिल करने की हर संभव कोशिशें कर रही है. महिला वोटर और गांवों में रहने वाले लोगों पर तृणमूल कांग्रेस की पकड़ जरूर बनी हुई है, लेकिन शहरों में बीजेपी के जबरदस्त कैंपेन और मछली-भात खाते नेताओं के जरिए गढ़े नैरेटिव ने तृणमूल कांग्रेस के सामने चुनौतियां तो खड़ी कर ही दी हैं. 

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में जिन 152 सीटों पर 23 अप्रैल को मतदान होने जा रहा है, 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने 92 सीटें जीती थीं, और बीजेपी ने 59 सीटें - अगर थोड़ा भी ऊपर नीचे हुआ तो ममता बनर्जी के लिए मुश्किल, और बीजेपी की बल्ले बल्ले हो सकती है. 

बंगाल बचाने की लड़ाई में 'विक्टिम कार्ड' का हथियार

ममता बनर्जी ने बंगाल से बाहर बांग्ला बोलने वालों के बहाने भाषा आंदोलन जोरदार तरीके से चलाया. ममता बनर्जी ने आरोप लगाया था कि बीजेपी शासित राज्यों में बांग्ला बोलने वालों को पुलिस परेशान कर रही है. और, चुनाव कैंपेन के दौरान भी टीएमसी की रैलियों में लोगों को समझाती रहीं कि अगर बीजेपी को बंगाल में सरकार बनाने का मौका मिला, तो बांग्ला बोलने पर बांग्लादेशी और घुसपैठिया बताकर बाहर कर दिया जाएगा. 

ममता की एक लाइन से भाजपा नेता मछली लेकर घूमने लगे

ममता बनर्जी ने बिहार सरकार के एक आदेश को लेकर लोगों को समझाना शुरू कर दिया कि बीजेपी सत्ता में आई तो बंगाल के लोगों के लिए माछ-भात खाना मुश्किल हो जाएगा. बिहार सरकार ने नवरात्र के दौरान एक आदेश जारी किया था, जिसमें खुले में मीट बेचने पर पाबंदी लगा दी गई थी. 

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तृणमूल कांग्रेस ने ऐसा माहौल बनाया कि पहले तो बीजेपी उम्मीदवारों ने मछली लेकर चुनाव प्रचार शुरू किया. फिर मछली बाजारों में जाकर दिखाने की कोशिश की कि बीजेपी को मछली से परहेज नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो ममता बनर्जी को इस बात के लिए घेरा कि ममता बनर्जी बंगाल के लोगों को मछली ही नहीं खिला पा रही हैं - और अब तो आलम ये है कि मछली खाते अनुराग ठाकुर और मनोज तिवारी की तस्वीरें वायरल हो रही हैं. केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने तो यहां तक बोल रखा है कि बीजेपी के चुनाव जीतने पर मछली खाने वाला ही मुख्यमंत्री बनेगा. 

SIR बनाम दीदी... बंगालियों के हितों की एकमात्र रक्षक

SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण के खिलाफ तो ममता बनर्जी ने सबसे बड़ी मुहिम चलाई है. चुनाव आयोग को पत्र लिखने और दिल्ली आकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मुलाकात करने से लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच कर केस की पैरवी करने तक. 

ममता बनर्जी ने अपनी तरफ से हर तरीके से पश्चिम बंगाल के लोगों को यकीन दिलाने की कोशिश की है कि उनके हितों की रक्षा सिर्फ तृणमूल कांग्रेस नेता ही कर सकती हैं - लेकिन, ऐन उसी वक्त ममता बनर्जी यह भी बोल देती हैं कि उनके हाथ में कुछ भी नहीं रह गया है. 

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ममता बनर्जी चुनाव आयोग पर बीजेपी के इशारे पर काम करने का आरोप लगाती हैं. एसआईआर में जिन लोगों के नाम बचे हैं, और बाद में जोड़े गए हैं, उसके लिए ममता बनर्जी सुप्रीम कोर्ट का धन्यवाद करती हैं, मतलब लगे हाथ यह भी बता देती हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट नहीं गई होतीं, तो काफी संख्या में और भी लोग वोट देने से वंचित रह जाते. एसआईआर में वोटर लिस्ट से 90 लाख से ज्यादा लोगों के नाम हट गए हैं. 

टारगेट पर लिए तबादले

ममता बनर्जी अपनी हर चुनावी रैली में बडे़ पैमाने पर किए गए तबादलों के लिए चुनाव आयोग को टार्गेट करती रही हैं. 1 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया में शामिल 7 न्यायिक अधिकारियों का मालदा जिले में करीब 9 घंटे तक घेराव किया गया था. इस घटना के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल के आला अफसरों को तो फटकार लगाई ही, जांच का काम भी एनआईए को सौंप दिया.

ममता बनर्जी को बोलने का मौका मिल गया. ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि मालदा की घटना बीजेपी की साजिश का हिस्सा थी. चुनाव आयोग के बहाने बीजेपी पर निशाना साधते हुए ममता बनर्जी ने कहा था, वे कानून-व्यवस्था को कंट्रोल करना चाहते हैं, लेकिन वे नाकाम रहे... वे न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षा देने में नाकाम रहे.

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और फिर विक्टिम कार्ड खेलते हुए बोलीं, मुझे नहीं पता कि वे लोग कौन हैं, जिन्होंने न्यायिक अधिकारियों का घेराव किया. लेकिन, लोग SIR से नाराज हैं... मेरे पास कोई पावर नहीं है, उन्होंने मुझसे सारी पावर, लॉ एंड ऑर्डर और सब कुछ छीन लिया है. 

...और बाहरी बनाम बंगाल की बेटी का मुद्दा तो है ही

पहले चरण के चुनाव प्रचार के आखिरी दिन अमित शाह और ममता बनर्जी ने एक दूसरे के खिलाफ तीखी बयानबाजी की. कांग्रेस इस लड़ाई में साइलेंट नजर आ रही है. कांग्रेस की चुप्पी ममता बनर्जी के लिए फायदेमंद भी है. 

अमित शाह ने ममता बनर्जी पर घुसपैठियों को बचाने और सिंडीकेट को संरक्षण देने का आरोप लगाया. चांदीपुर की रैली में अमित शाह ने कहा, यह चुनाव के पहले चरण की आखिरी रैली है... मैं ममता दीदी से कहना चाहता हूं... टाटा, बाय-बाय दीदी, आपका समय खत्म हुआ... आपने बंगाल की जनता को बहुत परेशान किया... अब भाजपा के आने का समय है. 

ममता बनर्जी ने हल्दिया की रैली में पलटवार किया, भाजपा केवल चुनाव के समय बंगाल में आती है, और बाद में गायब हो जाती है. ममता बनर्जी ने भी जवाब दिया, बाहरी ताकत बंगाल पर राज नहीं कर सकती. और बोलीं, 2026 में दिल्ली से भी बीजेपी को हटाएंगे.

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तृणमूल कांग्रेस नेता ने कहा बीजेपी ने हमारी सरकार के खिलाफ कट चार्जशीट जारी की है. और, ममता बनर्जी ने भी उसका जवाब उसी तरीके से दिया है. ममता बनर्जी का आरोप है कि हल्दिया डाक कॉम्प्लेक्स और आस-पास के औद्योगिक इलाके में भाजपा ने कट मनी यानी कमीशन लिया - और कहा है, लोगों को इनके कारनामे के बारे में बताएंगे.

बंगाल में ममता के फेवर में हैं कई M-फैक्टर

1. ममता बनर्जी का पुराना स्लोगन रहा है - मां, माटी और मानुष. और 2026 के चुनाव में यह 'ममता, महिला वोटर और ममता बनर्जी की छवि' में तब्दील हो चुका है. ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकारों ने बड़ी सावधानी से पूरा चुनावी ताना-बाना बुना है. 

सुप्रीम कोर्ट में केस की पैरवी के अगले ही दिन ममता बनर्जी कोलकाता में मौजूद थीं. उसी दिन तृणमूल सरकार की तरफ से अंतरिम बजट पेश किया गया, जिसमें जोर डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर वाली स्कीम पर देखा गया. सरकार ने महिलाओं के लिए 'लक्ष्मी भंडार' योजना में दी जाने वाली रकम में 500 रुपये का इजाफा कर दिया था. पश्चिम बंगाल में यह स्कीम महिलाओं के बीच काफी लोकप्रिय हुई है. करीब करीब वैसे ही जैसे लाड़ली बहन और लाड़की बहिन योजना ने बीजेपी को मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में मजबूती दी है.

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2. SIR के खिलाफ अपने जोरदार अभियान और कड़े संघर्ष के जरिए ममता बनर्जी ने मुस्लिम वोटर के बीच खुद के एकमात्र विकल्प के तौर पर बनाए रखा है. बीजेपी के खिलाफ ममता बनर्जी की लड़ाई में मुस्लिम वोटों का अगर बंटवारा नहीं होता, ममता बनर्जी पूरी तरह फायदे में रहेंगी. 

3. ममता बनर्जी ने एक बार फिर बंगाल की बेटी बनाम बाहरी का अच्छे तरीके से प्रचार करके बीजेपी के नैरेटिव को काउंटर करने की कोशिश की है.

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