उम्र तो बस एक नंबर है. हाल ही में एक 68 साल के बुजुर्ग को गिरफ्तार किया गया. वे खुद को सरकारी अफसर बता रहे थे और लाल बत्ती लगी SUV चला रहे थे. मुंबई में, ट्रैफिक पुलिस ने सिर्फ दो दिनों के भीतर (1 और 2 अप्रैल को) पूरे शहर में चलाए गए एक अभियान के दौरान करीब 80 गाड़ियों का चालान काटा. ये गाड़ियां अवैध बत्तियों, फर्जी पुलिस स्टिकर, सायरन और ’प्रेस’ के नकली टैग लगाकर घूम रही थीं.
कोलकाता में भी इस तरह के अपराधों के लिए 2025 और 2026 में लगातार गिरफ्तारियां होती रही हैं. गुरुग्राम में भी IAS अफसर बनकर घूम रहे एक शख्स को गिरफ्तार किया गया, जिसकी गाड़ी पर ’भारत सरकार’ लिखा था.
लोकतंत्र किसी राजा-महाराजा के जुलूस जैसा नहीं दिखना चाहिए. इसके बावजूद भारत की सड़कें आज भी ताकत और रसूख के प्रदर्शन का मैदान बनी हुई हैं, जहां आम नागरिकों से यह उम्मीद की जाती है कि वे किनारे हट जाएं. ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार या सिस्टम खुद को उस जनता से ऊपर और बेहतर समझता है, जिसकी सेवा के लिए उसे बनाया गया है.
इसमें सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि नकली रौब झाड़ने वाले इन लोगों में से किसी ने भी बिजनेसमैन या सेलिब्रिटी बनने का नाटक नहीं किया. उन्होंने सरकारी अफसर बनने का नाटक चुना क्योंकि भारत में आज भी इस पहचान से लोग डरते हैं, बात मानते हैं और इससे खास सुविधाएं मिलती हैं. गाड़ी पर लगी बत्ती रौब जमाने का सबसे शॉर्टकट रास्ता बनी हुई है और असली गड़बड़ी यही है.
2017 में हटाई गई थीं लाल बत्तियां
जब 2014 में नरेंद्र मोदी सत्ता में आए, तो उनका सबसे बड़ा प्रतीकात्मक कदम था, भारत के इस गहरे जमे VIP कल्चर पर हमला करना. 19 अप्रैल 2017 को सरकार ने आधिकारिक रूप से ऐलान किया कि लगभग सभी सरकारी गाड़ियों से लाल बत्ती हटा दी जाएगी. पीएम मोदी ने इसे ’वीआईपी कल्चर’ का अंत और ’ईपीआई कल्चर’ (EPI Culture - यानी हर व्यक्ति महत्वपूर्ण है) की शुरुआत बताया था.
कुछ समय के लिए देश की सड़कें बदली हुई नजर आईं. मंत्रियों ने टीवी कैमरों के सामने अपनी एसयूवी गाड़ियों से बत्तियां खुद हटाईं. गाड़ियों के काफिले छोटे हो गए. यह बदलाव देखने में बहुत बड़ा लगा. लेकिन आज, लाल और नीली बत्तियां चुपके से वापस आ गई हैं. उन्हें गैरकानूनी तरीके से SUV गाड़ियों पर लगा दिया गया है, गाड़ियों की ग्रिल में छुपा दिया गया है, या डैशबोर्ड से चमकाया जा रहा है.
सिर्फ बत्ती पर पाबंदी लगा देना कभी भी काफी नहीं होने वाला था. भारत को इससे आगे बढ़कर सरकारी सुविधाओं और रौब के इस पूरे ढांचे को खत्म करना होगा. जैसे बिना जरूरत के बजाए जाने वाले सायरन, गाड़ियों के बड़े-बड़े काफिले, रास्ता साफ कराने के नाम पर की जाने वाली ड्रिल, फिजूल के तामझाम, खास एंट्री वाले सिस्टम और हर वह तरीका जो शासकों को आम नागरिकों से अलग करता है.
ताकत की प्रतीक बनी लाल बत्तियां
असली सुरक्षा की जरूरतें एक अलग बात हैं, लेकिन खुद को दूसरों से श्रेष्ठ दिखाने का यह दिखावा बिल्कुल अलग चीज है. एक लोकतांत्रिक देश अपनी राजनीतिक सोच को तब तक आधुनिक नहीं बना सकता, जब तक कि उसकी सड़कों पर राजसी जुलूस निकलते रहेंगे. भारत में चमकती हुई लाल बत्तियों को आज भी ताकत का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि बहुत से अफसरों और बहुत से नागरिकों को आज भी यही लगता है कि लोकतंत्र तभी सबसे अच्छा काम करता है, जब कोई बड़ा आदमी बाकी सबको रास्ते से हटने के लिए मजबूर कर सके.
गाड़ी के ऊपर से बत्ती भले ही हटा दी गई हो, लेकिन भारतीयों के दिमाग के अंदर बैठी बत्ती अभी भी नहीं हटी है.
(लेखक एशिया फीचर न्यूज सर्विस के एडिटर-इन-चीफ हैं)