इजरायल की संसद Knesset में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बोले तो वह सिर्फ एक औपचारिक संबोधन नहीं था. वह एक साफ संदेश था. आतंकवाद पर कोई समझौता नहीं. कट्टरपंथ के लिए कोई जगह नहीं. और सुरक्षा के सवाल पर भारत और इजरायल साथ खड़े हैं.
करीब आधे घंटे के भाषण में मोदी ने पांच बड़े संकेत दिए. इन संकेतों ने यह साफ कर दिया कि भारत-इजरायल रिश्ते अब सिर्फ दोस्ती नहीं रहे. यह एक पक्की रणनीतिक साझेदारी है. एक पार्टनरशिप है. जिसका असर पूरे मिडिल ईस्ट और दक्षिण एशिया पर दिखेगा.
पहला पावर पॉइंट: आतंकवाद पर बिना शर्त सख्ती
मोदी ने साफ कहा कि आतंकवाद को किसी भी वजह से सही नहीं ठहराया जा सकता. यह बात उन्होंने सीधे और बिना घुमाए कही. सीधे हमास का नाम लिया. उसकी दरिंदगी को अंडरलाइन किया. इजरायल ने हाल के सालों में जिस तरह के हमले झेले हैं, उसका जिक्र हुआ. भारत ने भी दशकों तक आतंक झेला है. दोनों देशों का दर्द अलग नहीं है.
यह संदेश सिर्फ इजरायल के लिए नहीं था. यह दुनिया के लिए था. भारत अब आतंकवाद पर संतुलन की भाषा नहीं बोल रहा. साफ शब्दों में कह रहा है कि यह मानवता के खिलाफ अपराध है.
दूसरा पावर पॉइंट: कट्टरपंथ को जड़ से खत्म करने की जरूरत
भारत और इजरायल दोनों लोकतंत्र हैं. दोनों एक ओपन सोसायटी में रहते हैं. दोनों को ऐसे विचारों से खतरा है जो बंद सोच से आते हैं. इसलिए साझेदारी सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों तक सीमित नहीं रहेगी. वैचारिक स्तर पर भी साथ काम होगा. मोदी ने इशारों में यह बताया कि आतंकवाद अचानक पैदा नहीं होता. वह कट्टर सोच से जन्म लेता है. जब समाज में नफरत की राजनीति बढ़ती है तो हिंसा को जमीन मिलती है.
तीसरा पावर पॉइंट: डिफेंस साझेदारी को नई ऊंचाई
भारत पहले से इजरायल से रक्षा तकनीक लेता रहा है. ड्रोन. मिसाइल सिस्टम. सर्विलांस तकनीक. लेकिन अब बात सिर्फ खरीद की नहीं है. अब फोकस संयुक्त विकास पर है. मिलकर सिस्टम बनाना. मिलकर टेक्नोलॉजी तैयार करना. भारत अपनी सेना को आधुनिक बना रहा है. इजरायल के पास अनुभव और तकनीक है. दोनों मिलकर एक नया मॉडल बना सकते हैं.
यह सहयोग पाकिस्तान और चीन जैसे सिक्योरिटी अलायंस में भी फर्क डालेगा. भारत की रक्षा क्षमता मजबूत होगी. और इजरायल को एक बड़ा रणनीतिक साझेदार मिलेगा.
चौथा पावर पॉइंट: इंटेलिजेंस और साइबर सुरक्षा में तालमेल
आज की लड़ाई सिर्फ सीमा पर नहीं होती. वह साइबर स्पेस में भी होती है. डेटा पर होती है. नेटवर्क पर होती है. इजरायल साइबर सुरक्षा में आगे है. भारत डिजिटल ताकत बन रहा है. अगर दोनों देश इस क्षेत्र में गहराई से जुड़ते हैं तो आतंक नेटवर्क और फंडिंग चैनल पर बड़ा असर पड़ेगा. यह सहयोग चुपचाप होता है. पर इसका असर गहरा होता है.
पांचवां पावर पॉइंट: रीजन में स्थिरता के लिए सक्रिय भूमिका
मोदी ने यह भी संकेत दिया कि भारत सिर्फ एक पक्ष के साथ खड़ा होकर नहीं चलेगा. वह शांति की बात भी करेगा. एमिडिल ईस्ट लंबे समय से तनाव का इलाका रहा है. भारत के इस क्षेत्र में एनर्जी से जुड़े हित हैं. लाखों भारतीय यहां काम करते हैं. इसलिए भारत की भूमिका अब सिर्फ दूर से देखने की नहीं है. भारत इजरायल के साथ खड़ा है. लेकिन साथ ही क्षेत्र में स्थिरता चाहता है. यही संतुलन भारत की नई कूटनीति है.
सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी गाजा और कश्मीर से परे
मोदी का भाषण भावनात्मक भी था और रणनीतिक भी. उन्होंने इजरायल के लोगों के प्रति सम्मान जताया. यह राजनीतिक संकेत था कि भारत की दोस्ती सरकार से आगे जाती है. जनता से जुड़ती है. साथ ही उन्होंने यह भी दिखाया कि भारत अब वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास से बोलता है. वह किसी ब्लॉक की भाषा नहीं बोलता. वह अपनी भाषा बोलता है.
भारत और इजरायल के रिश्ते 1992 में औपचारिक हुए थे. तब से सफर लंबा रहा है. लेकिन पिछले कुछ सालों में तेजी आई है. रक्षा. कृषि, पानी, टेक्नोलॉजी, हर क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है. अब यह रिश्ता सिक्योरिटी स्ट्रक्चर का हिस्सा बन रहा है.
अगर दोनों देश आतंकवाद पर जॉइंट स्ट्रेटेजी बनाते हैं तो इसका असर सिर्फ गाजा या कश्मीर तक सीमित नहीं रहेगा. इससे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क पर दबाव बढ़ेगा. अगर डिफेंस टेक्नोलॉजी में साझेदारी गहरी होती है तो भारत आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ेगा. इजरायल को एशिया में मजबूत दोस्त मिलेगा. अगर साइबर और खुफिया सहयोग बढ़ता है तो आतंकी हमलों की रोकथाम ज्यादा प्रभावी हो सकती है.
पूरे रीजन पर असर
मिडिल ईस्ट इस समय नए स्ट्रक्चर की ओर बढ़ रहा है. ईरान. खाड़ी देश. इजरायल. अमेरिका. सबके अपने समीकरण हैं. भारत अब इस क्षेत्र में सिर्फ पेट्रोलियम खरीदने वाला देश नहीं है. वह एक सिक्योरिटी पार्टनर बन रहा है.
इजरायल के साथ खुला और स्पष्ट सहयोग यह दिखाता है कि भारत अपने हितों को लेकर साफ है. यह संदेश पाकिस्तान तक भी जाता है. यह संदेश उन ताकतों तक भी जाता है जो आतंक को नीति का औजार मानती हैं.
कुल मिलाकर यह भाषण एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था. यह दिशा तय करने वाला क्षण था. आधे घंटे में मोदी ने यह साफ कर दिया कि भारत और इजरायल की दोस्ती में इमोशंस हैं, तो रणनीति भी. और आने वाले सालों में यह साझेदारी सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहेगी. इसका असर पूरे क्षेत्र की राजनीति और सिक्योरिटी पर दिखेगा.