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अफवाह प्रधान देश... भारत में यूं ही नहीं लग रही पेट्रोल पंपों पर कतार

भारत में अफवाहों का इतिहास पढ़िए, तो लगेगा कि यह देश दो चीजों पर चलता है- आस्था और आशंका. और जब ये दोनों मिल जाती हैं, तो पैदा होती है एक ऐसी ताकत, जिसे हम प्यार से ‘अफवाह’ कहते हैं. यह न दिखाई देती है, न पकड़ी जाती है. लेकिन पूरे देश को दौड़ा देती है.

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ईरान युद्ध के चलते पेट्रोल पंपों पर कतार लग गई है, इस अफवाह में कि कहीं कल से पेट्रोल मिलना बंद न हो जाए. (फोटोः पीटीआई)
ईरान युद्ध के चलते पेट्रोल पंपों पर कतार लग गई है, इस अफवाह में कि कहीं कल से पेट्रोल मिलना बंद न हो जाए. (फोटोः पीटीआई)

'हमारी और केंद्र की सरकार बता बताकर थक गई कि पेट्रोल-डीजल की कहीं कोई कमी नहीं है. लेकिन आप लोग अफवाह  पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और पेट्रोल पंप पर आकर डेरा डाल दे रहे हैं. ये ऐसे ही चला तो मैं कुछ दिन के लिए पेट्रोल पंप बंद करवा दूंगा’ -उमर अब्दुल्ला (ईरान युद्ध के बीच उड़ रही अफवाहों को लेकर प्रतिक्रिया देते जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री)

ईरान में जो हो रहा है, वह गंभीर है. लेकिन भारत में जो फैल रहा है, वह ‘कल्पना का युद्ध’ है. यहां असली मिसाइल नहीं, मैसेज गिरते हैं. और उनका असर भी कम नहीं होता. इसलिए अगली बार जब ऐसा कोई मैसेज आए- 'अभी खरीद लो, नहीं तो पछताओगे'. तो एक बार रुकिए. सोचिए. क्योंकि कई बार असली संकट से ज्यादा खतरनाक होती है उसकी अफवाह.

हमारी अफवाहों की ग्रंथि सिर्फ युद्धकाल में ही एक्टिव नहीं होती है. शुरुआत करते हैं उस दौर से, जब देश ने तय कर लिया था कि भगवान डायट पर नहीं रहेंगे- उन्हें भी दूध चाहिए. 1995 का ‘दूध पीते गणेश’ कांड. एक सुबह खबर आई कि गणेश जी दूध पी रहे हैं. फिर क्या था. चम्मच उठाओ और मंदिर भागो. मंदिरों में लाइनें लग गईं. विज्ञान ने कहा- ‘यह केपिलरी एक्शन है.’ जनता ने कहा- ‘तुम चुप रहो, भगवान भोजन कर रहे हैं.’

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कुछ साल बाद, 2001 में, दिल्ली ने एक नया सुपरहीरो पैदा किया, या कहिए सुपरविलेन. मंकी मैन. यह प्राणी आधा बंदर, आधा इंसान, और पूरा रहस्य था. कोई कहता- उसने हमला किया. कोई कहता-वह छतों पर कूदता है. रात होते ही लोग दरवाजे बंद कर लेते. कुछ लोग डंडा लेकर गश्त करते. पुलिस भी कंफ्यूज. आखिर में पता चला-मंकी मैन से ज्यादा खतरनाक हमारी कल्पना है.

और फिर आया 2017 का ‘चोटी कटुवा’ युग. चोटी कटुवा. देश के कई हिस्सों में खबर फैली कि रात में कोई आता है और महिलाओं की चोटी काट देता है. बिना दर्द. बिना आवाज. और बिना पकड़े गए. लोग जाग-जागकर पहरा देने लगे. कुछ जगहों पर संदिग्धों की पिटाई भी हुई. लेकिन ‘चोटी कटुवा’ आज तक नहीं मिला. शायद वह भी अफवाहों की दुनिया में प्रमोशन पाकर गायब हो गया.

इन घटनाओं को अगर आप सीरियस होकर देखें, तो चिंता होती है. लेकिन ठहरकर सोचें तो एक अनोखी कॉमेडी लगती है. सोचिए, एक देश जहां लोग दिन में ऑफिस जाते हैं, और रात में ‘मंकी मैन’ से लड़ने की तैयारी करते हैं. जहां महिलाएं बालों की सुरक्षा के लिए हेलमेट पहनने को तैयार हो जाती हैं.

4G और 5G स्पीड पर अफवाहें

सोशल मीडिया ने तो अफवाहों को पंख दे दिए हैं. उन्हें पैदल चलने की जरूरत नहीं रही. न ही किसी इलाके तक सीमित रहने की. वे 4G और 5G पर दौड़ने लगी हैं. कोविड के समय तो अफवाहों ने अपना स्वर्णकाल देखा. COVID-19 से ज्यादा डर उसके मैसेजों ने फैलाया. तरह-तरह के इलाज और टोटके वायरल हुए. कहा गया कि इससे कोरोना डर जाएगा, भाग जाएगा. देश ने पूरी श्रद्धा से इसे फॉलो किया. फिर किसी ने कहा- ‘मोबाइल टावर से कोरोना फैल रहा है.’ कुछ लोग टावर तोड़ने निकल पड़े. वायरस ने शायद सोचा होगा- ‘मैं तो इंसानों में हूं, ये लोग टावर से लड़ रहे हैं.’

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और अब जब दुनिया में कहीं भी युद्ध की आहट होती है, भारत में ‘तीसरा विश्व युद्ध’ ट्रेंड करने लगता है. ईरान का नाम आया नहीं कि व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी एक्टिव हो जाती है. ‘राशन जमा कर लो.’ ‘पेट्रोल नहीं मिलेगा.’ गैस बंद हो जाएगी.’ और लोग तुरंत तैयारी में लग लग गए हैं. जैसे युद्ध दिल्ली की गली में ही हो रहा है. सरकारें लाख समझा लें, तसल्ली दे दें, मजाल है कि कहीं कोई फर्क दिखे.

इन सभी अफवाहों में एक कॉमन बात है- इनका कोई चेहरा नहीं होता. न कोई जिम्मेदार. लेकिन असर ऐसा, जैसे कोई आधिकारिक आदेश हो. और मजेदार बात यह है कि लोग सरकारी बयान से ज्यादा भरोसा ‘कहीं सुना है’ पर करते हैं. भारत में ‘कहीं सुना है’ एक अद्भुत संस्था है. इसका कोई दफ्तर नहीं, कोई वेबसाइट नहीं. लेकिन इसकी विश्वसनीयता कई बार सरकार से भी ज्यादा होती है. ‘कहीं सुना है कि आज रात कुछ होने वाला है.’ बस, इतना काफी है. लोग खुद ही कहानी पूरी कर लेते हैं.

अफवाह के प्रति आस्थावान हम

इस पूरे खेल में आस्था भी महत्वपूर्ण किरदार निभाती है. यहां लोग भगवान पर भरोसा करते हैं, यह अच्छी बात है. दिक्कत तब होती है जब वही भरोसा हर फॉरवर्ड मैसेज पर भी हो जाता है. ‘इसे 10 लोगों को भेजो, नहीं भेजा तो दुर्भाग्य आएगा.’ और लोग भेज देते हैं. क्योंकि अगर सच हुआ तो?अंधविश्वास इस कहानी का बैकग्राउंड म्यूजिक है. हर अफवाह के पीछे हल्का-सा डर, थोड़ा-सा रहस्य, और एक चुटकी चमत्कार डाल दीजिए-और अफवाह तैयार. लोग उसे सुनते हैं, मानते हैं, और आगे बढ़ाते हैं.

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सोचने वाली बात यह है कि डेढ़ अरब की आबादी वाले देश में सही जानकारी पहुंचाना कितना मुश्किल है. सरकारी एजेंसियां कोशिश करती हैं. लेकिन उनकी आवाज धीमी पड़ जाती है. क्योंकि अफवाह में मसाला है. और इंसान मसालेदार चीजों की तरफ जल्दी आकर्षित होता है. अफवाह हमें खास महसूस कराती है. जैसे हमें कोई गुप्त जानकारी मिल गई हो. और हम उसे दूसरों को बता रहे हैं. यह एक तरह का सामाजिक स्टेटस भी है- ‘देखो, मुझे पहले पता था.’

लेकिन इस खेल का नुकसान भी कम नहीं है. कई बार लोग डर में गलत फैसले ले लेते हैं. भीड़ हिंसक हो जाती है. संसाधनों की कमी हो जाती है. और सबसे बड़ा नुकसान-सच की विश्वसनीयता कम हो जाती है. फिर भी, इतिहास गवाह है कि हर अफवाह की उम्र सीमित होती है. ‘मंकी मैन’ आया और चला गया. ‘चोटी कटुवा’ ने भी कुछ महीनों में विदाई ले ली. गणेश जी ने दूध पीना बंद कर दिया. लेकिन अफवाहों की फैक्ट्री बंद नहीं हुई.

क्योंकि यह फैक्ट्री हमारे दिमाग में है. जब तक हम बिना जांचे-परखे हर बात पर विश्वास करते रहेंगे, यह चलती रहेगी. और हर कुछ साल में एक नया ‘मंकी मैन’ या ‘चोटी कटुवा’ जन्म लेता रहेगा. पेट्रोल-डीजल की आपूर्ति कितनी ही हो, पंप पर लाइन लगती रहेगी.

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