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मामला लीगल है... रवि किशन की दलीलों से समझिए सोनम रघुवंशी को कैसे मिली जमानत?

राजा रघुवंशी मर्डर केस की आरोपी सोनम रघुवंशी और वेब सीरीज ‘मामला लीगल है’ के एक एपिसोड के बीच चौंकाने वाली समानता नजर आती है. क्योंकि रियल और रील दोनों मामलों में ही पुलिस की एक गलती ने केस की दिशा बदल दी और आरोपियों को जमानत मिल गई. जानें ये दिलचस्प कहानी.

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मामला लीगल है सीरीज का एक एपिसोड चर्चाओं में आ गया है (फोटो-ITG)
मामला लीगल है सीरीज का एक एपिसोड चर्चाओं में आ गया है (फोटो-ITG)

'जज साहब, इस मामले में मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं. शिलॉन्ग पुलिस ने जानबूझकर मेरी क्लाइंट पर गलत धाराएं लगाई हैं. जनाब हत्या के लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(1) लगनी चाहिए थी, लेकिन पुलिस ने वहां संपत्ति हड़पने की कोशिश यानी 403(1) जैसी हल्की धारा लगाई है. इसलिए  मैं आपसे दरख्वास्त करुंगां कि प्लीज ग्रांट हर बेल.'

कुछ ऐसी ही दलील देते वेब सीरीज ‘मामला लीगल है’ में वकील बने रवि किशन. जिनकी ऐसी ही एक पैरवी से उस वेब सीरीज में पांच आरोपियों को जमानत मिल जाती है. आइये, समझते हैं कि हत्या जैसे गंभीर अपराध की आरोपी को पुलिस की मामूली कही जा रही गलती के कारण जमानत मिलना कोई फिल्मी स्क्रिप्ट नहीं है. ऐसा हकीकत में होता है.

पूरे देश ने हाल ही में देखा कि राजा रघुवंशी मर्डर केस में पुलिस की एक गलती ने मुख्य आरोपी सोनम रघुवंशी को जमानत दिलवा दी. अभियोजन पक्ष कुछ नहीं कर सका. कई लोगों को लग सकता है कि इसमें क्या बड़ी बात है. छोटी मोटी गलती की वजह से संगीन अपराधी को जमानत कैसे दी जा सकती है. ये बात तो है रीयल लाइफ की. ठीक ऐसी ही कहानी को 'मामला लीगल है' (Maamla Legal Hai) नाम की एक वेब सीरीज के चर्चित एपिसोड Ravi Kishan’s Brilliant Argument in a Robbery Case में दिखाया गया है कि कैसे पुलिस की एक छोटी सी लापरवाही पूरे केस को पलट देती है और आरोपियों को जमानत का हकदार बना देती है.

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पहले बात करते हैं राजा रघुवंशी हत्याकांड की. जिसमें सोनम रघुवंशी पर अपने पति की हत्या की साजिश रचने का आरोप है और पुलिस ने उसके खिलाफ मजबूत चार्जशीट पेश करने का दावा भी किया था. लेकिन इस केस की सबसे बड़ी कमजोरी गिरफ्तारी के वक्त सामने आई. असल में मेघालय पुलिस ने सोनम के अरेस्ट मेमो में गलत धारा दर्ज कर दी. जहां हत्या के लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(1) लगनी चाहिए थी, वहां संपत्ति विवाद से संबंधित 403(1) जैसी हल्की धारा दर्ज कर दी गई. 

यही वह चूक थी, जिसने पूरे केस की नींव हिलाकर रख दी. अदालत ने इस गलती को मामूली नहीं माना. कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को सही धाराओं और कारणों की जानकारी देना उसका मौलिक अधिकार है. यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत सुरक्षित है. इस नियम का उल्लंघन होने पर आरोपी को राहत मिल सकती है. ठीक वैसे ही जैसे रवि किशन की वेब सीरीज में दिखाया गया है.

इतना ही नहीं, पुलिस यह भी साबित नहीं कर पाई कि सोनम को शुरुआती पेशी के दौरान उचित कानूनी सहायता दी गई थी. दस्तावेजों में उसके वकील का साफ जिक्र नहीं था. इस वजह से अदालत ने माना कि आरोपी को अपने बचाव का पूरा मौका नहीं मिला. इन सभी खामियों के चलते शिलॉन्ग की अदालत ने सोनम रघुवंशी को जमानत दे दी. 

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हालांकि कोर्ट ने सख्त शर्तें भी लगाईं. जैसे गवाहों से दूरी, हर पेशी में हाजिरी और शहर छोड़ने पर रोक रहेगी. लेकिन जमानत मिलना ही इस बात का इशारा है कि जांच में प्रक्रिया संबंधी बड़ी चूक हुई है. 

क्या है वेब सीरीज के एपिसोड में?
अब आपको बताते हैं कहानी उस वेब सीरीज के चर्चित एपिसोड की, जिसका नाम है 'मामला लीगल है'. इस सीरीज में रवि किशन एक वकील 'त्यागी जी' के किरदार में नजर आते हैं. एक एपिसोड के दौरान उन्हें लूट के केस में आरोपियों की पैरवी करते हुए दिखाया गया है. साधारण से दिखने वाले इस मामले में वह आरोपियों की ओर से अदालत में जमानत याचिका लगाते हैं. जिस पर अदालत सुनवाई करती है. 

अदालत में वकील त्यागी जी पुलिस की जांच में हुई तकनीकी गलती को पकड़ते हैं और उसी के आधार पर आरोपियों को राहत दिला देते हैं. उनका तर्क यही होता है कि कानून में प्रक्रिया (procedure) उतनी ही अहम है, जितना कि अपराध. एपिसोड में दिखाया गया है कि पुलिस ने आरोपियों को पकड़ तो लिया, लेकिन जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया. उनके खिलाफ केस बनाते समय सही धारा का इस्तेमाल नहीं किया. 

अधिवक्ता त्यागी जी अदालत में बचाव करते हुए कहते हैं कि आरोपियों की संख्या पांच होने की वजह से यह मामला डकैती का था और लेकिन पुलिस ने केस में लूट की धारा लगाई है. जब रवि किशन अदालत में इस बात खुलासा करते हैं, तो पुलिस अफसर बगले झांकने लगते हैं. 

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रवि किशन (वकील त्यागी जी) कहते हैं- 'जज साहब, अब मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं है. ये बात साफ हो गई कि पुलिस ने जानबूझकर में मेरे क्लाइंट पर गलत धाराएं लगाई हैं. जनाब आईपीसी धारा 390 गवाह है इस बात का, कि पांच लोग मिलकर लूट कर ही नहीं सकते, ये तो डकैती का केस है जनाब. पुलिस जानबूझकर मेरे डकैत क्लाइंट को लुटेरा बता रही है. इसीलिए मैं आपसे दरख्वास्त करुंगां कि प्लीज ग्रांट दैम बेल.'

ये सुनते ही अदालत में मौजूद पुलिस अफसर के हाथ पांव फूल जाते हैं और कहते हैं कि जनाब धाराएं गलत लग गई.

ये सुनने के बाद जज साहब कहते हैं- बेल ग्रांटेड. 
 
मतलब साफ है कि सीरीज के एपिसोड में पुलिस की खामी को वकील त्यागी जी अदालत में इस तरह पेश करते हैं कि जज को आरोपियों के पक्ष में फैसला देना पड़ता है. उनकी जमानत मंजूर करनी पड़ती है. यह कहानी न्याय व्यवस्था के उस पहलू को उजागर करती है, जहां नियमों की अनदेखी भारी पड़ सकती है.

अब अगर इसे राजा रघुवंशी मर्डर केस से जोड़कर देखें, तो तस्वीर काफी हद तक मिलती-जुलती दिखती है. अब ज़रा सोचिए कि अगर त्यागी जी सोनम के वकील होते, तो अदालत में क्या कहते?

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त्यागी जी अदालत में सोनम की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान कहते- 'जज साहब, इस मामले में मेरे पास कहने के लिए कुछ नहीं. शिलॉन्ग पुलिस ने जानबूझकर मेरी क्लाइंट पर गलत धाराएं लगाई हैं. जनाब हत्या के लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(1) लगनी चाहिए थी, लेकिन पुलिस ने वहां 403(1) जैसी हल्की धारा लगाई है. इसलिए  मैं आपसे दरख्वास्त करुंगां कि प्लीज ग्रांट हर बेल.'

जज साहब कहते- 'हर बेल ग्रांटेड'

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