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सुमन कल्याणपुर... तीन दशकों तक उन्हें ये मानकर सुना गया कि लता गा रही हैं

सुमन कल्याण को उनकी फिल्म गायकी के लिए 2023 में पद्म भूषण से नवाजा गया था. लेकिन, उन्हें उस हौंसले का क्रेडिट शायद ही कभी मिला, जो उन्होंने तीन दशक तक अपनी लता मंगेशकर से तुलना होते रहने के बावजूद कायम रखा. उस मनःस्थिति का अंदाजा लगाइए, कि आप गाना गा रहे हैं, और दाद किसी और को मिल रही है.

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‘रहें ना रहें हम...’, ‘बहना ने भाई की कलाई पर...’ जेसे कई मशहूर गीत गाने वाली सुमन कल्याणपुर नहीं रहीं.
‘रहें ना रहें हम...’, ‘बहना ने भाई की कलाई पर...’ जेसे कई मशहूर गीत गाने वाली सुमन कल्याणपुर नहीं रहीं.

आधी रात खबर आई कि सुमन कल्याणपुर नहीं रहीं. बॉलीवुड के सुनहरे दौर में वे तीन दशकों तक अपनी आवाज से गीतों को मशहूर बनाती रहीं, लेकिन लता का ‘साया’ उनके साथ अन्याय करता रहा. जैसे, जब उन्होंने गाया, ‘आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर जबान पर...’, या उनका गाना ‘ना तुम हमें जानो, ना हम तुम्हें जानें...’, या ये गीत- ‘तुमने पुकारा और हम चले आए...’, जो सुनने वाले गहराई में नहीं उतरे, उन्हें लगा कि लता गा रही हैं. फिल्म रेशम की डोरी का गाना ‘बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है...’ के बारे में तो मान लिया गया कि ऐसा तो लता मंगेशकर ही गा सकती हैं.

सुमन कल्याणपुर का 89 वर्ष की उम्र में मुंबई में निधन हो गया. ग्लैमर की चकाचौंध में कभी अपने सिद्धांतों से समझौता न करने वाली सुमन का जीवन उनकी गायकी से कहीं आगे, एक मिसाल है. आजादी से पहले ढाका का जन्मी सुमन कल्याणपुर का फिल्म जगत में आना कोई प्लानिंग का हिस्सा नहीं था. वे 1950 के दशक की शुरुआत में मुंबई के प्रतिष्ठित जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में पेंटिंग सीख रही थीं. रंगों और कैनवास से सजी उनकी दुनिया में संगीत का मोड़ अचानक तब आया, जब कॉलेज के एक कार्यक्रम में गाते दिग्गज गायक तलत महमूद ने सुन लिया. वे वहां बतौर चीफ गेस्ट आए हुए थे. उन्होंने उनकी आवाज को पहचान लिया. फिर कड़ियां जुड़ती गईं, और बॉलीवुड के दरवाजे खुलते गए. साल 1954 में आई फिल्म 'मंगू' से उनका प्रोफेशनल सफर शुरू हुआ.

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हिंदी फिल्मों के जिस दौर में सुमन कल्याणपुर ने कदम रखा, वह लता मंगेशकर का दौर था. लता ने अपनी कठिन साधना से फिल्म संगीत की जमीन को सींचा था. ऐसे समय में किसी नई आवाज के लिए अपनी अलग पहचान बनाना लगभग असंभव था. लेकिन फिल्म जगत के अपने समीकरण होते हैं. तारीखों की समस्या और रॉयल्टी विवाद के कारण जब लता का कुछ बड़े संगीतकारों और मोहम्मद रफी से मतभेद हुआ, तब इंडस्ट्री में मजबूत विकल्प की तलाश शुरू हुई. जो सुमन पर आकर खत्म हो गई.

देखते ही देखते सुमन कल्याणपुर संगीतकारों की पहली पसंद बन गईं. उनकी आवाज का ठहराव और रेंज काफी हद तक लता के समकक्ष था. जब रफी और लता ने साथ गाना बंद किया, तब सुमन और रफी की जोड़ी बन गई. दोनों ने मिलकर 140 गीत दिए. शंकर-जयकिशन, रोशन और मदन मोहन जैसे चोटी के संगीतकारों ने उनके हुनर का भरपूर इस्तेमाल किया. सुमन फिल्म इंडस्ट्री की एक अनिवार्य आवाज बन गईं.

गाने का चयन पारिवारिक मर्यादा के अनुरूप

सुमन कल्याणपुर का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सिनेमा जगत में ऊंचाई छूने के लिए अपनी जड़ों को छोड़ना जरूरी नहीं है. वे एक पारंपरिक और संभ्रांत परिवार से थीं. उस दौर में महिलाओं का फिल्मों में गाना शराफत नहीं माना जाता था. इस माहौल के बीच भी उन्होंने अपनी कला को जीवित रखा. उन्होंने कुछ कड़े नियम तय किए. एक इंटरव्यू में सुमन कहती हैं कि मेरी चार जेठानी और दो देवरानी थीं. इतने बड़े परिवार में मुझे अपने गाने और घर के बीच तालमेल बैठाना होता था. मैंने हमेशा अपनी गायकी में अनुशासन का ख्याल रखा.

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इसी मर्यादा का नतीजा था कि उन्होंने अपने पूरे करियर में कभी कोई भड़काऊ या द्विअर्थी गाना नहीं गाया. उन्हें जो भी काम मिला, वह उनकी अपनी शर्तों और शालीनता के दायरे में ही था. सुमन बताती हैं कि अपने पूरे करियर में वे कभी भी किसी रिकॉर्डिंग स्टूडियो में अकेली नहीं गईं. शुरुआत में वे हर रिकॉर्डिंग पर अपने पिता को साथ लेकर जाती थीं. विवाह के बाद यह जिम्मेदारी उनके पति रामानंद कल्याणपुर ने निभाई.

लता से तुलना के समानांतर दुनिया

सुमन कल्याणपुर के करियर की सबसे बड़ी चुनौती उनकी लता से लगातार होती तुलना थी. उन्हें पहले दिन से लेकर साल 1986 में उनके आखिरी गीत तक हमेशा 'लता के विकल्प' के रूप में देखा गया. किसी भी कलाकार के लिए यह स्थिति मानसिक बोझ बन सकती है. परंतु सुमन का व्यक्तित्व असाधारण था. उन्होंने इस तुलना को कभी भी अपने अहंकार की लड़ाई नहीं बनने दिया.

वे इस तुलना वाली पॉलिटिक्स के पचड़े में पड़ी ही नहीं. उन्होंने न तो कभी इसके खिलाफ कोई असंतोष व्यक्त किया और न ही लता के प्रति कोई कड़वाहट दिखाई. एक बार इंटरव्यू में इस तुलना पर उन्होंने इतना ही कहा कि- 'मैं उनकी (लता) की गायिकी से बहुत प्रभावित रही हूं. मेरे कॉलेज के दिनों में तो उनके ही गाने गाती थी. मेरी आवाज नाजुक और पतली थी, अब इसके लिए मैं क्या करूं?' वे बेहद निश्चिंतता के साथ इस बड़ी तुलना के समानांतर अपनी पगडंडी पर चलती रहीं. उनकी इसी सादगी ने लता के कद्दावर साए के प्रभाव को पूरी तरह बेअसर कर दिया. उनका मानना था कि उनका काम सिर्फ अपनी साधना को ईमानदारी से निभाना है. ये और बात है कि रेडियो पर कई बार उनके गाने बजाए गए, लेकिन गायक के रूप में उनका नाम नहीं लिया गया. कई बार उनके गानों के रिकॉर्ड्स पर उनका ही नाम नहीं छपा.

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सुमन कल्याणपुर की सफलता केवल मुंबई के स्टूडियोज तक सीमित नहीं रही. वे भारत की पहली ऐसी बैकग्राउंड सिंगर बनीं, जिन्होंने विदेशों में लाइव स्टेज शो किए. उनकी लोकप्रियता सात समंदर पार भी गूंजी. वेस्टइंडीज, अमेरिका, कनाडा और लंदन के ऐतिहासिक 'वेंबली स्टेडियम' में उनके लाइव कॉन्सर्ट आयोजित हुए. वहां मौजूद हजारों प्रशंसकों ने उनकी लाइव गायकी का लोहा माना. उन्होंने हिंदी के अलावा मराठी, गुजराती, भोजपुरी, बंगाली और पंजाबी सहित लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में गाया.

सुमन कल्याणपुर का सफर इस बात की मिसाल है कि भारी प्रतिस्पर्धा वाली फिल्म इंडस्ट्री में भी कोई कलाकार बिना किसी गॉडफादर और बिना किसी विवाद के सिर्फ अपने हुनर और सादगी के दम पर दशकों तक राज कर सकता है. उन्होंने कभी नंबर वन बनने की अंधी दौड़ में हिस्सा नहीं लिया. वे हमेशा तनावमुक्त और बेदाग रहीं. आज भले ही वे हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन सुरों के इतिहास में उनका नाम हमेशा एक पवित्र और सुरीले सितारे के रूप में दर्ज रहेगा. शायद वो अपने लिए ही गा गई हैं- 'रहे न रहे हम, महका करेंगे...'

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