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जन सुराज का क्या होगा? रितेश पांडे के बाद आरसीपी का भी मोह भंग होता दिख रहा

जन सुराज पार्टी बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान बहुत से लोगों के लिए नई उम्मीद लेकर आई थी. पार्टी के फाउंडर प्रशांत किशोर के दावे भी बहुत बड़े थे. पर जिस तरह पार्टी के नेताओं का मोहभंग हो रहा है वह जन सुराज के लिए बहुत चिंता की बात है.

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आरसीपी सिंह, जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर और रितेश पांडेय
आरसीपी सिंह, जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर और रितेश पांडेय

चुनावी रणनीतिकार के रूप में देशभर में प्रसिद्ध हुए प्रशांत किशोर द्वारा 2025 में शुरू की गई पोलिटिकल पार्टी जनसुराज के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मॉडल मंडरा रहे हैं. बिहार की राजनीति में एक नई ताकत बनने की कोशिश में लगे प्रशांत किशोर को 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में उम्मीद के उलट जनता ने नकार दिया. किशोर के बड़े बड़े दावे धराशायी हो गए. फिर भी उनकी लोकप्रियता को देखते हुए बिहार में यह उम्मीद है कि पीके हार नहीं मानेंगे.

अगर पहले चुनाव में इतना बड़ा बज वो क्रिएट कर सकते हैं तो आगे 5 साल की मेहनत उन्हें खाक से उठाकर फलक पर भी बैठा सकती है. पर जिस तरह विधानसभा चुनावों के बाद किशोर अंडरग्राउंड हुए हैं और जिस तरह पार्टी नेताओं का उनसे मोहभंग हो रहा है उसका जनता में गलत संदेश जा रहा है.

पहले भोजपुरी गायक और राजनीतिक नवागंतुक रितेश पांडे ने पार्टी छोड़ी, और अब पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह (राम चंद्र प्रसाद सिंह) के बाहर निकलने की अफवाहें तेज हैं. यह मोहभंग मुख्य रूप से पार्टी की चुनावी हार, आंतरिक संरचना में बदलाव, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और बाहरी राजनीतिक दबावों से जुड़ा लगता है. आइए विस्तार से समझते हैं कि क्यों इतनी जल्दी नेता पार्टी से दूर हो रहे हैं और उनका भविष्य क्या है?

रितेश पांडे का मामला: चुनावी हार और व्यक्तिगत प्राथमिकताएं

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रितेश पांडे, जो भोजपुरी गायक हैं और 'हैलो कौन' जैसे गानों से मशहूर हैं, ने अक्टूबर 2025 में जनसुराज जॉइन किया था. वे प्रशांत किशोर की होम सीट करगहर (रोहतास जिला) से विधानसभा चुनाव लड़े, लेकिन बुरी तरह हारे. महज दो महीने बाद, 12 जनवरी 2026 को उन्होंने सोशल मीडिया पर इस्तीफा दे दिया. वजह बताई कि वे अपनी काम (संगीत और सामाजिक काम) पर फोकस करना चाहते हैं, जिससे उन्हें इतना प्यार और सम्मान मिला है.

यह मोहभंग जल्दी हुआ क्योंकि जनसुराज का चुनावी प्रदर्शन बेहद खराब रहा. पार्टी ने 238 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन 235 पर जमानत जब्त हो गई और कुल वोट शेयर सिर्फ 3.4% ही रहा. एनडीए (बीजेपी-जेडीयू गठबंधन) ने 202 सीटें जीतकर एकतरफा जीत हासिल की. रितेश जैसे नए चेहरे को लग सकता है कि पार्टी में राजनीतिक भविष्य नहीं है, खासकर जब वे पहले से ही मनोरंजन जगत में सफल हैं. पार्टी सूत्रों का कहना है कि यह फिल्टरिंग का हिस्सा है, जहां सिर्फ समर्पित सदस्य रहेंगे.

पर रितेश के इस्तीफे को पार्टी के लिए झटका नहीं समझा जाना चाहिए. रितेश जैसे कलाकारों का इतिहास रहा है कि वो राजनीति में आते हैं हारने के बाद पार्टी से मुंह मोड़ लेते हैं. भोजपुरी के अपेक्षाकृत बड़े कलाकार खेसारी ने भी हार के बाद कुछ ऐसी बातें कहकर राजनीति से तौबा कर लिया. दरअसल ये सितारे सत्ता के जरिए अपनी और अपने कारोबार-संपत्ति आदि के सुरक्षा के लिए आते हैं. जब उन्हें यह मिलता नहीं दिखता है तो वो किनारा कर लेते हैं. रितेश के जाने का जनसुराज पार्टी पर कोई प्रभाव पड़ेगा , फिलहाल ऐसा लगता नहीं है.

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आरसीपी सिंह का मामला: नीतीश कुमार से पुराना लगाव और पार्टी की कमजोरी

आरसीपी सिंह, जो पूर्व में जेडीयू के प्रमुख नेता और केंद्रीय मंत्री थे, ने मई 2025 में अपनी पार्टी 'आप सबकी आवाज' को जनसुराज में विलय कर दिया. प्रशांत किशोर ने उन्हें बड़े भाई जैसा बताया था. लेकिन अब वे बाहर निकलने की अफवाहों को हवा दे रहे हैं. 12 जनवरी 2026 को पटेल सेवा संघ के मकर संक्रांति कार्यक्रम में उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तारीफ की और कहा, नीतीश कुमार और मैं एक ही हैं.

उनकी बेटी लता ने जनसुराज टिकट पर अस्थावन (नालंदा) से चुनाव लड़ा, लेकिन हार गईं. आरसीपी का यह बयान नीतीश से दोबारा जुड़ने का संकेत माना जा रहा है, जो पहले उनके मेंटर थे. जनसुराज की करारी हार से राजनीतिक करियर को खतरा, और पार्टी की आंतरिक संस्कृति में बदलाव शायद उन्हें भी रास नहीं आ रहा है. पार्टी ने नवंबर 2025 में सभी नामित कमेटियों को भंग कर दिया और बूथ स्तर तक चुनाव कराने का फैसला किया, ताकि समर्पित नेता ही पार्टी में रह सकें. आरसीपी जैसे वरिष्ठ नेता को यह फिल्टरिंग प्रक्रिया पसंद नहीं आ रही होगी, क्योंकि इससे उनकी स्थिति कमजोर हो सकती है.

पर आरसीपी सिंह के साथ भी वही बात है जो रितेश पांडेय के साथ है. आरसीपी भी जन्मजात राजनीतिज्ञ नहीं है. वो ब्यूरोक्रेट रहे हैं. रिटायरमेंट के बाद राजनीति में सत्ता सुख भोगने आये थे. नीतीश कुमार ने न केवल उन्हें पार्टी अध्यक्ष बनाया बल्कि केंद्र में मंत्री भी बनाया. पर जब आरसीपी ने बीजेपी के साथ पेंग बढ़ाना शुरू किया तो नीतीश की नाराजगी स्वाभाविक थी. उसके बाद एक समय ऐसा आया कि आरसीपी न घर के हुए न घाट के . मतलब बीजेपी ने भाव दिया नहीं और नीतीश के पास जाने की नैतिकता नहीं बची थी. बाद में उन्होंने अपनी पार्टी बनाई. जनसुराज को उगता हुआ सूरज समझकर उन्होंने अपनी पार्टी का विलय कर लिया. पर जनसुराज का जो हाल हुआ उसे देखकर उन्हें लगता है कि सत्ता सुख तो यहां अभी बहुत दूर की बात है.

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प्रशांत किशोर कहां हैं ?

विधानसभा चुनावों में हार के बाद प्रशांत किशोर सार्वजनिक जीवन से कुछ हद तक दूर हो गए हैं. दिसंबर में कांग्रेस महासचिव और लोकसभा सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा से उनकी मुलाकात की. इसके बाद राजनीतिक गलियारों में कई तरह की अटकलें लग रही हैं. इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर की मानें तो प्रशांत किशोर फरवरी में फिर से सार्वजनिक गतिविधियों में सक्रिय होंगे. पार्टी नेता मनोज भारती कहते हैं कि हालांकि अभी हमें उनका कार्यक्रम नहीं मिला है, लेकिन वे जल्द ही बिहार में सक्रिय होंगे. उन्होंने यह भी कहा कि नई समितियों के गठन के बाद पार्टी अपने दीर्घकालिक कार्यक्रम पर काम शुरू करेगी.

नेताओं का मोहभंग क्यों इतनी जल्दी?

जनसुराज में नेताओं का जल्दी मोहभंग कई कारणों से हो रहा है . 2025 विधानसभा चुनाव में पार्टी का शून्य प्रदर्शन (0 सीटें) ने नए सदस्यों की उम्मीदें तोड़ीं. मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना जैसी योजनाओं से एनडीए की जीत ने जनसुराज को हाशिए पर धकेल दिया.

पार्टी ने नामित से निर्वाचित संरचना की ओर जाने का लक्ष्य रखा. जाहिर है कि पुराने नेताओं के लिए यह अनिश्चितता पैदा करने वाला है. पार्टी अध्यक्ष मनोज भारती ने कहा कि हम अपनी गलतियों से सीख रहे हैं... पार्टी फिल्टर हो रही है और सिर्फ असली जनसुराजी रहेंगे.

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बिहार की राजनीति में जाति-आधारित गठबंधन मजबूत हैं, और जनसुराज की स्वच्छ राजनीति वाली छवि अभी जम नहीं पाई है. रेडिट जैसी चर्चाओं में लोग कहते हैं कि पार्टी को शिक्षित उम्मीदवारों पर फोकस करना चाहिए, लेकिन पुरानी पार्टियां अभी हावी हैं.

जनसुराज अब संगठनात्मक चुनावों पर फोकस कर रही है, लेकिन अगर और नेता छोड़ते हैं, तो पार्टी की विश्वसनीयता पर असर पड़ेगा. कुल मिलाकर, यह मोहभंग प्रशांत किशोर की रणनीति की परीक्षा करने वाला है. सवाल यह है कि क्या वे पार्टी को बचा पाएंगे या यह एक असफल प्रयोग साबित होगा?

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