होर्मुज स्ट्रेट में अचानक आक्रामक होता ईरान आखिर क्या संकेत दे रहा है? यही सवाल इस वक्त पूरी दुनिया के सामने खड़ा है. एक तरफ डोनाल्ड ट्रंप सीजफायर का ऐलान करके ईरान को बातचीत की टेबल पर आने का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन दूसरी तरफ ईरान का फोकस कुछ और ही है. उसकी प्राथमिकता साफ दिख रही है- अमेरिकी नेवल ब्लॉकेड को जवाब देना. यानी बातचीत बाद में, पहले अपनी ताकत दिखाना.
दरअसल, यह कॉन्फिडेंस अचानक पैदा नहीं हुआ है. करीब 50 दिन तक अमेरिका जैसी सुपरपावर के सामने टिके रहने के बाद ईरान खुद को एक नई पोजिशन में देख रहा है. उसके लिए यह सिर्फ जंग नहीं थी, बल्कि अपनी साख और ताकत साबित करने का मौका भी था. यही वजह है कि सीजफायर के बाद ईरान की सड़कों पर लोग मिसाइल लेकर जश्न मना रहे हैं. मीडिया में जीत की कहानियां छप रही हैं और यह नैरेटिव बनाया जा रहा है कि ईरान ने दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को झुकने पर मजबूर कर दिया है.
इस पूरे माहौल को और दिलचस्प बनाती हैं अमेरिकी डिफेंस हेडक्वार्टर पेंटागन की रिपोर्ट्स. इनमें माना गया है कि अमेरिकी और इजरायली हमलों के बावजूद ईरान की मिलिट्री ताकत, खासकर Islamic Revolutionary Guard Corps यानी IRGC, को कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ. ईरान के पास अब भी मिसाइल और ड्रोन का अच्छा-खासा स्टॉक मौजूद है. दूसरी तरफ अमेरिका के लिए यह लड़ाई सस्ती नहीं रही. एयर डिफेंस सिस्टम पर भारी खर्च हुआ, पैट्रियट मिसाइल सिस्टम्स हांफते नजर आए. सबसे अहम बात यह रही कि तमाम धमकियों के बावजूद अमेरिका ने ईरान की जमीन पर मरीन्स नहीं उतारे. इसने ईरान के हौसले को और बढ़ा दिया.

अब सवाल यह है कि सीजफायर के बाद पश्चिमी एशिया किस दिशा में जाएगा? लगता यही है कि जो शांति दिख रही है, दरअसल वह एक नए तरह का बैलेंस है, जो कभी भी बिगड़ सकता है.
1. सबसे पहला बड़ा बदलाव ईरान के रवैये में दिखेगा. अब वह पहले से ज्यादा कॉन्फिडेंट है और अपनी डिटरेंस स्ट्रैटेजी को और आक्रामक तरीके से इस्तेमाल करेगा. पहले वह ज्यादातर प्रॉक्सी ग्रुप्स के जरिए काम करता था, लेकिन अब सीधे मिसाइल और ड्रोन से जवाब देने का ट्रेंड बढ़ सकता है. इसका असर पूरे इलाके में दिखेगा. खाड़ी देशों से लेकर इजरायल तक, हर कोई अपनी सिक्योरिटी को नए सिरे से देखेगा. क्योंकि, ईरान ने युद्ध के दौरान इस पूरे इलाके तक अपनी मिसाइल और ड्रोन की मार को साबित किया है.
2. दूसरी तरफ अमेरिका की भूमिका भी बदलती नजर आ रही है. डोनाल्ड ट्रंप का सीजफायर का फैसला यह दिखाता है कि अमेरिका अब हर हाल में लंबी जंग लड़ने के मूड में नहीं है. एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अब अमेरिका सीधे युद्ध की बजाय मैनेज्ड कॉन्फ्लिक्ट पर ज्यादा भरोसा करेगा. यानी हालात को पूरी तरह बिगड़ने से रोको, लेकिन पूरी तरह सुलझाने की कोशिश भी मत करो. ऐसा इसलिए भी कि एन युद्ध के दौरान यूरोप से लेकर दुनिया की कई बड़ी ताकतों ने अमेरिका का साथ देने से इनकार कर दिया. इससे यह भी संकेत मिलता है कि पश्चिमी एशिया में अमेरिका थोड़ा बैकफुट पर आ सकता है और अपनी मौजूदगी को नए तरीके से री-डिफाइन करेगा.
3. सबसे ज्यादा चिंताजनक हालत इजरायल की होने वाली है. ईरान के मिसाइल और ड्रोन नेटवर्क ने यह दिखा दिया है कि खतरा अब सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहा. इजरायल को अब अपनी एयर डिफेंस क्षमता और मजबूत करनी होगी और साथ ही प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक की रणनीति पर भी ज्यादा जोर देना पड़ सकता है. अब तक यह धारणा थी कि इजरायली अटैक और डिफेंस सिस्टम, दोनों ही बहुत एडवांस हैं. लेकिन, ईरान युद्ध में बंद मुट्ठी खुल गई है. इसका सीधा मतलब है कि इलाके में तनाव कम होने की बजाय और बढ़ सकता है, क्योंकि कोई भी छोटी घटना बड़े टकराव में बदल सकती है.
4. इस पूरे घटनाक्रम का एक और कॉमन पहलू है- प्रॉक्सी वॉर. यह खत्म नहीं होने वाला, बल्कि और जटिल होने जा रहा है. ईरान पहले से ही यमन, इराक और सीरिया जैसे इलाकों में अपने सहयोगी ग्रुप्स के जरिए प्रभाव बनाए हुए है. अब यह नेटवर्क और ज्यादा एक्टिव हो सकता है. छोटे-छोटे हमले, ड्रोन स्ट्राइक्स और लो-इंटेंसिटी कॉन्फ्लिक्ट इस इलाके की नई हकीकत बन सकते हैं. सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन और कुवैत पर नए तरह के खतरे के बादल मंडरा सकते हैं. यानी यहां ऊपर से शांति दिखेगी, लेकिन अंदर ही अंदर टकराव चलता रहेगा.
5. और फिर आता है सबसे बड़ा फैक्टर- एनर्जी और ग्लोबल ट्रेड. होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम ऑयल रूट्स में से एक है. ईरान ने यहां अपनी आक्रामक मौजूदगी से साफ कर दिया है कि वह इसे एक स्ट्रैटेजिक टूल की तरह इस्तेमाल कर सकता है. अगर यहां तनाव बढ़ता है, तो तेल की कीमतें उछल सकती हैं. सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है. और इसका असर सिर्फ पश्चिमी एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ेगा.
इन सारी बातों को जोड़कर देखें, तो साफ है कि सीजफायर किसी स्थायी शांति का संकेत नहीं है. यह एक ऐसे दौर की शुरुआत है जहां सब कुछ एक नाजुक संतुलन पर टिका होगा. ईरान अपने बढ़े हुए कॉन्फिडेंस के साथ आगे बढ़ेगा. अमेरिका सीधे टकराव से बचेगा. इजरायल ज्यादा सतर्क और आक्रामक होगा, और प्रॉक्सी वॉर लगातार जारी रहेगा. असल में पश्चिमी एशिया अब एक ऐसे फेज में दाखिल हो चुका है जिसे ‘नो वॉर, नो पीस’ कहा जा सकता है. यानी न पूरी तरह शांति होगी और न ही खुली जंग, लेकिन तनाव हर वक्त बना रहेगा. जहां हर छोटी घटना बड़े संकट में बदल सकती है.
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा निचोड़ यही है कि लड़ाई भले फिलहाल रुक जाए, लेकिन संघर्ष खत्म नहीं होगा. सच यह है कि अब यह और ज्यादा जटिल, फैला हुआ और खतरनाक रूप लेने जा रहा है. आने वाले समय में पश्चिमी एशिया दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए सबसे बड़ा टेस्टिंग ग्राउंड बना रह सकता है.