दिल्ली सरकार ने बजट 2026-27 में एक सराहनीय कदम उठाया है. करीब 1.3 लाख सरकारी स्कूलों की 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली लड़कियों को मुफ्त साइकिलें देने की तैयारी की गई है. इसके लिए दिल्ली सरकार ने 90 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है. मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की यह योजना निसंदेह लड़कियों को पंखे देने जैसी बात है. पर इस शुभ काम के साथ मुख्यमंत्री को देश की राजधानी में साइकिल सवारों को कितनी जगह मिलती है इस पर भी विचार करना चाहिए. सीएम का मकसद लड़कियों को आसानी से स्कूल पहुंचाना, ड्रॉपआउट कम कराना और लड़कियों को स्वावलंबी बनाना है.शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की दिशा में यह पहल निश्चय ही सराहनीय है.
लेकिन सवाल उठता है कि ये साइकिलें कहां चलाई जाएंगी? दिल्ली की सड़कें आज भी साइकिल चलाने लायक नहीं हैं. पूरी दिल्ली में समर्पित साइकिल ट्रैक का अनुपात देश के अन्य प्रमुख शहरों की तुलना में बेहद खराब है. साइकिल और दुपहिया वाहनों पर होने वाली मौतों का रिकॉर्ड भी डरावना है. इसलिए सरकार को पहले दिल्ली को साइकिल पर चलने लायक बनाना चाहिए.
दिल्ली में समर्पित साइकिल ट्रैक की कुल लंबाई आज भी नगण्य है. हाल ही में यमुना नदी के किनारे 53 किलोमीटर का साइकिल कॉरिडोर बनाने का प्रोजेक्ट शुरू हुआ है, लेकिन वह भी अभी निर्माणाधीन है. और उससे इन बच्चियों को कोई फायदा नहीं होने वाला है. क्योंकि बच्चियों के घर और इस साइकिल ट्रैक से बहुत दूर होंगे. दिल्ली की गलियों में जो साइकिल ट्रैक और फुटपाथ हैं उन पर कब्जा है. आधे से अधिक फुटपाथों पर कारें पार्क हो रही हैं. जिन पाश कॉलोनियों में साइकिल ट्रैक बनाए गएं हैं उसके आस-पास रहने वाली लड़कियां साइकिल ट्रैक से स्कूल नहीं जाती हैं.
मुंबई, कोलकाता या चेन्नई जैसे शहरों की तुलना में दिल्ली का नॉन-मोटराइज्ड ट्रांसपोर्ट (NMT) इंफ्रास्ट्रक्चर बेहद कमजोर है. पुणे में 91 किलोमीटर से ज्यादा साइकिल इंफ्रास्ट्रक्चर है, जिसमें PCMC ने हाल ही में 52 किलोमीटर का UCI-स्टैंडर्ड कॉरिडोर 60 दिनों में पूरा किया है. पुणे का लक्ष्य 75 किलोमीटर का नेटवर्क बनाना है. अहमदाबाद में रिवरफ्रंट पर साइकिल ट्रैक हैं और पुराने प्लान के तहत 16-17 किलोमीटर के ट्रैक बनाए गए हैं. बेंगलुरु में एक समय 17 किलोमीटर का ORR साइकिल लेन था, जो बाद में मेट्रो काम के चलते गायब हो गया, लेकिन शहर अब भी नए ट्रैक बना रहा है.
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दिल्ली में इन शहरों की तुलना में प्रति लाख आबादी या प्रति वर्ग किलोमीटर साइकिल ट्रैक का अनुपात बहुत कम है. दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के अनुसार 2025 में कुल 1,617 सड़क दुर्घटनाओं में मौतें हुईं.साइकिल सवारों की मौतें भी लगातार बढ़ रही हैं. 2022 में 48 साइकिल सवारों की जान गई, जबकि एक रिपोर्ट में पिछले साल 53 मौतों का जिक्र है. टू-व्हीलर दुर्घटनाएं तो रोजाना 50 से ज्यादा मौतें देशभर में हो रही हैं, लेकिन दिल्ली जैसे घने ट्रैफिक वाले शहर में साइकिल सवार और भी असुरक्षित हैं. भारी वाहन, तेज रफ्तार, गड्ढे, पार्किंग और सिग्नल की अनदेखी, सब मिलकर साइकिल को मौत का फंदा बना देते हैं.
सरकार का इरादा अच्छा है, लेकिन योजना अधूरी लगती है. साइकिल बांटने से पहले तीन काम जरूरी हैं. पहला साइकिल ट्रैक का व्यापक नेटवर्क. यमुना कॉरिडोर अच्छी शुरुआत है, लेकिन पूरे शहर में कम से कम 200-300 किलोमीटर सुरक्षित, अलग और जुड़े हुए ट्रैक चाहिए. दूसरा,सड़क डिजाइन में बदलाव. हर नई सड़क और फ्लाईओवर पर साइकिल लेन अनिवार्य हो जाना चाहिए.अन्यथा यह योजना अच्छी नीयत के साथ एक और कागजी योजना साबित होगी. सरकार को चाहिए कि बजट का कुछ हिस्सा साइकिल इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगाए. जब दिल्ली साइकिल चलाने लायक हो जाएगी, तभी 1.3 लाख लड़कियों को साइकिल देना सार्थक होगा.सुरक्षा पहले, साइकिल बाद में. दिल्ली सरकार को यह प्राथमिकता बदलनी होगी.