क्या उत्तर प्रदेश में फिर से सपा-बसपा गठबंधन के संकेत मिल रहे हैं? अखिलेश यादव के बयान से तो यही संकेत मिलता है. 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले सूबे में सत्ताधारी बीजेपी की तैयारियां भी बता रही हैं कि दलित वोटर पर हर किसी की नजर अभी से टिकी हुई है.
2019 के आम चुनाव में ढाई दशक पुराने गेस्ट हाउस कांड के बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी के बीच चुनावी गठबंधन हुआ था. लेकिन, चुनाव खत्म होने के कुछ दिन बाद ही मायावती ने अखिलेश यादव से नाता तोड़ लिया था. अब करीब 7 साल बाद फिर से वैसे ही संकेत मिले हैं. उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा के लिए चुनाव होने हैं.
जोरदार चुनावी तैयारियों के तो मायावती ने भी संकेत दिए हैं, लेकिन बीजेपी दलित राजनीति पर अब ज्यादा ही फोकस नजर आ रही है. दलित वोटों के लिए आंबेडकर के नाम पर तो राजनीति होती ही रही है, बीजेपी ने अभी से लेकर चुनावों तक के लिए दलित पॉलिटिक्स को ध्यान में रखते हुए लगातार कार्यक्रम तैयार कर लिया है.
सिर्फ दलित वोटों के लिए या कुछ और भी?
उत्तर प्रदेश में बीजेपी सत्ता में वापसी की हैट्रिक के मुहाने पर खड़ी है. हाल फिलहाल के ज्यादातर विधानसभा चुनाव भी जीतती आई है. अकेले भी, और गठबंधन के साथ भी. हरियाणा से लेकर बिहार तक, वाया दिल्ली. लेकिन, यूपी को लेकर 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से बेफिक्र अब तक नहीं हो पाई है.
2024 के लोकसभा चुनाव में दलित वोटर के समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की तरफ चले जाने के बाद से ही भारतीय जनता पार्टी सोशल इंजीनियरिंग की कवायत में जुट गई है. 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव ने बीजेपी को कई मोर्चों पर करीब करीब बेफिक्र कर दिया था, लेकिन उसके दो साल बाद ही लोकसभा चुनाव में सीटें कम हो जाने के कारण नए सिरे से सोचने को मजबूर होना पड़ा.
अब बीजेपी की रणनीति दलित महापुरुषों, उनकी विरासत और समाज के लोगों से चुनाव तक लगातार संवाद बनाए रखना है. हाल ही में एक कार्यक्रम में केंद्र की बीजेपी सरकार की उपलब्धियों का जिक्र करते हुए केंद्रीय मंत्री अमित शाह 2014 के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान का हवाला देते हुए समझा रहे थे कि कैसे सरकार ने देश के संसाधनों पर पहला अधिकार गरीबों, दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को दिया है.
बीजेपी उत्तर प्रदेश में जिस तरह बड़े पैमाने पर आयोजन करने जा रही है, उसमें पहला कार्यक्रम संत गाडगे महाराज की 150वीं जयंती पर होने जा रहा है. राज्य भर में प्रस्तावित ऐसे कार्यक्रमों के पूरे साल का कैलेंडर पहले से ही तैयार कर लिया गया है. ये कार्यक्रम बीजेपी के एससी-एसटी मोर्चा की तरफ से आयोजित किए जाएंगे.
शुरुआत 23 फरवरी को संत गाडगे महाराज जयंती समारोह मनाए जाने को लेकर बीजेपी नेतृत्व की तरफ से सभी जिला इकाइयों को निर्देश जारी कर दिए गए हैं. संत गाडगे महाराज महाराष्ट्र के धोबी समुदाय से आते हैं. उसके बाद नंबर आएगा यूपी में दलित राजनीति को सत्ता तक पहुंचाने के आर्किटेक्ट बीएसपी के संस्थापक कांशीराम की जयंती पर कार्यक्रम. पहले कांशीराम की जयंती और पुण्यतिथि पर मायावती और बीएसपी का एकाधिकार हुआ करता था. बाद में भीम आर्मी वाले चंद्रशेखर आजाद भी हिस्सेदार बनने की कोशिश में जुट गए, और अब बीजेपी मिशन मोड में है.
आंबेडकर के नाम पर तो सभी राजनीतिक दलों में पहले से ही होड़ मची रहती है, बीजेपी ने इसके लिए दलित विभूतियों का दायरा बढ़ा दिया है. बीजेपी के कैलैंडर में कांशीराम, संत गाडगे और आंबेडकर के साथ साथ जिन दलित महापुरुषों को जगह दी गई है, वे हैं - संत रविदास, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, उदा देवी, झलकारी बाई, वीरा पासी, लखन पासी, रमाबाई आंबेडकर और अहिल्याबाई होल्कर जैसी करीब एक दर्जन से ज्यादा दलित और वंचित समाज के महापुरुष. ऐसी विभूतियों की सूची में तिलका मांझी और बिरसा मुंडा को भी शामिल किया गया है.
एक मीडिया रिपोर्ट में यूपी बीजेपी के एससी मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष रामचंद्र कन्नौजिया बताते हैं, हमें दलित समुदाय और अन्य कमजोर वर्गों का भरोसा जीतना है और अन्य वर्गों (सवर्ण और ओबीसी) के साथ आत्मीयता की भावना कायम करनी है. पार्टी के इन प्रतीकों को श्रद्धांजलि देने और समाज में उनके योगदान की चर्चा करना ही ऐसे आयोजनों का असली मकसद है. रामचंद्र कन्नौजिया कहते हैं, ऐसे कार्यक्रमों में बीजेपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकारों की तरफ से एससी और एसटी समाज के लिए किए गए काम भी बताने की कोशिश करेगी.
सपा-बसपा गठबंधन की कितनी संभावना?
हाल ही में नसीमुद्दीन सिद्दीकी समाजवादी पार्टी में शामिल हुए हैं. कभी मायावती के बेहद करीबी रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी को बीएसपी से 2017 में निकाल दिया गया था. बाद में वह कांग्रेस में शामिल हुए, लेकिन कुछ दिनों पहले वहां से भी नाता तोड़ लिया. नसीमुद्दीन सिद्दीकी मायावती की कैबिनेट में चार बार मंत्री रह चुके हैं.
जिस दिन नसीमुद्दीन सिद्दीकी समाजावादी पार्टी में शामिल हुए, अलग अलग दलों से काफी कार्यकर्ताओं ने भी अखिलेश यादव का नेतृत्व स्वीकार किया. मौके को पीडीए समारोह नाम दिया गया था, और अखिलेश यादव ने बताया कि पारंपरिक होली मिलन से पहले पीडीए होली मिलन का कार्यक्रम हुआ है.
पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के माध्यम से लोगों के बीच भाईचारे और सहयोग को मजबूती मिलने की उम्मीद जाहिर करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं - और आगे और भी गहरे होंगे.
समाजवादी और दलित राजनीति के पुराने रिश्ते की मजबूती को समझाते हुए अखिलेश यादव ने कहा, कभी बीआर आंबेडकर और राम मनोहर लोहिया ने मिलकर राजनीति को नई दिशा देने की कोशिश की थी, लेकिन परिस्थितियों और राजनीतिक माहौल ने उन्हें पर्याप्त समय नहीं दिया.
अखिलेश यादव ने 2019 में मायावती के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की याद दिलाते हुए कहा, गठबंधन बने और बाद में टूट भी गए, लेकिन हमें उम्मीद है कि आने वाले समय में हम मिलकर उस संघर्ष को मजबूत करेंगे.
मायावती की क्या तैयारी है?
2019 में बीएसपी से गठबंधन टूट जाने के बाद भी मायावती के प्रति 2022 के यूपी विधानसभा में अखिलेश यादव का काफी नरम रुख देखने को मिला था. लोहिया और आंबेडकर की राजनीतिक जुगलबंदी जैसी बातें चुनाव के दौरान भी वह किसी न किसी बहाने करते देखे गए थे. लेकिन, ये सब एकतरफा रहा. मायावती ने चुनाव के शुरू से आखिर तक सख्त रुख ही अपनाए रखा.
यूजीसी नियमों को लेकर हाल ही में सोशल साइट एक्स पर मायावती का बयान आया था. ये बयान भी 2027 के चुनावों को लेकर मायावती की सक्रियता से जोड़कर देखा गया. मायावती बीएसपी के संस्थापक कांशीराम की जयंती के मौके पर 15 मार्च को लखनऊ और नोएडा में बड़े आयोजनों की तैयारी कर रही हैं - और ये सब ऐसे वक्त हो रहा है जब दलित वोटों को लेकर अखिलेश यादव और बीजेपी में मची होड़ भी महसूस की जा रही है.
बीजेपी तो मायावती के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर दिखा ही रही है, अखिलेश यादव की बातें भी वैसा ही जाहिर करती हैं. चाहे वो योगी आदित्यनाथ हों या बाकी बीजेपी नेता जिस वक्त वे समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के खिलाफ आक्रामक रुख दिखाते हैं, मायवती पर सीधे हमले से बचते रहे हैं. तरीका अलग सही, अखिलेश यादव और बीजेपी दोनों में से कोई भी मायावती को टार्गेट कर उनके समर्थक और वोटर को नाराज होने देने से बचने की कोशिश कर रहे हैं.
बीएसीपी 2022 के यूपी चुनाव में सिर्फ एक सीट जीत पाई थी, और 2024 के लोकसभा चुनाव में एक भी नहीं. रामजी गौतम का कार्यकाल खत्म होते ही बीएसपी राज्यसभा में भी जीरो बैलेंस पर पहुंच जाएगी.