नेपाल को नया प्रधानमंत्री मिला है. 35 साल का. वह रैपर है. कर्नाटक के एक कॉलेज से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में मास्टर्स. उसने चार बार के प्रधानमंत्री को उन्हीं के गढ़ में करीब 50,000 वोटों से हराया है. बच्चे दीवाने हो गए हैं.
ठीक ही है.
बालेंद्र शाह, जिन्हें बस बालेन कहा जाता है, 2025 के Gen Z प्रदर्शनों के दौरान राष्ट्रीय स्तर पर उभरे. इन प्रदर्शनों ने नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था को उसकी पुरानी, चरमराती हड्डियों तक हिला दिया था. काठमांडू के अनोखे मेयर, बुलडोजर बालेन, अतिक्रमण और लालफीताशाही हटाने के लिए लोकप्रिय थे. पोस्टरों पर वही चेहरा था. गानों में वही आवाज थी. यहां एक इंजीनियर था, जो समझता था कि किसी देश की असली भार सहने वाली दीवारें कंक्रीट की नहीं, बल्कि भरोसे की होती हैं. और यह भी कि नेपाल की राजनीति दशकों से उन्हीं परिवारों, उन्हीं पार्टियों और उसी घिसे-पिटे म्यूजिकल चेयर के खेल के बोझ तले ढह रही थी. उसने भ्रष्टाचार पर गाया. असमानता पर रैप किया. उसका सबसे मशहूर ट्रैक ‘बलिदान’ राजनीतिक भ्रष्टाचार की आलोचना करता था और वो युवाओं से सीधे जुड़ गया. ऑनलाइन खूब चला. उसके राजनीतिक सफर से पहले ही उसकी पहचान बना गया. इस संवाददाता ने भी उसकी इस रैप क्रांति के सम्मान में एक रैप लिखा था, जिसने सरकार गिरा दी. और यह भी भविष्यवाणी की थी कि अगला वही होगा. बालेन वही बदलाव है, जिसकी नेपाल को चाहत है.
युवाओं ने सुना. वे सड़कों पर उतरे. उन्होंने वोट दिया.
5 मार्च के आम चुनाव में, पूर्व टीवी एंकर रबी लामिछाने की पार्टी, राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (RSP), 165 में से 90 से ज्यादा सीटों पर बढ़त के साथ सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी. लेकिन इस ‘नायक’ का चेहरा रबी नहीं थे. वह केपी शर्मा ओली के सामने अनिल कपूर नहीं थे. वह बालेन थे. वही नायक थे. झापा-5 में बालेन ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को अपमानजनक अंतर से हराया. 27 मार्च को शाह ने नेपाल के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. RSP मुश्किल से चार साल पुरानी है और बालेन का राजनीतिक अनुभव सिर्फ काठमांडू के मेयर का कार्यकाल था. RSP भारत की आम आदमी पार्टी जैसी है, चलिए कम से कम दिल्ली में तो.
नेपाल के लिए यह सुबह वैसी ही थी, जैसी दिल्ली में AAP की जीत के बाद सागरिका घोष ने एक पोस्ट में लिखी थी. नेपाल के मामले में यह एक गीत था, जिसमें युवाओं का कोरस जुड़ गया था. और वह अपने चरम पर पहुंच चुका था.
फिर पहली कैबिनेट बैठक हुई. फिर 100 सूत्रीय एजेंडा आया. और उसी महत्वाकांक्षी, रिफॉर्मवादी, प्रोग्रेसिव डॉक्यूमेंट में एक ऐसा फैसला छिपा था, जिसमें इतनी बड़ी विडंबना थी कि आपको उसे दो बार पढ़ना पड़े. फिर तीसरी बार. फिर कागज नीचे रखकर कुछ देर छत को देखना पड़े.
बालेन शाह सरकार ने कैंपसों से पॉलिटिकल स्टूडेंट यूनियनों पर प्रतिबंध लगा दिया और सरकारी कर्मचारियों व शिक्षकों के लिए राजनीतिक जुड़ाव पर रोक लगा दी. जिस आदमी ने छात्र आंदोलन की लहर पर सवार होकर देश की सबसे ऊंची कुर्सी पाई, उसने अपने शासन के पहले ही फैसले में छात्रों से कहा- राजनीति से दूर रहो.
इसे फिर से पढ़िए.
विद्रोही ने विद्रोह पर रोक लगा दी. प्रदर्शनकारी गायक ने प्रदर्शन को खामोश कर दिया. Gen Z आइकन ने Gen Z की तरफ देखा और कहा- अब जाओ, पढ़ाई करो. डीजे ने प्लग खींच लिया. इसमें कुछ लगभग शेक्सपीयर जैसा है. न पूरी त्रासदी. न पूरी कॉमेडी. वह असहज तीसरी विधा. जहां आप हंसते हैं, लेकिन हंसी गले में अटक जाती है.
90 दिनों के भीतर पॉलिटिकल स्टूडेंट यूनियनों की जगह छात्र परिषदें बना दी जाएंगी. गैर-राजनीतिक संस्थाएं. जिनके नाम होंगे, जैसे ‘वॉइस ऑफ स्टूडेंट्स’ आदि आदि. गौर से देखें तो ऐसे नामों में एक राजनीतिक गहराई है, ऐसे संगठन जिसे खास तौर पर राजनीति न करने के लिए बनाया गया है. छात्रों की आवाज, शायद हर चीज पर बोलेगी, सिवाय उन बातों के, जिन पर बोलना सबसे जरूरी है.
उनके समर्थकों की बात भी पूरी तरह गलत नहीं है. नेपाल के कैंपस लंबे समय से छात्र संगठनों के कारण जाम पड़े रहे हैं. वे पढ़ाई से ज्यादा बंद आयोजित करने में लगे रहते थे. परीक्षा परिणाम महीनों लटकते रहे. अकादमिक कैलेंडर पार्टियों के एजेंडे का बंधक बना रहा. सरकार का तर्क है कि यह कदम राजनीतिक दखल खत्म करने और छात्रों को असली आवाज देने के लिए है. निराशा समझ आती है. निदान से सहानुभूति भी होती है.
लेकिन समस्या इलाज में है.
आप बुखार का इलाज थर्मामीटर हटाकर नहीं कर सकते. हमारे इस प्रिय जंबूद्वीप या उपमहाद्वीप में छात्र राजनीति बेशक पार्टियों के कब्जे में रही है. भ्रष्ट भी हुई है. लेकिन इसी ने प्रधानमंत्री भी दिए हैं, स्वतंत्रता सेनानी भी, ट्रेड यूनियन नेता भी, और कभी-कभी देश की अंतरात्मा भी. खराब राजनीति का हल बेहतर राजनीति है. हाइजैक हुए युवा आंदोलनों का हल, इतिहास में कभी भी, उन्हें बंद करना नहीं रहा. बल्कि उन्हें कब्जे में लेना मुश्किल बनाना रहा है.
बालेन शाह यह जानते हैं. उन्होंने इसे जिया है. वह खुद यही थे.
शाह और RSP के पास 2025 के जनविद्रोह पर आगे बढ़ने और युवाओं की आकांक्षाओं को पूरा करने का ऐतिहासिक मौका है. लेकिन हर मौके के साथ जोखिम आता है. सबसे बड़ा जोखिम वही है, जो हर क्रांतिकारी को सत्ता में आते ही घेर लेता है- कि अब व्यवधान पैदा करने वाले औजारों को किनारे रख देना चाहिए, क्योंकि अब ‘सही लोग’ सत्ता में हैं.
यह राजनीति की सबसे पुरानी कहानी है. बाहरी अंदर आता है. फिर अंदरूनी बन जाता है. सीढ़ी ऊपर खींच ली जाती है. जरूरी नहीं कि बुरी नीयत से. कई बार सबसे अच्छे इरादों से. और इतिहास बताता है कि चिंता तब सबसे ज्यादा करनी चाहिए. मैं उन नामों का जिक्र नहीं करूंगा, जो अभी आपके दिमाग में आ रहे हैं. क्योंकि जब आप खुद उन्हें देख ही रहे हैं, तो नाम लेने का क्या मतलब.
बालेन और RSP संस्थापक रबी लामिछाने के बीच का रिश्ता ‘सुविधा की शादी’ है, जैसा एक विश्लेषक ने कहा. बालेन को पार्टी चाहिए थी. रबी को बालेन का करिश्मा. ऐसी शादी आपको बाकी शादियों की तरह ऐसी बातों से अवगत कराती हैं जिनकी आपने कल्पना भी नहीं की होती.
नेपाल इससे बेहतर का हकदार है, जितना इन क्रांतियों ने आसपास और बाहर दिया है. बांग्लादेश थोड़े समय की क्रांति के बाद फिर उसी पुराने परिवार में लौट गया. पाकिस्तान ‘हाइब्रिड मॉडल’ पर लौट आया, जब वहां के क्रांतिकारी सेना से स्वतंत्रता की तलाश में भटक गए. दिल्ली वापस बीजेपी के पास चली आई.
नेपाल अपनी क्रांति के पूरे वादे का हकदार है. बालेन शाह युवा हैं. तेज हैं. उनके पास ऐसा जनादेश है, जिसके लिए पुराने नेता अपने पोते-पोतियों तक को बेच दें. 100 सूत्रीय एजेंडे में बहुत कुछ सच में साहसी है.
लेकिन शासन करना इंजीनियरिंग नहीं है. आप भार सहने वाले स्ट्रक्चर को बैन करके इमारत खड़ी नहीं रख सकते. जिन युवाओं ने बालेन शाह को सत्ता में पहुंचाया, वे इसलिए नहीं निकले थे कि एक दिन एस्टैब्लिशमेंट का एक ज्यादा स्मार्ट, ज्यादा ‘कूल’ संस्करण उन्हें चुप बैठने को कहे. वे इसलिए निकले थे कि कोई भी कभी उन्हें चुप न करा सके.