राजनीति में कुछ नेता रनवे पर नहीं चलते, वे सीधे कॉकपिट में बैठते हैं. अजित पवार ऐसे ही नेता रहे हैं. बारामती की मिट्टी से उठकर उन्होंने बहुत कम समय में महाराष्ट्र की राजनीति में वह उंचाई पाई, जहां की तेज हवा में बहुत से नेता टिक नहीं पाते. क्योंकि गलती की गुंजाइश शून्य होती है. यह यात्रा एक ऐसे विमान की तरह रही, जिसका टेक-ऑफ तेज था, क्रूज़ स्पीड डराने वाली, टर्बुलेंस लगातार और अंततः बारामती के आसमान में एक ऐसा राजनीतिक क्रैश, जिसने सवाल छोड़ दिए कि क्या यह अंत है या किसी नए ’अजित पवार’ का जन्म?
अजित पवार की राजनीति का टेक-ऑफ विरासत के रनवे से हुआ. पायलट शरद पवार थे. जिन्होंने अजित पवार को सीधे को-पायलट की कुर्सी पर बैठा लिया. और वह शुरुआती लिफ्ट दी जो किसी भविष्य के पायलट को चाहिए होती है. भरोसा, नेटवर्क और सत्ता के नक्शे की समझ. अजित पवार की पढ़ाई-लिखाई औसत रही. पिता की मृत्यु के बाद कॉलेज छोड़ दिया ताकि परिवार की मदद कर सकें. लेकिन राजनीतिक समझ तेज थी. कॉओपरेटिव, सिंचाई, गन्ना बेल्ट और रूरल महाराष्ट्र. यहीं से उनके इंजन को शुरुआती ईंधन मिला. पहली ही उड़ान में यह साफ था कि यह पायलट धीमी शुरुआत नहीं करेगा.
एक बार हवा में आने के बाद अजित पवार ने क्रूज स्पीड पकड़ ली. 1982 में एक शुगर फैक्ट्री के बोर्ड में चुने जाने से लेकर 1991 में बारामती लोकसभा सीट जीतने तक. अजित पवार पहली बार सांसद बने और उतनी जल्दी उन्होंने यह पद त्याग भी दिया. ताकि चाचा शरद पवार संसद जा सकें, और नरसिंह राव मंत्रिमंडल में रक्षा मंत्री बन सकें. अजित पवार ने यही भरोसा कमाया, जिसके चलते वे बाद में महाराष्ट्र सरकार में मंत्री रहे और छह बार रिकॉर्ड उपमुख्यमंत्री. बजट और सिंचाई जैसे भारीभरकम विभाग, सब उनके कॉकपिट में आ गए. बारामती से मुंबई तक संदेश साफ था- फैसले तेज होंगे, आवाज ऊंची होगी और सत्ता का इस्तेमाल बिना हिचक होगा. समर्थकों के लिए वह ‘डिसीजन-मेकर’ थे, आलोचकों के लिए ‘ओवर-कंट्रोलिंग पायलट’. मगर ऊंचाई पर पहुंचते-पहुंचते इस विमान का वजन बढ़ चुका था. महत्वाकांक्षा, परिवार के भीतर शक्ति संघर्ष और आरोपों का अतिरिक्त कार्गो.
टर्बुलेंस: भ्रष्टाचार के आरोप और छवि का दबाव
हर लंबी उड़ान में टर्बुलेंस यानी हिचकोले आते हैं. अजित पवार के लिए यह टर्बुलेंस भ्रष्टाचार के आरोपों के रूप में आया. सिंचाई परियोजनाएं, कोऑपरेटिव सोसायटी, ठेके और सत्ता का केंद्रीकरण. भले ही कानूनी रूप से कई आरोप साबित न हो पाए हों, लेकिन राजनीतिक उड़ान में ‘परसेप्शन’ ही एयर-प्रेशर तय करता है. यहीं से विमान में हल्की-हल्की वाइब्रेशन शुरू हुई. परिवार के भीतर भी संकेत मिलने लगे कि कॉकपिट में बैठा पायलट अब अकेला नहीं उड़ रहा है. विरोधियों ने आरोप लगाया कि अजीत पवार के विमान में बीजेपी की वॉशिंग मशीन भी है. जो लगातार उन पर लगे आरोपों की धुलाई करती रहती है, और उन्हें एनडीए सहयोगी के रूप में चमकदार बनाती है. लेकिन, एनडीए के साथ उनका रिश्ता अचानक नहीं बना.
राजनीति में ईंधन बदलना जोखिम भरा होता है. कभी कांग्रेस-एनसीपी की हवा, कभी बीजेपी-एनडीए की दिशा. अजित पवार ने फ्यूल-स्विच कई बार बदला. 2019 की सुबह-सुबह की देवेंद्र फडणवीस के साथ शपथ से लेकर बाद की राजनीतिक जोड़-तोड़ तक. उन्होंने दिखाया कि संकट में वे ‘ऑटो-पायलट’ नहीं, मैनुअल कंट्रोल पसंद करते हैं. बीजेपी के लिए वह शरद पवार की सियासत में एंट्री गेट बने. और यही भूमिका उनकी ताकत भी बनी, और कमजोरी भी. क्योंकि इस स्विचिंग ने भरोसे के इंस्ट्रूमेंट्स को हिला दिया.
हर विमान जब खतरे में होता है, तो मे-डे सिग्नल देता है. अजित पवार का मे-डे तब साफ सुनाई दिया जब पार्टी टूट की कगार पर पहुंची. परिवार दो ध्रुवों में बंटा और यह सवाल उठा कि क्या वे शरद पवार की छाया से बाहर निकल पाए हैं या उसी छाया में दिशा खो बैठे हैं? लोकसभा, विधानसभा, पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों में उन्होंने अपनी जगह बनाई, लेकिन यह जीतें स्थिर उड़ान की गारंटी नहीं बन सकीं. सत्ता थी, पर सुकून नहीं. कुर्सी थी, पर नियंत्रण बिखर रहा था.
असफल लैंडिंग: बारामती में राजनीतिक हादसा
हर पायलट चाहता है कि लैंडिंग साफ हो. खासकर अपने होम-एयरपोर्ट पर. बारामती अजित पवार का वही एयरपोर्ट है. दुखद यह है कि बुधवार सुबह हुए विमान हादसे ने अजित पवार को जीवन लील लिया. कई बार नियति ऐसे खिलवाड़ करती है, जिसमें पैसेंजर के प्रोफेशनल रिस्क का कोई लेना देना नहीं होता है. बारामती की हवाई पट्टी पर लैंड होते होते विमान फिसल गया. इस दुर्घटना ने जनाधार, परिवार, नैतिकता और भविष्य, इन सबका संतुलन बिगड़ दिया है. यह महज विमान दुर्घटना नहीं, बल्कि एक राजनीतिक क्रैश भी है. महाराष्ट्र की राजनीति का एक अहम इंजन अचानक शांत हो गया है. धुंआ निकल रहा है.
हर क्रैश के बाद ब्लैक बॉक्स खोजा जाता है. अजित पवार के राजनीतिक ब्लैक बॉक्स में क्या रिकॉर्ड होगा? क्या सत्ता की जल्दी ने निर्णयों को जोखिम भरा बनाया? क्या परिवार के भीतर संवाद की कमी ने दिशा-सूचक यंत्र को जाम कर दिया? क्या बीजेपी के साथ समीकरण केवल टेम्पररी रनवे साबित हुए? इन सवालों के जवाब भविष्य तय करेंगे. लेकिन मलबे की राख से क्या कोई नई राजनीतिक राह जन्म लेगी. राजनीति में विरासत नेताओं के क्रैश के बाद भी लौटी है. कुछ ने राख से खुद को फिर गढ़ा, कुछ हमेशा के लिए ग्राउंडेड हो गईं. अजित पवार परिवार की पार्टी NCP के पास संगठन है और अभी भी एक कैडर भी है. बस, अजित पवार जैसा निर्णायक नेता चला गया है. एनडीए सहयोगी होने के नाते NCP को ईंधन तो मिलता रहेगा. लेकिन सवाल ये होगा कि NCP एक विमान है, कोई ड्रोन नहीं जो रिमोट से उड़ाया जाए. अजित पवार की विरासत को लेकर चिंतित लोग उनके बेटे पार्थ की ओर देख रहे होंगे. लेकिन, अभी सब शोक में है. महाराष्ट्र में जिन लोगों ने अजित पवार के साथ काम किया है, उनके आंसू बता रहे हैं कि महराष्ट्र ने क्या खोया है.