मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. यह आदिवासी बहुल जिला मातृ मृत्यु दर के मामलों में लगातार चर्चा में बना हुआ है. आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में मातृ मृत्यु दर के मामलों में मध्य प्रदेश का स्थान दूसरे नंबर पर है और शहडोल सहित कई आदिवासी जिलों में यह राष्ट्रीय औसत से भी अधिक है.
जिले में कुल दो सिविल अस्पताल, सात सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और 32 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं. लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि 32 पीएचसी में से किसी में भी स्त्री रोग विशेषज्ञ मौजूद नहीं हैं. इसके अलावा 16 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पूरी तरह डॉक्टर विहीन हैं. सिर्फ सात सीएचसी में से सिर्फ एक में ही स्त्री रोग विशेषज्ञ की तैनाती है.
ब्यौहारी ब्लॉक के 100 बिस्तर वाले सिविल अस्पताल की स्थिति भी चिंताजनक है. यहां विशेषज्ञ डॉक्टरों के 16 पद और मेडिकल ऑफिसर के 6 पद स्वीकृत हैं, लेकिन कुल 22 पदों के मुकाबले केवल दो डॉक्टर ही कार्यरत हैं. ग्रामीण क्षेत्रों से प्रसूताओं की सबसे अधिक मौत के मामले सामने आते हैं.
स्त्री रोग विशेषज्ञ की कमी से बढ़ रही मातृ मृत्यु दर
प्रसव पीड़ा होने पर परिजन पहले पीएचसी ले जाते हैं, जहां नर्स और एएनएम सामान्य प्रसव कराती हैं. लेकिन जटिल स्थिति होने पर मरीजों को जिला अस्पताल रेफर किया जाता है. समय पर रेफरल और इलाज न मिलने पर प्रसूता और नवजात दोनों की जान को खतरा बढ़ जाता है. वर्ष 2025-26 में शहडोल जिले में अलग अलग कारणों से 38 प्रसूताओं की मौत हो चुकी है, जिससे स्थिति की गंभीरता और बढ़ गई है.
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ राजेश मिश्रा ने भी स्वीकार किया है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की कमी बड़ी समस्या है. उन्होंने बताया कि जिले में एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है, जिसके तहत एएनएम और नर्सों को सुरक्षित प्रसव के लिए ‘स्किल लैब ट्रेनिंग’ दी जा रही है.
ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसव के दौरान बढ़ रहा जोखिम
प्रदेश सरकार की ओर से हर संभाग में मेडिकल कॉलेज खोलने और डॉक्टरों की उपलब्धता के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन शहडोल की स्थिति इन दावों पर सवाल खड़े करती है. विशेषज्ञों की कमी और कमजोर स्वास्थ्य ढांचे के कारण मातृ मृत्यु दर में अपेक्षित सुधार नहीं हो पा रहा है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में चिंता बनी हुई है.