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भोजशाला विवाद में नया मोड़: 1935 में धार रियासत ने इसे 'मस्जिद' घोषित किया था, MP हाई कोर्ट में मुस्लिम पक्ष का बड़ा दावा

भोजशाला विवाद में मुस्लिम पक्ष ने MP हाई कोर्ट में 1935 का 'राजपत्र' पेश किया. दावा किया कि धार रियासत ने इसे मस्जिद घोषित किया था. ASI और सरकार के बदलते स्टैंड पर भी उठाए सवाल. पढ़ें कोर्ट की पूरी अपडेट...

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MP हाई कोर्ट में भोजशाला पर बहस जारी.(File Photo:ITG)
MP हाई कोर्ट में भोजशाला पर बहस जारी.(File Photo:ITG)

मध्य प्रदेश के धार जिले स्थित ऐतिहासिक स्मारक भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद मामले में मुस्लिम पक्ष ने हाई कोर्ट के सामने एक अहम दस्तावेज पेश किया है. सीनियर वकील शोभा मेनन ने दावा किया कि तत्कालीन धार रियासत की अदालत ने 24 अगस्त 1935 को एक 'ऐलान' जारी कर इस परिसर को आधिकारिक रूप से 'मस्जिद' घोषित किया था.

वकील शोभा मेनन ने हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी के सामने मुस्लिम समुदाय के मुनीर अहमद और अन्य लोगों की ओर से दायर हस्तक्षेप याचिका और रिट अपील के समर्थन में दलीलें पेश कीं.

1935 के 'ऐलान' का दावा

मुस्लिम समुदाय की ओर से पैरवी करते हुए वकील शोभा मेनन ने दलील दी कि 1935 का यह आदेश एक राजपत्र (Gazette) के समान था, जिसमें शर्त रखी गई थी कि भविष्य में भी यहां नमाज अदा की जाती रहेगी.  

उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि इस मामले को धार्मिक चश्मे से देखने के बजाय 'कानून के स्थापित सिद्धांतों' और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर परखा जाए. बता दें कि ब्रिटिश राज के दौरान धार मध्य भारत में भोपाल एजेंसी के अधीन एक रियासत थी.

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मेनन ने हाई कोर्ट से आग्रह किया कि वह भोजशाला विवाद को धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि कानून के सिद्धांतों के आधार पर परखे. उन्होंने विरोधाभासों की ओर इशारा करते हुए पिछले कुछ वर्षों में भोजशाला के धार्मिक स्वरूप को लेकर दायर अदालती मामलों में मध्य प्रदेश सरकार और ASI की ओर से अलग-अलग समय पर व्यक्त की गई भिन्न-भिन्न राय का हवाला दिया. 

शोभा मेनन ने कहा कि इस तरह बार-बार बदलते रुख कानून की नजर में असंगत, मनमाने और अस्वीकार्य हैं, क्योंकि सरकार से एक सुसंगत और स्थिर दृष्टिकोण अपनाने की उम्मीद की जाती है.

जनहित याचिकाओं पर सवाल

उन्होंने भोजशाला मामले में 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' नामक संगठन कुलदीप तिवारी और एक अन्य व्यक्ति की ओर से दायर दो जनहित याचिकाओं पर सवाल उठाए. इन याचिकाओं में कहा गया है कि भोजशाला असल में एक सरस्वती मंदिर है और इस परिसर में पूजा-अर्चना का अधिकार केवल हिंदुओं को ही मिलना चाहिए.

इन PILs की स्वीकार्यता पर सवाल उठाते हुए मेनन ने तर्क दिया कि भोजशाला विवाद को व्यापक जनहित का मामला मानना ​​कानूनी रूप से सही नहीं है, क्योंकि यह मुख्य रूप से एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय से जुड़ा मामला है.

भोजशाला मामले में सुनवाई बुधवार को भी जारी रहेगी. हाई कोर्ट 6 अप्रैल से लगातार चार याचिकाओं और एक रिट अपील पर सुनवाई कर रहा है, जिनमें इस स्मारक के धार्मिक स्वरूप को चुनौती दी गई है.

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हिंदू समुदाय धार जिले में स्थित भोजशाला को देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद होने का दावा करता है. यह विवादित परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है. 

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