तीस जनवरी 1982 की सुबह ... दिल्ली के तिहाड़ जेल के एक अंधेरे ख़ामोश गलियारे में ... पांच लोग खामोशी से चल रहे थे... उनके आगे दो पुलिस वाले थे... दोनों तरफ सीली हुई दीवारें थी... और एक अजीब सी सड़न थी... ऊंची छत वाले गलियारे के दोनों तरफ कैदियों के सेल थे... जिनकी सलाखों से सटे हुए वो खूंखार अपराधी अपनी फैली हुई आंखों से उन पांच लोगों को चलता देख रहे थे....
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ये पांच लोग दरअसल जर्नलिस्ट थे... इनमें एक थीं जर्नलिस्ट प्रभा दत्त जो अपनी वक्त की बेहद मशहूर और कामयाब पत्रकार थीं। आप हमारे वक्त की सीनियर जर्नलिस्ट बरखा दत्त को तो जानते होंगे... ये उनकी मां थीं... प्रभा दत्त... उस वक्त वो हिंदुस्तान टाइम्स की चीफ रिपोर्टर हुआ करती थीं। तो प्रभा दत्त और बाकी चार जर्नलिस्ट उन दो पुलिस वालों के पीछे-पीछे चल रहे थे ... कि तभी पुलिस वाले एक बैरक के सामने ठहर गए... और उन्होंने इशारा किया... पत्रकारों ने उस अंधेरी कोठरी में देखने की कोशिश की.... एक शख्स दिखाई दिया... जो अंधेरे में दिवार की तरफ मुंह करके बैठा था... चौबीस घंटे के बाद इस आदमी को फांसी होनी थी... इसे और इसके एक साथी को जो दूसरी कोठरी में था। ये हिंदुस्तान में पहली बार हुआ था कि फांसी की सज़ा सुनाए जाने के बाद अपराधी का इंटरव्यू होना था, कोर्ट की परमिशन से। “जसबीर...” एक पत्रकार ने आवाज़ दी तो ज़मीन पर बैठे उस कैदी ने आहिस्ता से गर्दन घुमाई... उसके चेहरे पर सलाखों की परछाई पड़ रही थी... खौफनाक आंखे और माथे पर कट का निशान... ये था अपने समय का वो ख़ूखार क्रिमिनल जिसकी मौत के 48 साल बाद, आज भी... उसका और उसके साथी का नाम नफ़रत से लिया जाता है... किडनैपिंग का इकलौती ऐसी कहानी जिसके बाद प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगा गया... वो केस जिसमें विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर सफेद कुर्ता खून से लाल हो गया... ये है हिंदुस्तान की सबसे वीभत्स और साथ ही साथ... सबसे उदास कहानी... ये कहानी है रंगा-बिल्ला की.
साल 1978 से.... 26 अगस्त रात करीब सवा दस बजे... दिल्ली के विलिंगटन हॉस्पिटल (जिसे अब आप राममनोहर लोहिया हॉस्पिटल कहते हैं) उसके कैजुअलटी वार्ड में दो लोग हड़बड़ाए हुए अंदर आए... नौजवान थे... एक के सर पर बहुत गहरी चोट थी... खून बह रहा था... उसने अपना नाम बताया विनोद... और कहा कि कुछ लोगों ने उसे मारा-पीटा, लूटपाट की है... पुलिस केस था तो अस्पताल में पुलिस बुलायी गयी... मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन के सब-इंस्पेक्टर रामचंद्र एक और कांस्टेबल के साथ वहां पहुंचे.... उनके आते ही वो कुछ घबरा गए। इंस्पेक्टर ने पूछा, “कैसे हुआ ये” ज़ख्मी आदमी बोला “साहब ये जो बंग्ला साहिब रोड पर एक मंदिर है न... काली माता मंदिर... तो... आ... मैं... मैं... वहीं पर चार-पांच लोग थे... मुझे घेर लिया... मैं अकेला था... वो लोग मेरा बटुआ छीनने लगे... मुझे पीटने लगे... तो ... उसी में ये ये चोट लग गयी... देखिए, देखिए कितनी गहरा चोट है” इंस्पेक्टर ने दूसरे शख्स की तरफ देखा... वो बोला, “आ... साहब मैं... मैं तो... मैं हरभजन हूं... मैं तो इत्तिफाक से... बस वहां से अपनी कार में गुज़र रहा था... तो... मैंने... आ... मैंने देखा ये वहां रोड पर पड़ा कराह रहा था... तो ... तो मैंने सोचा कि आ... इसे अस्पताल लेकर आता हूं.. तो बस...”
- “क्या नंबर है तुम्हारी कार का...
- साहब वो FIAT है DHI 280
- रहते कहां हो...
- मोती नगर C -124
ज़ख्मी आदमी के टाके लगाए गए... और कहा गया कि अगली सुबह पुलिस स्टेशन आकर कंपेल्ट लिखवाए.. दोनो चले गए.... लेकिन जिस वक्त ये अस्पताल में आए थे... यानि सवा आठ बजे... ठीक उसी वक्त... इसी अस्पताल से 12 किमी दूर...धौला कुआं के ऑफिसर एनक्लेव के एक घर में... रेडियो चल रहा था... कुछ बच्चों के गाने की आवाज़ आ रही थी। ये घर था... मदन मोहन चोपड़ा और उनकी पत्नी रोमा चोपड़ा का... मदन साहब नेवी में ऑफिसर थे। उन्हें इंतज़ार था रेडियो पर अपने बच्चों की आवाज़ का... साढ़े सोलह साल की गीता (उनकी बेटी) और चौदह साल का संजय (बेटा)
दोनों शाम के 6:15 बजे घर से निकले थे संसद मार्ग पर ऑल इंडिया रेडियो के दफ्तर के लिए... रिकॉर्डस के हिसाब से उस दिन पूरे दिन रुक रुक कर बारिश हुई थी... दोनों बच्चों को अंग्रेज़ी गानों का शौक था... और ऑल इंडिया रेडियो के युगवाणी में ‘in the groove’ नाम का शो था... जिसमें उन्हें वेस्टर्न गाना गाना था...
मां-बाप खुश थे कि वो बच्चो की आवाज़ रेडियो पर सुनेंगे... मदन साहब और रोमा चोपड़ा... रेडियो पर कान लगाए थे... लेकिन साढे आठ के बाद भी संजय और गीता की आवाज़ रेडियो पर नही आई... नौ बजे उन्हें फिक्र हुई। वैसे आज आपको ये थोड़ा अजीब लग रहा होगा कि 15-16 साल के बच्चों को अकेल भेज दिया... पर ये बात आज की नही है... ये उस वक्त की बात है जब दिल्ली ऐसी नहीं थी जैसी आज है... उस वक्त लोग आण तौर पर अजनबियों से लिफ्ट ले लिया करते थे... ये 48 साल पहले की दिल्ली थी... ख़ैर, मदन साहब स्टूडियो पहुंचे लेकिन वहां उन्हें बताया गया कि बच्चे तो आए ही नहीं। अब मदन साहब को घबराहट हुई। उन्होंने अपने नेवी के दोस्तों को फोन मिलाया और फिर धौला कुआं थाने में मिसिंग रिपोर्ट दर्ज कराई गई।
रात सवा 10:00 बजे के करीब पुलिस की गाड़ी उनके घर पहुंची। बताया गया कि शाम पौने सात बजे... नॉर्थ दिल्ली पुलिस के सेंट्रल कंट्रोल रूम में एक फोन आया था। भगवानदास नाम के शख्स ने बताया कि उसने बांग्ला साहब गुरुद्वारा से नॉर्थ एवेन्यू की तरफ जाते हुए एक कार देखी, लेमन कलर की फिएट जिसकी पिछली सीट में एक लड़का और एक लड़की थे... जो चीख रहे थे... गाड़ी का नंबर था MR 8930
इससे कुछ देर बाद राजेंद्र नगर पुलिस स्टेशन में भी कॉल आई..... इंद्रजीत नाम के शख्स ने बताया कि उसने भी एक कार देखी जिसमें
बताया गया कि लोहिया अस्पताल के पास एक तेज रफ्तार कार कॉल करने वाले के स्कूटर के पास से गुजरी। अगली की सीट पर दो लोग थे.. और पीछे एक लड़का-लड़की... लड़की चीख रही थी... लड़के की कमीज़ खून से तरबतर थी... वो मदद के लिए इशारा कर रहा था... इंद्रजीत ने बताया कि उसने कार का पीछा किया लेकिन कार शंकर रोड पर रेड लाइट जंप करके भाग गयी।
ये ब्योरा कितना डरावना है... जिस मां और बाप को उनकी औलाद के बारे में ये ब्यौरा मिला होगा... बस तसव्वुर कीजिए कि उन पर क्या बीती होगी... कैसा महसूस किया होगा... भगवान, खुदा... जो भी कायनात के पर्दे के पीछे है... उससे क्या कहा होगा...
ख़ैर, तो उस ज़माने में चौराहों पर कैमराज़ तो होते नहीं थे... कि मूवमेंट ट्रैक कर सकते... कोशिश की गयी... लेकिन कुछ हाथ नहीं आया। रात गुज़री सुबह हुई। सुबह हुई तो दिल्ली के एक पुलिस स्टेशन में
अगली सुबह यानि 27 अगस्त दिल्ली के मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन में इंसपेक्टर रामचंद्र इंतज़ार कर रहे थे उस शख्स का उन्हें रात को अस्पताल में मिला था... ज़ख्मी था... जिसे उन्होंने सुबह आने को कहा था... वो नहीं आया तो उन्हें शक हुआ... उसके बताए एड्रैस सी-124 मोती नगर पर पुलिस पहुंची... पता फर्ज़ी निकला...
आगरा, मथुरा और हरियाणा तक सर्च पार्टी भेजी गई। बच्चों या किडनैपर का सुराग देने वाले के लिए 2000 के इनाम का ऐलान भी हुआ। लेकिन तीन दिन गुजरने के बाद भी बच्चों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई। जो नंबर कार का पता चला था वो फर्ज़ी निकला।
सोचिए मदन साहब और उनकी पत्नी की वो रात कैसे गुज़री होगी... वो रात, उसका अगला दिन, उसके अगले का अगला दिन... क्या क्या ख़्याल उनके ज़हन से गुज़रे होंगे... अपने वो बच्चे जिन्हें रात में उठ-उठ कर मां चादर उढ़ाती थी, कभी उनके सो जाने के बाद उनके सोते हुए चेहरों कमरे की हल्की पीली रौशनी में देर तक मुस्कुरा कर देखती थी... वो जब किसी बात पर रोते-रोते गुदगुदी लगाने पर हसने लगते थे... वो जो रूठने के बाद तकिया में मुंह छुपा कर चुपके चुपके मां की तरफ देखते थे कि वो मनाने आ रही है या नहीं... वो बच्चे... वो एक कार की पिछली सीट पर खून से लथपथ देखे गए थे... अगर आप मां हैं, या पिता हैं तो ये डर... आप महसूस कर पाएंगे...
अफसोस कि 29 अगस्त को ये डर सच साबित हुआ... घर से सिर्फ चार किलोमीटर दूर... एक चरवाहे को दिल्ली में ही रिज में घूमते हुए एक लड़की की लाश दिखाई दी... ये जगह आज की दिल्ली के नक्शे के हिसाब से Buddha Jayanti Park के आसपास समझिये... जो Karol Bagh, Rajendra Nagar और Dhaula Kuan के बीच के रिज एरिया है। उस समय यहां काफी घना जंगल था और आवाजाही ना के बराबर थी...
चरवाहे ने पुलिस को ख़बर की... पुलिस आई देखा तो कुछ दूर एक लड़के की लाश भी थी। मदन चोपड़ा और रोमा चोपड़ा को बुलाया गया। शिनाख्त हुई और ये गीता और संजय ही थे। संजय के पास अब भी ₹70 पड़े थे जो वो घर से लेकर निकला था.... गीता की उंगली में उसकी चांदी की अंगूठी थी।
पुलिस तहकीकात शुरू हुई.... लेकिन जिस वीभत्स तरीके से दो जान ली गयी थीं... वो डरावना था... उस वक्त जनता पार्टी की सरकार थी... मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री थे... जैसे जैसे ये ख़बर शहर में पहुंची... लोग सड़कों पर आने लगे... नारे बाज़ी शुरु हुई और प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग होने लगी...
पुलिस अब दोगुनी ताकत से तहकीकात में लग गयी और 31 अगस्त को मजलिस पार्क में पुलिस को उसी मॉडल की कार मिली जो चश्मदीदो ने बताई थी हलांकि उसका नंबर अलग था... लेकिन जब चेक किया गया तो नंबर प्लेट बदल दिया गया था.... कार खोली गयी... तो अंगर मिली पालतू जानवर को बांधने वाली चेन... और बहुत सारे ब्लेड्स.... ब्लेड्स से याद आया कि कार के चश्मदीद कॉलर ने बताया था कि लड़के की कमीज़ खून से लाल थी... इसके अलावा सिगरेट के टुकड़े, बालों के गुच्छे और खून के धब्बे। दो बच्चों के साथ उस कार में क्या हुआ था... जितनी बार सोचिये... दिल कांप जाता है।
दिल्ली में यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स सड़कों पर आ गए... जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे थे... कमिश्नर साहब के घर के बाहर भी भीड़ जुटी थी... मेरे उम्र लोगों में आवाम के गुस्से की जो याददाश्त निर्भया के वक्त की है, ये उससे भी बड़ी थी... उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी साहब विदेश मंत्री थे... जीसस एंड मैरी कॉलेज की लड़कियों ने भी प्रदर्शन किया जहां गीता पढ़ती थी... जब वाजपेयी उनसे बात करने पहुंचे तो पत्थरबाज़ी शुरु हो गयी... और उछलता हुआ एक पत्थर अटल जी के माथे से लगा... उनका सफेद कुर्ता खून से लाल हो गया। दुनिया ने देखा था कि उसी दिन वाजपेयी साहब सर पर पट्टी बांधे लोकसभा पहुंचे थे... और अगले दिन केस सीबीआई ने अपने हाथों में ले लिया था।
केस और बारीकी से जांचा गया... सुराग इकट्ठा हुआ.. लेकिन कुछ मिला नहीं... कुछ भी नहीं... लेकिन फिर आई इस केस की सबसे अहम तारीख... लगभग दो हफ्ते बाद की तारीख... आठ सितंबर 1978 ... ट्रेन कालका मेल ने आगरा स्टेशन को क्रॉस किया ही था... कि दो लोग ट्रेन में चढ़े। इत्तिफाक से डिब्बा आर्मी जवानों के लिए रिज़र्व था... आर्मी जवानों ने उतरने के लिए कहा तो दोनों अजीब अकड़ में थे कि उनसे भिड़ गए... तभी कुछ फौजियों ने उनका चेहरा देखा तो लगा कि उन्हें कहीं देखा है... फिर ख्याल आया कि ये चेहरे उन्होंने अखबार में देखे हैं। सोचिए कितने शातिर क्रिमिनल जिन्होंने जुर्म इतनी सफाई से किया कि जांच एजेंसियां भी चकमा खा गयीं... कोई सबूत नहीं, कोई ट्रेस नहीं... लेकिन वो एक दिन खुद ही ट्रेन में पकड़ लिये गए... फौजियों ने उन्हें रस्सी से बांधा और अगले स्टेशन पर पुलिस के हवाले कर दिया। पूछताछ हुई तो साफ हुआ द ये थे अपने समय़ के सबसे खूंखार क्रिमिनल – रंगा और बिल्ला। असली नाम कुलजीत सिंह और जसबीर सिंह। दोनों की मुलाकात मुंबई में हुई... वहा इन्होंने छोटे मोटे क्राइम किये और फिर ये दिल्ली आ गए। इस किडनैपिंग का मकसद फिरौती मांगना था... लेकिन फिर जब पता चला कि ये नेवी ऑफिसर के बच्चें हैं तो उन्होंने बच्चों की हत्या कर दी.. ताकि ट्रेस न किया जा सके। बाद में रंगा ने अपने बयान में कहा, “लड़के को हमने पहले ही मार दिया था... लड़की को मैं खींच कर उधर ले जा रहा था जिधर लड़के की लाश थी... मैं उसके दाहिनी तरफ चल रहा था..बिल्ला ने मुझे इशारा किया और मैं आगे चलने लगा... उसने लड़की की गर्दन पर ताकत से वार किया..वो मर गयी... लाश हम झाड़ी में फेंक कर चले गए...”
गिरफ्तारी के बाद पूरे देश में रंगा बिल्ला के खिलाफ ज़बरदस्त गुस्सा था। 26 नवंबर 1979 को हाई कोर्ट ने फांसी के फैसला सुनाया... हालांकि उसके बाद वो सुप्रीम कोर्ट गए, प्रेसिडेंड के पास याचिका दी... फैसला नही बदला। फांसी से पहले कुछ पत्रकार उन दोनों का इंटरव्यू लेना चाहते थे, सरकार ने इसकी इजाज़त नहीं दी लेकिन पत्रकार कोर्ट चले गए और कोर्ट ने जर्नलिस्ट्स के पक्ष में फैसला सुनाया.. जिसके बाद, भारत के इतिहास में पहली बार सज़ा-ए-मौत के कैदियों का इंटरव्यू हुआ, वो भी जेल में। हालांकि रंगा ने बातचीत से इनकार कर दिया लेकिन बिल्ला यही कहता रहा की वो बेगुनाह है...
31 जनवरी 1982 को जब रंगा-बिल्ला को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई तो उस वक्त एक जेल अधिकारी थे... सुनील गुप्ता साहब... 2019 में उनकी किताब ब्लैक वॉरंट आई जिसमें उन्होंने लिखा कि फांसी दिए जाने के बाद बिल्ला की मौत तो फौरन हो गई लेकिन रंगा की फंदे से लटकने के बाद भी नब्ज़ चल रही थी। वो लंबा और दुबला था और शायद उसने सांस रोक रखी थी इसलिए उसकी नब्ज़ रुक नहीं रही थी... फिर एक पुलिस कर्मी को execution pit में उतारा गया... वो जो गहरा सा गड्ढा होता है जिसमें ब़ॉडी लटकती है... पुलिस वाला उसमें उतरा और रंगा के पैर पकड़कर उसे नीचे की तरफ खींचा गया... ताकि उसकी मौत कंफर्म हो सके
रंगा बिल्ला आखिरकार मर गए... कहने को दुनिया कहने लगी कि जो किया उसका हिसाब हो गया... लेकिन मदन साहब और रोमा जी की आंखें के उस इंतज़ार का क्या... जो अब कभी खत्म नहीं होगा।