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जहर बन रहा खाने का तेल, WHO मानक भी फेल... PM की अपील में गहरा संदेश

विदेशी तेलों के भारी आयात के जो आंकड़े सामने आए हैं, उन्होंने सेहत को लेकर चिंता और बढ़ा दी है. इनमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी पाम ऑयल की है, जिसे सेहत के लिए किसी 'टाइम बम' से कम नहीं माना जाता. डॉक्टर भी इसे बेहद नुकसानदायक बताते हैं.

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विदेशी तेल के भारी आयात की जो लिस्ट सामने आई है, वो सेहत के लिहाज से डराने वाली है. (Photo: ITG)
विदेशी तेल के भारी आयात की जो लिस्ट सामने आई है, वो सेहत के लिहाज से डराने वाली है. (Photo: ITG)

PM मोदी ने देश के लोगों की सेहत और तिजोरी दोनों को चौतरफा बर्बादी से बचाने के लिए बिगुल फूंक दिया है. यह कोई मामूली सलाह नहीं, बल्कि देश के बजट को लग रहे डेढ़ लाख करोड़ रुपये के तगड़े झटके और भारतीयों के शरीर को खोखला कर रहे 'धीमे जहर' के खिलाफ पीएम का सीधा सर्जिकल स्ट्राइक है.

बाहर के चटखारे, जंक फूड के चस्के और बदलते खानपान ने देश के सामने एक ऐसी दोहरी आफत खड़ी कर दी है जिसने सरकार के माथे पर गहरी चिंता की लकीरें खींच दी हैं. जिस बेहिसाब रफ्तार से भारतीय घरों में खाने का तेल खौल रहा है, उसने देश को एक डरावने मुहाने पर ला खड़ा किया है.

जहां एक तरफ आम जनता का दिल हांफ रहा है, नसें ब्लॉक हो रही हैं और सेहत सीधे ICU की तरफ भाग रही है, तो दूसरी तरफ विदेशी तेल के अंधाधुंध आयात के बोझ तले देश की इकोनॉमी का भट्ठा बैठ रहा है.

इस दोहरी आफत का सबसे खौफनाक सच यह है कि साल 2019-20 में जो खाद्य तेल आयात 68,558 करोड़ रुपये का था, वो अब दोगुने से ज्यादा बढ़कर लगभग 1.5 लाख करोड़ के पार पहुंच गया है, जिसका सीधा जिम्मेदार तेल का वो बेमेल उपभोग है जिसने 1950-60 के दशक की महज 3.4 किलोग्राम की प्रति व्यक्ति सालाना खपत को आज 6 गुना बढ़ाकर 20.3 किलोग्राम के डरावने स्तर पर पहुंचा दिया है.

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यानी आज हर भारतीय का तेल का चस्का विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सुरक्षित मानकों से लगभग डबल होने को है, और इसी मनमर्जी व डेढ़ लाख करोड़ रुपये के तगड़े झटके के खिलाफ पीएम मोदी ने सीधे रसोई से यह बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक शुरू की है.

पाम ऑयल का आयात 

सरकारी आंकड़ों की यह हकीकत बेहद चौंकाने वाली है कि खाद्य तेलों के मामले में भारत अपनी ही रसोई संभालने में लाचार हो चुका है. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के मुताबिक, साल 2022-23 में देश में कुल खाद्य तेल की खपत 292 लाख मीट्रिक टन थी. इसके मुकाबले अपना घरेलू उत्पादन महज 126.9 लाख मीट्रिक टन ही था. मांग और आपूर्ति के इसी बड़े अंतर को पाटने के लिए भारत को विदेशों से 165 लाख मीट्रिक टन खाद्य तेल मंगाना पड़ा. 

विदेशी तेल के भारी आयात की जो लिस्ट सामने आई है, वो सेहत के लिहाज से और भी ज्यादा डराने वाली है. इस कुल आयात में सबसे बड़ी हिस्सेदारी सिर्फ पाम ऑयल की थी, जो कि 103.9 लाख मीट्रिक टन रही. इस पाम ऑयल को डॉक्टर सेहत का बड़ा दुश्मन मानते हैं. इसके अलावा देश की थाली में विदेशी बाजारों से 39.6 लाख मीट्रिक टन सोयाबीन तेल और 21.45 लाख मीट्रिक टन सूरजमुखी का तेल परोसा गया.

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सेहत की फिक्र

1960 के दशक का वो दौर याद कीजिए, जब भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर खाने का तेल खुद अपनी मिट्टी से पैदा करता था. शुद्ध, खरा और सेहत की 100 फीसदी गारंटी के साथ. लेकिन आज की कड़ाही में जो तेल खौल रहा है, उसने देश की आत्मनिर्भरता और सेहत दोनों की धज्जियां उड़ा दी हैं.

आज आलम यह है कि हम अपनी 57 फीसदी जरूरत के लिए इंडोनेशिया, मलेशिया, रूस, यूक्रेन और अर्जेंटीना जैसे देशों के मोहताज हो चुके हैं. विदेशों से आने वाले इस तेल में सबसे बड़ा हिस्सा उस पाम ऑयल का है, जिसे सेहत के लिए किसी 'टाइम बम' से कम नहीं माना जाता और जिसकी गुणवत्ता पर हमेशा बड़े सवालिया निशान खड़े रहते हैं. 

ऐसे में यह चुभता हुआ सवाल खड़ा होना लाजिमी है कि क्या हम भारतीय वाकई खाद्य तेल के सही मानकों से पूरी तरह अनजान हैं, या फिर हमें अपनी और अपने परिवार की सेहत की कोई फिक्र ही नहीं बची?

सच तो यह है कि बीमारी के इस बढ़ते जाल के पीछे सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सही जानकारी की भारी कमी है. अधिकांश भारतीयों को इस बात का रत्ती भर भी अंदाजा नहीं है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के तय पैमानों के मुताबिक, एक व्यक्ति को साल भर में अधिकतम कितना तेल खाना चाहिए? 

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विदेशी तेल के भारी आयात की जो लिस्ट सामने आई है, वो सेहत के लिहाज से और भी ज्यादा डराने वाली है. इस कुल आयात में सबसे बड़ी हिस्सेदारी सिर्फ पाम ऑयल की थी, जो कि 103.9 लाख मीट्रिक टन रही. इस पाम ऑयल को डॉक्टर सेहत का बड़ा दुश्मन मानते हैं. इसके अलावा देश की थाली में विदेशी बाजारों से 39.6 लाख मीट्रिक टन सोयाबीन तेल और 21.45 लाख मीट्रिक टन सूरजमुखी का तेल परोसा गया.

खाद्य तेल का सुरक्षित पैमाना

खुद को बीमारी से और देश की तिजोरी को कंगाली से बचाने का एक सीधा फॉर्मूला डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने तय कर दिया है. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की गाइडलाइन के मुताबिक, एक स्वस्थ व्यक्ति को साल भर में अधिकतम 12 किलोग्राम ही खाने के तेल का इस्तेमाल करना चाहिए. वहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसमें मामूली राहत देते हुए सालाना प्रति व्यक्ति 13 किलोग्राम खपत का सुरक्षित मानक तय किया है.

पैमाना बिल्कुल साफ और सख्त है. अगर आपकी रसोई में तेल की खपत इस तय सीमा को पार कर रही है, तो आप न सिर्फ साइलेंट किलर बीमारियों को न्योता दे रहे हैं, बल्कि देश की आर्थिक रीढ़ को भी तोड़ रहे हैं. भारत को विदेशी तेल मंगाने के लिए अपनी गाढ़ी कमाई को पानी की तरह बहाना पड़ता है. ऐसे में कड़ाही में पक रहे आपके मनपसंद पकवान हमारे विदेशी मुद्रा भंडार पर बहुत बड़ा डाका डाल रहे हैं. 

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बढ़ती खपत का ह‍िसाब 

भारत सरकार के थ‍िंक टैंक नीति आयोग की एक ताजा रिपोर्ट ने भविष्य की जो खौफनाक तस्वीर दिखाई है, उसने सरकार से लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों तक के होश उड़ा दिए हैं. सवाल बड़ा है कि खाद्य तेलों के मामले में भारत आखिरकार आत्मनिर्भर कैसे बनेगा?

इसी बड़ी चुनौती से निपटने और घरेलू स्तर पर तिलहन उत्पादन को रफ्तार देने के लिए तैयार की गई इस रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि अगर भारतीयों का यह चस्का ऐसे ही बरकरार रहा, तो साल 2028 तक देश में प्रति व्यक्ति खाद्य तेल की सालाना खपत बढ़कर 25.3 किलोग्राम और साल 2038 तक सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए 40.3 किलोग्राम के बेहद डरावने स्तर पर पहुंच जाएगी. 

साफ है कि अगर समय रहते अपनी आदतों पर लगाम नहीं लगाई गई, तो हालात पूरी तरह बेकाबू होने वाले हैं. डॉक्टरों का साफ कहना है कि कड़ाही में तैरता यह तेल आज घर-घर में साइलेंट किलर बन चुका है, जिससे हार्ट अटैक, एसिडिटी, मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और बैड कोलेस्ट्रॉल जैसी जानलेवा बीमारियां महामारी का रूप ले रही हैं.

आलम यह हो चुका है कि देश के आम नागरिक की गाढ़ी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा अब अच्छे खान-पान पर नहीं, बल्कि अस्पतालों के चक्कर काटने, डॉक्टरों की फीस भरने और महंगी दवाओं को खरीदने में स्वाहा हो रहा.

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खाद्य तेल खपत की रफ्तार

नीत‍ि आयोग की रिपोर्ट ने भारत में तेल के बढ़ते चस्के का जो ऐतिहासिक कच्चा चिट्ठा खोला है, वो यह साफ करता है कि जैसे-जैसे देश में आर्थ‍िक समृद्धि आई और लाइफस्टाइल बदला, भारतीयों ने कड़ाही में तेल उड़ेलने की रफ्तार भी बेकाबू कर दी. साल 1960-61 में देश में प्रति व्यक्ति सालाना तेल की खपत महज 3.2 किलोग्राम थी, जो 1980-81 तक मामूली 1.2 गुना बढ़कर 3.8 किलोग्राम प्रति वर्ष पर पहुंची. 

असली तेजी इसके बाद शुरू हुई, जब 1980-81 से लेकर 2000-01 के बीच यह खपत सीधे 2.2 गुना की छलांग लगाकर 8.2 किलोग्राम प्रति वर्ष पर जा टिकी.सदी के बदलते ही इस चस्के ने सारे बांध तोड़ दिए और साल 2000-01 से 2020-21 के बीच प्रति व्यक्ति सालाना तेल की खपत में 2.4 गुना का भीषण इजाफा दर्ज हुआ, जिससे यह आंकड़ा 19.7 किलोग्राम के खतरनाक स्तर पर पहुंच गया.

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