संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे...यह स्लोगन आप बचपन से सुनते आ रहे होंगे और यकीनन घर में, दोस्तों के साथ या बाथरूम में नहाते हुए आपने यह जरूर गुनगुनाया होगा. इस स्लोगन ने सिर्फ अंडे के महत्व को नहीं बताया बल्कि ना जाने कितने लोग और बच्चों को इसे खाने का शौकीन भी बना दिया है. स्लोगन सालों पुराना है, लेकिन अंडा देखकर आज भी याद आ जाता है.
कई लोगों को लगता है कि यह बस ऐसे ही एक वाक्य है या किताब में लिखी हुई को कविता. असल में ऐसा नहीं है. आपको जानकर हैरानी होगी कि इस स्लोगन को लाने के पीछे एक खास मक्सद था. मक्सद था बच्चों की सेहत का खास ख्याल, गरीबों के लिए हेल्दी और सस्ते खान-पान का प्रबंध और सबसे जरूरी था ऐग इंडस्ट्री को बढ़ावा देना. पूरी कहानी जानने के लिए के लिए आपको साल 1981 में ले चलते हैं...
राष्ट्रीय अंडा समन्वय समिति ने इस तरह बचाया अंडा उधोग का भविष्य
साल 1981 की बात है जब इंडियन ऐग इंडस्ट्री दिन पर दिन डूबती जा रही थी, इसमें बिजनेस करने वाले लोग अपने कदम पीछे खींच रहे थे. हालात इतने बुरे थे कि हर महीने बस घाटा ही नजर आ रहा था. इंडस्ट्री गिरने के साथ-साथ इसका सबसे बड़ा असर रोजगार पर पड़ रहा था. मुर्गी पालन से जुड़े लोग इस दौरान काफी मुश्किलों से गुजर रहे थे. इससे पहले यह उद्योग पूरी तरह डूब जाता, लोगों ने डूबती नाव की डोर पकड़ ली गई और इस तरह कसकर खींचीं कि धीरे-धीरे करके घाटा मुनाफे में बदलने लगा. आइए अब जानते हैं यह कैसे हुआ?
इस तरह हमसे जुड़ता गया अंडा और बन गया हमारी रसोई का अहम हिस्सा
इसका श्रेय वेंकटेश्वर हैचरीज लिमिटेड के डॉ बीवी राव को जाता है, जिन्होंने स्थिति को देखते हुए एक परियोजा बनाने का फैसला लिया, जिसके बाद राष्ट्रीय अंडा समन्वय समिति (एनईसीसी) का जन्म हुआ. इस समिति द्वारा कई नई चीजें लाई गईं और अंडे की मार्केटिंग जोरो शोरों पर शुरू कर दी. इस निगम के आने से पहले अंडे की कीमतें ट्रेडर द्वारा सेट की जाती थीं.
My egg, My price, My life'- अंडे के कीमतों द्वारा होने वाले शोषण को ऐसे रोका गया
दूध उद्योग में ऑपरेशन फ्लड की सफलता से प्रेरित होकर, वेंकटेश्वर हैचरीज लिमिटेड के डॉ बीवी राव ने अंडा उद्योग में एक समान परियोजना शुरू करने का फैसला किया. यह एक कॉपरेटिव मूवमेंट था जिसने ऐग इंडस्ट्री से जुड़े हर इंसान को प्रोत्साहित किया ताकि वह आने वाला कल बदल सकें. अंडे के दामों द्वारा उत्पादकों को शोषण से बचाने के लिए डॉक्टर राव कहते थे- 'My egg, My price, My life'. शुरूआत में राष्ट्रीय अंडा समन्वय समिति भारत का उद्देशय था देश में अंडे की डिमांड को पैदा करना. इसीलिए अंडे को सबसे पहले हेल्थ से जोड़कर लोगों के सामने लाया गया और वाकई सेहत के लिहाज से अंडा काफी लाभदायक भी है.
पेपर में छपा अंडे को लेकर पहला विज्ञापन
लोगों का मानना था कि वह एक अच्छा संतुलित आहार ले रहे हैं ऐसे में उन्हें अलग से अंडे का सेवन करने की जरूरत नहीं है. लोग यह जानते थे कि अंडा हेल्दी है लेकिन उनके शरीर के लिए बेहद लाभदायक है, इस चीज पर अभी तक लोगों ने गौर नहीं किया था क्योंकि अंडे से ज्यादा फ्राइड ऐग, बॉइल्ड ऐग या कुछ 1-2 चुनिंदा डिशेज़ ही बनाई जाती थीं. कहें तो लोगों को अंडा पकाकर खाने में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी. इसी चीज को देखते हुए सबसे पहले पेपर में अंडे के बारे में छापा गया जिसमें लिखा था - “The best square meal in the world?”. इस प्रकाशन में अंडे की न्यूट्रिशनल खासियतों के बारे में बताया गया. इसका मुख्य उद्देशय था बच्चे और गर्भवती महिलाओं को अंडे की ताकत के बारे में बताना. दिन प्रतिदिन अंडे के विज्ञापन में नई-नई चीजें जुड़ती चली गईं, फायदे के साथ-साथ अब अंडे से बनने वाली टेस्टी डिशेज़ के बारे में भी बताया जाने लगा था.
Sunday or Monday, whether served sunny side up, or in a gravy—roz khao ande!- इस स्लोगन के प्रचार ने बदल दिए ऐग इंडस्ट्री के हालात
इसके बाद भारतीय विज्ञापन की दुनिया के बादशाह आनंद हलवे ने एक और स्लोगन का आइडिया पेश किया. ये स्लोगन था Have you had an egg today?. यह राष्ट्रीय अंडा समन्वय समिति (एनईसीसी) की नीव बन गया. इसके बाद टेलेवीजन पर भी ना जानें कितने विज्ञापन दिखाए गए जिसमें जाने माने चेहरों को लाया गया, इसी बीच देवांग पेटल द्वारा एक ऐसा स्लोगन निकला जो देश के हर व्यक्ति के दिमाग में बैठ गया, जो था- 'संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे'...इस स्लोगन को बढ़ावा देने के लिए लोगों के बीच पसंद किए जाने वाले चेहरों ने विज्ञापन लिया जैसे दारा सिंह, भरतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सचिन तेंदुलकर, बॉलीवुड एक्टर धर्मेंद्र. विज्ञापन में अंडे पर अलग-अलग तरह के गानें भी बनाए गए. यहां तक कि स्कूल में जीरो नंबर मिलने पर भी कहा जाने लगा कि अंडा मिला है.

और आखिर कार अंडा हमारे डाइट का अहम हिस्सा बन गया
अंडे का विज्ञापन इस तरह से किया गया कि ऐग इंडस्ट्री में अचनाक से बूम आया और वह वापस ट्रैक पर आ गई या कहें तो जितनी उम्मीद थी उससे भी कई ज्यादा मुनाफा होने लगा. इस चीज का असर आज भी उतना ही है. सुबह दुकानों पर दूध के पैकेट के साथ अंडे भी बेचे जाते हैं. आज अंडे से ना जानें कितनी तरह की डिशेज़ बनाई जाती हैं. वेज और नॉनवेज के अलावा और ऐगेटेरियन कम्यूनिटी भी है, जो अंडे शौक से खाती है. रेस्तरां से लेकर रेढ़ी पर अंडा भुर्जी, ऑमेलट आदि बेचा जाता है. अंडे ने आज हमारे दिन में खास जगह बना ली है. वाकई अंडा है भी कमाल का. तो संडे हो या मंडे रोज खाओ अंडे...