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मालदा में SIR अफसरों को बंधक बनाने से CJI भी थे हैरान, सुप्रीम कोर्ट में ऐसा था माहौल

मालदा की घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल उठाए और कहा कि न्यायिक अधिकारियों को डराने की साजिश थी. कोर्ट ने केंद्रीय बलों की सुरक्षा, कारण बताओ नोटिस और सीबीआई या एनआईए जांच के निर्देश दिए हैं.

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चीफ जस्टिस ने कहा मालदा की घटना अदालत के अधिकारियों को चुनौती देने की निर्लज्ज कोशिश  (Photo: ITG)
चीफ जस्टिस ने कहा मालदा की घटना अदालत के अधिकारियों को चुनौती देने की निर्लज्ज कोशिश (Photo: ITG)

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को रोजाना की तरह कार्यवाही शुरू हुई, लेकिन कुछ ही मिनटों में माहौल पूरी तरह बदल गया. Supreme Court of India में चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुआई वाली तीन जजों की पीठ ने पश्चिम बंगाल के मालदा में हुई घटना का जिक्र किया, जिसे सुनकर कोर्टरूम सन्न रह गया.  चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इजलास में बताया कि मालदा में बुधवार दोपहर बाद से लेकर आधी रात के बाद तक जो घटनाक्रम हुआ, वह कानून व्यवस्था, राजनीति और न्यायपालिका सभी के लिए बेहद चिंताजनक है. उन्होंने कहा कि यह मामला लोकतंत्र के लिए भी गंभीर खतरे की तरह है.

उन्होंने विस्तार से बताया कि उन्हें करीब आधी रात को इस घटना की जानकारी मिली. इसके बाद वह रात दो बजे तक सो नहीं सके. इस दौरान वह लगातार राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों और Calcutta High Court के चीफ जस्टिस के संपर्क में रहे. वह बंधक बनाए गए न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा और स्थिति की हर पल जानकारी लेते रहे.

आधी रात तक जागते रहे चीफ जस्टिस

चीफ जस्टिस ने सख्त लहजे में कहा कि उन्हें  राज्य सरकार के चीफ सेक्रेटरी और पुलिस महानिदेशक को आधी रात में मौखिक रूप से कड़े आदेश देने पड़े. इसके बाद ही प्रशासन हरकत में आया. उन्होंने यह भी बताया कि घेराव किए गए एक न्यायिक अधिकारी का पांच साल का बच्चा भी उसी घर में मौजूद था, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई थी. उन्होंने पश्चिम बंगाल प्रशासन से सवाल करते हुए कहा कि रात 11 बजे तक कलेक्टर मौके पर क्यों नहीं पहुंचे. जब उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो उन्हें सख्त रुख अपनाना पड़ा. इसके बाद ही प्रशासन सक्रिय हुआ.

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घटनाक्रम के अनुसार, दोपहर करीब साढ़े तीन बजे से ही लोग न्यायिक अधिकारी के दफ्तर के आसपास जुटने लगे थे और घेराव शुरू कर दिया था. इस दौरान कलकत्ता हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने प्रशासनिक अधिकारियों को सूचित कर तुरंत कार्रवाई करने का अनुरोध किया था. लेकिन रात साढ़े आठ बजे तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.

इसके बाद मामले को और गंभीरता से लेते हुए गृह सचिव से संपर्क किया गया. पुलिस महानिदेशक ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के साथ ग्रुप कॉल भी की और जल्द कार्रवाई का आश्वासन दिया. लेकिन इसके बावजूद जमीन पर कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आई. स्थिति इतनी बिगड़ गई कि कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को अपने पत्र में यह लिखना पड़ा कि न तो जिला मजिस्ट्रेट और न ही पुलिस अधीक्षक मौके पर पहुंचे हैं. इसके बाद उन्हें राज्य के पुलिस महानिदेशक और गृह सचिव को तलब करना पड़ा.

न्यायिक अधिकारियों को डराने की साजिश

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इस पूरे घटनाक्रम को अदालत के अधिकारियों को चुनौती देने का निर्लज्ज प्रयास बताया. उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट रूप से प्रशासनिक लापरवाही का मामला है. साथ ही उन्होंने यह भी जानकारी दी कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान आपत्तियों और दावों के निपटारे के बाद जब न्यायिक अधिकारी आधी रात के बाद घर लौट रहे थे, तब उन पर हमला किया गया. उन्होंने इसे एक योजनाबद्ध साजिश बताया, जिसका उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों को डराना और धमकाना था, ताकि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR प्रक्रिया को बाधित किया जा सके.

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चीफ जस्टिस ने कहा कि यह घटना अदालत के आदेश और अधिकार को चुनौती देने के समान है और यह अदालत की आपराधिक अवमानना के दायरे में आती है. इस मामले को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती के आदेश दिए हैं. साथ ही, पश्चिम बंगाल के शीर्ष अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है.

कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से भी कहा है कि इस घटना की जांच Central Bureau of Investigation या National Investigation Agency से कराई जाए. साथ ही प्रारंभिक जांच रिपोर्ट जल्द अदालत में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं. पीठ ने यह भी कहा कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा के लिए कहीं से भी बलों को बुलाने का अधिकार चुनाव आयोग को दिया जाता है.

केंद्रीय बलों की सुरक्षा और CBI या NIA जांच के दिए निर्देश

अपने आदेश में कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह घटना न्यायिक अधिकारियों को हतोत्साहित करने और प्रक्रिया को बाधित करने के लिए सुनियोजित तरीके से की गई. मुख्य सचिव, डीजीपी और गृह सचिव के आचरण को कोर्ट ने निंदनीय बताया और इस पूरी स्थिति को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया. यह पूरा मामला अब न्यायपालिका, प्रशासन और लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने कई बड़े सवाल खड़े कर रहा है.

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