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विदेशों में घर की नींव के नीचे प्लास्टिक क्यों लगाया जाता है? जानिए इसका बड़ा फायदा

विदेशों में कई आधुनिक बिल्डिंग में नींव के नीचे प्लास्टिक शीट और प्लास्टिक मॉड्यूल लगाए जाते हैं. इससे सीलन कम होती है, कंक्रीट की बचत होती है, पाइप डालना आसान होता है. इससे रिपेयरिंग का खर्च और समय दोनों बचते हैं.

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बड़े प्रोजेक्ट्स में यह बचत काफी महत्वपूर्ण साबित होती है. ( Photo: ITG)
बड़े प्रोजेक्ट्स में यह बचत काफी महत्वपूर्ण साबित होती है. ( Photo: ITG)

घर बनाते समय मजबूत नींव सबसे जरूरी मानी जाती है. लेकिन अगर आपने विदेशों में बनने वाले कुछ आधुनिक घरों के वीडियो देखे हैं, तो आपने देखा होगा कि नींव के नीचे प्लास्टिक की बड़ी-बड़ी शीट और प्लास्टिक के खंभे लगाए जाते हैं. पहली नजर में यह अजीब लग सकता है, लेकिन इसके पीछे इंजीनियरिंग की खास वजह होती है.

क्या होती है यह तकनीक?
इस तकनीक को प्लास्टिक फॉर्मवर्क फाउंडेशन कहते हैं. इसमें जमीन पर पहले मजबूत प्लास्टिक शीट बिछाई जाती है. इसके बाद प्लास्टिक के खास मॉड्यूल या पिलर्स लगाए जाते हैं, जिनके ऊपर स्टील की जाली (रिइंफोर्समेंट) बिछाकर कंक्रीट डाला जाता है. इससे नींव के अंदर एक खोखला हिस्सा बन जाता है. इस तकनीक के क्या फायदे हैं?

1. जमीन की सीलन और नमी से बचाव
इस तकनीक में सबसे पहले नींव के नीचे एक खास तरह की प्लास्टिक मेम्ब्रेन (शीट) बिछाई जाती है. यह परत जमीन में मौजूद नमी और सीलन को ऊपर फर्श तक पहुंचने से रोकने का काम करती है. इसकी वजह से घर के फर्श और दीवारों में सीलन आने की संभावना कम हो जाती है. लंबे समय तक नमी से बचाव होने पर फर्श की उम्र भी बढ़ती है और घर के अंदर फफूंदी या बदबू जैसी समस्याएं भी कम होती हैं.

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2. कंक्रीट और निर्माण लागत में बचत
पारंपरिक नींव पूरी तरह कंक्रीट से भरी होती है, जबकि इस तकनीक में अंदर का हिस्सा खोखला रखा जाता है. इससे उतनी ही मजबूती के लिए कम कंक्रीट की जरूरत पड़ती है. कम कंक्रीट इस्तेमाल होने से निर्माण सामग्री की लागत घटती है और काम भी तेजी से पूरा हो सकता है. बड़े प्रोजेक्ट्स में यह बचत काफी महत्वपूर्ण साबित होती है.

3. पाइप और केबल डालना आसान
नींव के अंदर बने खाली हिस्से का एक बड़ा फायदा यह है कि पानी की पाइपलाइन, सीवर लाइन, बिजली की केबल या इंटरनेट की वायर आसानी से निकाली जा सकती है. अगर भविष्य में किसी पाइप या केबल की मरम्मत करनी पड़े, तो पूरी फर्श तोड़ने की जरूरत कम पड़ती है. इससे रिपेयरिंग का खर्च और समय दोनों बचते हैं.

4. वजन का बेहतर वितरण
इस सिस्टम में नीचे लगे मजबूत प्लास्टिक मॉड्यूल या पिलर्स और उनके ऊपर डाली गई आरसीसी स्लैब मिलकर पूरे भवन का भार समान रूप से जमीन पर पहुंचाते हैं. इससे किसी एक हिस्से पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ता. यही वजह है कि सही डिजाइन और अच्छी गुणवत्ता के निर्माण में नींव अधिक स्थिर रहती है.

5. हल्की लेकिन मजबूत नींव
खोखले ढांचे की वजह से पूरी नींव का कुल वजन कम हो जाता है. जहां मिट्टी बहुत मजबूत नहीं होती या जमीन पर अतिरिक्त भार नहीं डालना होता, वहां यह तकनीक फायदेमंद साबित हो सकती है. कम वजन होने से जमीन पर दबाव भी कम पड़ता है.

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6. पर्यावरण के लिए भी बेहतर
कम कंक्रीट इस्तेमाल होने का मतलब है कि सीमेंट की खपत भी कम होगी. सीमेंट के उत्पादन में बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) निकलती है. इसलिए जहां यह तकनीक उपयुक्त होती है, वहां इसका इस्तेमाल पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को भी कुछ हद तक कम कर सकता है.

क्या इससे कभी दरार नहीं पड़ती?
यह दावा पूरी तरह सही नहीं है कि इस तकनीक वाली नींव में कभी भी दरार नहीं पड़ती. किसी भी बिल्डिंग की मजबूती सिर्फ तकनीक पर नहीं, बल्कि मिट्टी की क्वालिटी, सही इंजीनियरिंग डिजाइन, अच्छी निर्माण सामग्री और सही तरीके से किए गए निर्माण पर निर्भर करती है. यदि इनमें किसी भी स्तर पर कमी रह जाए, तो दरारें आ सकती हैं. हालांकि, सही तरीके से बनाई गई खोखली नींव भार को बेहतर तरीके से वितरित करती है, जिससे कई मामलों में दरार पड़ने और जमीन धंसने का जोखिम कम हो सकता है.

क्या भारत में भी इसका इस्तेमाल होता है?
भारत में भी यह तकनीक धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रही है. बड़े कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, अस्पताल, बेसमेंट, पार्किंग, वेयरहाउस और कुछ हाई-एंड रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स में इसका इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि, आम घरों में अभी भी पारंपरिक आरसीसी नींव ज्यादा प्रचलित है. इसकी वजह यह है कि हर इलाके की मिट्टी, मौसम, भवन का डिजाइन और निर्माण बजट अलग-अलग होता है. इसलिए इंजीनियर साइट की स्थिति को देखते हुए तय करते हैं कि किस तरह की नींव सबसे सुरक्षित और किफायती रहेगी.

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