दिल्ली को देश का दिल कहा जाता है. यूं भी इस शहर को लेकर जो एक लाइन सबसे फेमस है - दिल्ली है दिल वालों की. इस कहावत की खुशमिजाजी को इस शहर के कुछ बेतरतीब इलाके कम कर रहे हैं. इसका ताजा उदाहरण दिल्ली के मालवीय नगर इलाके के एक होटल में लगी आग और उसमें जलकर मरने वाले 21 लोग हैं. इस इलाके की बसावट काफी अव्यवस्थित है. फायर सेफ्टी तो दूर, यहां म्युनिसिपल ऑथरिटी के नियम- कानून और बिल्डिंग बायलॉज भी काम नहीं करते.
दिल्ली जो देश की कैपिटल सिटी है. यहां से दूर रहने वाले लोगों के जेहन में इस शहर की वही तस्वीर कौंधती है, जो फिल्मों और टेलीविजन में दिखाई जाती है. इंडिया गेट के सामने की चौड़ी सड़कें, ऊंची इमारतें, साफ- सुथरी लुटियंस जोन, ये चकाचौंध भरी जगहें दिल्ली के पॉश एरिया हैं. लेकिन, हकीकत कुछ और बयां करती है. दिल्ली महानगर के बीचोबीच कई ऐसे इलाके हैं, जहां कोई बिल्डिंग बायलॉज नहीं है. सड़कें संकरी हैं. पतली- पतली गलियां हैं. बेतरतीब तरीके से बड़ी- बड़ी बिल्डिंग बना ली गई हैं.
क्या है 'लाल डोरा इलाका'
इन इलाकों में चाहकर भी दिल्ली म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन कुछ नहीं कर सकती है. क्योंकि, दिल्ली के अलग- अलग इलाकों का बंटवारा ही सौ साल पहले कुछ इस तरह से किया गया है कि यहां म्युनिसिपल ऑथरिटी के नियम और बिल्डिंग बायलॉज काम नहीं करते. क्योंकि, ये इलाके 'लाल डोरा' के तहत आते हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि यह 'लाल डोरा' है क्या?
दिल्ली में कुछ जगहें लाल डोरा के अंदर आती है. लाल डोरा वाले इलाकों को समझने के लिए हमें अतीत में पीछे जाना होगा. लल्लन टॉप की रिपोर्ट के मुताबिक, 1908 में ब्रिटिश हुकूमत जब दिल्ली के राजस्व रिकॉर्ड का डॉक्यूमेंटेशन कर रहे थे, तो यहां के इलाकों को दो तरह की कैटोगरी में बांट दिया. एक वैसे इलाके जहां लोग रहते थे और दूसरा जहां खेती होती थी.
अंग्रेजों ने लोगों को बसाने के लिए दिल्ली के नक्शे पर कुछ इलाकों को चिह्नित किया, जो खेती वाले जगहों से अलग थे. इन इलाकों को अलग से दर्शाने के लिए इसे लाल रंग की लकीर से घेरा बना दिया. यानी लाल रंग के घेरे के अंदर वाले इन इलाकों को खेती वाली जमीन से जुड़े सख्त नियमों से छूट दे दी गई. ताकि, यहां लोग आसानी से बिना झंझट के घर बनाकर बस सके. लाल घेरे के अंदर वाले इन्हीं इलाकों को लाल डोरा क्षेत्र कहा गया. अंग्रेज इन लाल डोरा वाले इलाके से लगान या टैक्स नहीं वसूलते थे. यहां लोगों को घर बनाकर रहने के लिए टैक्स व अन्य नियम कानून से छूट दे दी गई थी.
सीधे शब्दों में कहें तो लाल डोरा वैसे आवासीय इलाके थे, जिन्हें कृषि क्षेत्र से अलग करने के लिए लाल रंग की लकीर खींच दी गई थी. जब अंग्रेजों ने रेवेन्यू इलाकों का डिमार्केशन किया तो दिल्ली के बीचोबीच ऐसे कई गांव थे, जो लाल डोरा के अंदर आ गए. करीब 360 से ज्यादा गांव लाल डोरा के तहत आ गए थे.
'लाल डोरा' मालवीय नगर हादसे का कनेक्शन
मालवीय नगर में जहां हादसा हुआ, वो जगह हौज रानी के अंदर आता है जो लाल डोरा इलाका है. 1947 में आजादी मिलने के बाद भी 'लाला डोरा' इलके के लिए बने नियम कानून जस के तस बने रहे. क्योंकि, यह एक तरह से आवासीय इलाका माना जाता रहा है. दिल्ली नगर निगम अधिनियम की धारा 507 के तहत इन इलाकों भवन निर्माण के सख्त नियम- कायदे से छूट मिलती रही है.
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जब नई दिल्ली बननी शुरू हुई. तब कई गांव और कृषि क्षेत्र इसके अंदर आ गए, लेकिन, लाल डोरा इलाके को तब भी इससे अलग रखा गया. MCD (म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ दिल्ली) इन लाल डोरा इलाके में कोई छेड़छाड़ नहीं की. अंग्रेजों के जमाने से लेकर आजतक लाल डोरा वाले एरिया में बेतरतीब तरीके से घर और बिल्डिंग बनते रहे. यहां न कोई बायलॉज काम करता है और न कोई सेफ्टी स्टैंडर्ड.
लाल डोरा इलाके में मकान बनवाने के लिए कोई नक्शा पास करवाने की जरूरत नहीं पड़ती. यही वजह है कि मालवीय नगर के हौज रानी इलाके में भी बेतरतीब तरीके से बिल्डिंग बनाए गए. बिना सेफ्टी ऑटिड और सड़कों और नालियों के लिए जगह छोड़े बिना घर बनाए जाने लगे. यही वजह है कि इन इलाकों में गलियां इतनी संकरी है कि फायर ब्रिगेड की गाड़ियां तक नहीं आ सकती.
लाल डोरा इलाकों में ऐसी जगहों पर अगर आग लग जाए तो यह देखते ही देखते बड़े हादसे का रूप ले सकती है. मालवीय नगर अग्निकांड वाले मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ. जहां आग लगी, वहां फायर सेफ्टी के इंतजाम नहीं थी. उस बिल्डिंग में कोई इमरजेंसी एग्जिट नहीं थी. आग लगते ही भयंकर अफरातफरी मची और 20 से ज्यादा लोगों की जान चली गई.
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मालवीय नगर में हुए हादसे ने एक बार फिर से लाल डोरा इलाके और इससे जुड़े सौ साल पुराने ढीले नियमों पर सवाल खड़ा कर दिया है. वहीं नियमों में ढिलाई की वजह बेतरतीब कॉलोनियां से खड़ी हो रही हैं, जो मालवीय नगर जैसे हादसे को आमंत्रित करती हैं. ऐसे हादसे दिल्ली की खुशमिजाजी को छीन रही है.