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जब फर्स्ट वर्ल्ड वॉर से बाहर निकल गया रूस, जर्मनी के साथ की थी संधि

आज के दिन इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना के लिए जाना जाता है. जब दुनिया का पहले महायुद्ध यानी फर्स्ट वर्ल्ड वॉर से रूस ने अपने कदम पीछे खींच लिए थे.

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लेनिन और ट्रॉटस्की ने रूस की तरफ से  ब्रेस्ट-लिटोव्स्क संधि में शामिल हुए थे
लेनिन और ट्रॉटस्की ने रूस की तरफ से ब्रेस्ट-लिटोव्स्क संधि में शामिल हुए थे

आज के दिन 3 मार्च 1918 को रूस की भूमिका प्रथम विश्व युद्ध में खत्म हो गई थी. जब उसने केंद्रीय शक्तियों (जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी, तुर्की) के साथ  ब्रेस्ट-लिटोव्स्क संधि पर अंतिम हस्ताक्षर किया था. यह संधि बेलारूस के ब्रेस्ट-लिटोव्स्क शहर में हुई थी. इसके साथ ही वह इस महायुद्ध से बाहर निकल गया था. 

रूस के इस कदम से मित्रराष्ट्रों खासकर ब्रिटेन और फ्रांस को बड़ा झटका लगा था. उस वक्त रूस में क्रांति का दौर चल रहा था. इस दौरान वहां सत्ता परिवर्तन हुआ और इसके परिणाम स्वरूप तत्कालिक रूसी शासन ने सेंट्रल पावर के साथ एक संधि की और युद्ध से बाहर निकलने का फैसला लिया. रूस की तरफ से लेनिन और ट्रॉटस्की ने सेंट्रल पावर से संधि की पहल की थी.

प्रथम विश्व युद्ध में अपने सहयोगी फ्रांस और ब्रिटेन के साथ युद्ध में रूस की भागीदारी खत्म होने के परिणामस्वरूप जर्मनी के खिलाफ मित्र राष्ट्रों को भारी नुकसान हुआ. हालांकि, इसकी भरपाई ऑस्ट्रिया-हंगरी के खिलाफ लगातार मिली जीत से आंशिक रूप से ही हो पाई. 

युद्ध के मैदान में मिली हार ने रूस की अधिकांश आबादी, विशेषकर गरीबी से त्रस्त श्रमिकों और किसानों के बीच बढ़ते असंतोष को और बढ़ा दिया था. इसके फलस्वरूप अप्रभावी जार निकोलस द्वितीय के नेतृत्व वाली साम्राज्यवादी शासन के प्रति जनता ने क्रांति शुरू कर दी. 

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इस असंतोष ने बोल्शेविकों के आंदोलन को बल दिया, जो व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में एक कट्टरपंथी समाजवादी समूह था और जार के विरोध को संगठित करके उसे एक व्यापक क्रांति में परिवर्तित करने का प्रयास कर रहा था.

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फरवरी क्रांति मार्च 1917 की शुरुआत में भड़क उठी (या जूलियन कैलेंडर के अनुसार फरवरी में, जिसका प्रयोग रूसी उस समय करते थे) निकोलस ने उसी महीने बाद में पद त्याग दिया. अप्रैल के मध्य में लेनिन के निर्वासन से लौटने के बाद उन्होंने और उनके साथी बोल्शेविकों ने रूस के युद्ध मंत्री अलेक्जेंडर केरेन्स्की के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार से सत्ता छीनने के लिए तेजी से काम किया.

6 नवंबर को, रूसी सेना की सहायता से क्रांतिकारी सफल रहे. रूस का नेता बनने के बाद लेनिन के पहले कार्यों में से एक युद्ध में रूस की भागीदारी को समाप्त करना था. दिसंबर 1917 की शुरुआत में युद्धविराम समझौता हो गया और 15 दिसंबर को औपचारिक युद्धविराम की घोषणा कर दी गई, लेकिन रूस और सेंट्रल के बीच शांति की शर्तों का निर्धारण कहीं अधिक जटिल साबित हुआ.

 22 दिसंबर 1917 को ब्रेस्ट-लिटोव्स्क में वार्ता शुरू हुई. अपने-अपने प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व रूस के विदेश मंत्री लियोन ट्रॉट्स्की, जर्मनी के बैरन रिचर्ड वॉन कुहलमान और ऑस्ट्रिया के काउंट ओटोकर चेर्निन ने किया. फरवरी 2018 के मध्य में वार्ता तब टूट गई जब गुस्से में ट्रॉट्स्की ने सेंट्रल पावर की शर्तों को अत्यधिक कठोर और क्षेत्र पर उनकी मांगों को अस्वीकार्य माना. 

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इसके बाद पूर्वी मोर्चे पर कुछ समय के लिए लड़ाई फिर से शुरू हुई, लेकिन जर्मन सेनाएं तेजी से आगे बढ़ीं और लेनिन और ट्रॉट्स्की दोनों को जल्द ही एहसास हो गया कि रूस की स्थिति काफी कमजोर है.  उसी महीने बाद में वार्ता फिर से शुरू हुई और 3 मार्च 1918 को रूस ने अंतिम तौर पर संधि पर हस्ताक्षर किए.

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ब्रेस्ट-लिटोव्स्क संधि की शर्तों के अनुसार, रूस ने यूक्रेन, जॉर्जिया और फिनलैंड की स्वतंत्रता को मान्यता दी. पोलैंड और बाल्टिक राज्यों लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया को जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी को सौंप दिया. कार्स, अर्दहान और बटुम को तुर्की को दे दिया. कुल नुकसान में रूस के पूर्व क्षेत्र का 10 लाख वर्ग मील हिस्सा, उसकी एक तिहाई आबादी यानी 5.5 करोड़ लोग, उसके कोयले, तेल और लोहे के भंडार का अधिकांश हिस्सा और उसके अधिकांश उद्योग शामिल थे. 

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