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सीलन का झंझट खत्म, लाल वाली से मजबूत! क्या फायदे का सौदा है प्लास्टिक वाली ईंटें?

इन दिनों एक नई तरह की ईंट चर्चा में है. यह पारंपरिक लाल ईंट से दोगुनी मजबूत और किफायती है. अब प्लास्टिक कचरे को री-साइकिल कर उससे ईंट बनाई जा रही है. जानते हैं इसके क्या फायदे हैं.

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अब प्लास्टिक के कचरे से बन रही है मजबूत और टिकाऊ ईंटें (Photo - ANI Screengrab)
अब प्लास्टिक के कचरे से बन रही है मजबूत और टिकाऊ ईंटें (Photo - ANI Screengrab)

प्लास्टिक और इससे जुड़ा कचरा पूरी दुनिया में एक बड़ी समस्या बनती जा रही है. हर तरफ बिखरा प्लास्टिक पर्यावरण के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है. ऐसे जहां लोग तेजी से बढ़ते प्लास्टिक की इस समस्या से निपटने का उपाय खोज रहे हैं, वहीं कुछ लोगों को इसमें अवसर दिखाई दिया है और इसके साथ ही प्लास्टिक के कचरे से निपटने का एक बेहतर विकल्प भी सामने आया है. 

कुछ स्टार्ट अप इस समस्या और बेकार प्लास्टिक के कचरे को कच्चे माल के तौर पर देख रहे हैं. इन प्लास्टिक के कचरे का ऐसी चीज बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा है जो दोबारा इस्तेमाल में आ सके. बेंगलुरु में इसी सोच के साथ प्लास्टिक के कचरे का इस्तेमाल ऐसी चीज बनाने में किया जा रहा है जो एक महत्वपूर्ण कंस्ट्रक्शन मटेरियल का नया विकल्प बन रहा है.

 यहां एक फर्म बेकार प्लास्टिक के कबाड़ को पिघलाकर प्लास्टिक की ईंट तैयार कर रहा है. प्लास्टिक से बनीं ईंट नॉर्म ब्रिक की तुलना में दो गुना ज्यादा मजबूत, टिकाऊ और वाटरप्रूफ भी है. प्लास्टिक से ईंट बनाना सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन एक जटिल प्रोसेस के तहत कंस्ट्रक्शन में इस्तेमाल होने वाले ईंट की तरह ही प्लास्टिक ब्रिक भी तैयार की जा रही है. 

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सबसे पहले डंपिंग यार्ड से प्लास्टिक के कचरे को अलग कर इकट्ठा किया जाता है. फिर इसे प्लांट लाया जाता है. प्लांट में अलग- अलग तरह के प्लास्टिक के कबाड़ को छांटा जाता है. फिर मशीनों की मदद से इनके छोटे- छोटे टुकड़े किए जाते हैं और इन्हें प्रोसेस किया जाता है. इसके बाद इन्हें दूसरे वेस्ट मटेरियल के साथ मिलाकर एक कंपोजिट मिश्रण तय किया जाता है. आखिर में इन्हें हाइड्रोलिक प्रेशर से ईंट का आकार दिया जाता है. 

कैसे बनती है ये ईंट
सबसे पहले जो प्लास्टिक को ग्राइंडर में डालकर उसके छोटे- छोटे टुकड़े किए जाते हैं. इसके बाद इसे डेंसिफाई करके कंस्ट्रक्शन वेस्ट के साथ मिलाकर एक कंपोजिट तैयार किया जाता है. फिर इसे सांचों में डालकर, हाइड्रोलिक प्रेशर से ईंट तैयार किया जाता है. यह पारंपरिक लाल ईंट से दोगुना ज्यादा मजबूत होता है. यह वाटरप्रूफ होने के साथ- साथ पानी भी कम सोखती है. 

पारंपरिक लाल ईंट को बनाने में जहां 15 से 20 दिन लगते हैं, वहीं प्लास्टिक की ये ईंटें एक दिन में तैयार हो जाती है. इनके निर्माण में भट्ठों की जरूरत नहीं होती है. इससे प्रदूषण भी काफी कम होता है. प्लास्टिक की ईंट तैयार करने में सिर्फ दो- चार मशीन और कुछ कामगारों की जरूरत होती है. 

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कंक्रीट बनाने में रेत और सीमेंट की जरूरत होती है. इसी जरूरत को देखते हुए सीमेंट और रेत को प्लास्टिक से रिप्लेस करने की सोच ने प्लास्टिक की ईंट को जन्म दिया. इस प्लास्टिक ब्रिक बनाने में उसी सीमेंट और रेत के कंस्ट्रक्शन वेस्ट का भी इस्तेमाल प्लास्टिक के साथ कंपोजिट बनाने में किया जाता है. इस तरह से प्लास्टिक के कचरे को री-साइकिल कर प्लास्टिक ईंट के तौर पर दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है. इससे पर्यावरण पर भी बुरा प्रभाव कम पड़ता है और कंस्ट्रक्शन की लागत भी कम होती है. 

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