आज ईरान और अमेरिका के बीच भीषण जंग छिड़ी हुई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान को मिटा देने पर तुले हैं. उन्होंने इस सभ्यता को खत्म कर देने की धमकी भी दे डाली है. ईरान कोई नया देश नहीं है. इसकी संस्कृति और हजारों साल पुरानी सभ्यता की जड़ें काफी गहरी हैं और इसका फैलाव कई देशों तक है. ऐसे में ईरान जो सदियों पहले आज के अमेरिका की तरह दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति हुआ करती थी, इसके बनने से लेकर आज यह जिस हाल में है, यहां तक पहुंचने की कहानी काफी रोचक है. सरसरी तौर पर नजर डालते हैं ईरान की कहानी पर.
ईरान कोई नया-नवेला देश नहीं है. इसका इतिहास कोई 200 या 500 साल पुराना नहीं है. यह देश कई शक्तिशाली साम्राज्यों के सृजन और पतन का गवाह रह चुका है. इसका अतीत सैकड़ों जंगों और राजा-महाराजाओं की कहानियों को समेटे हुए है. इस एक देश से कई दूसरे देशों के इतिहास का जन्म हुआ है.
इसकी संस्कृति सदियों पुरानी है, जो कई हजार वर्षों तक फैली हुई है. फिर भी मोटे तौर पर ईरान के इतिहास को तीन युगों में विभाजित किया जा सकता है. पूर्व-इस्लामिक प्राचीन काल (लगभग 559 ईसा पूर्व से 651 ईस्वी तक), इस्लामी युग (651 ईस्वी से 1800 ईस्वी तक) और आधुनिक युग, जो लगभग 1800 से शुरू होकर वर्तमान ईरान से जुड़ता है.
ऐसे शुरू हुई ईरान के बनने की कहानी
ईरान का वास्तविक इतिहास ईसा पूर्व दूसरी सहस्राब्दी (2000 ईसा पूर्व) से शुरू होता है. जब मध्य एशिया से मिडियन या मेड्स और फारसी कबीले उन इलाकों में आकर बसने लगे, जिन्हें आज ईरानी पठार के नाम से जाना जाता है. मध्य एशिया से ईरानी पठार में आकर बसने वाली इन जनजातियों को उसी इलाके से भारत आने वाले 'आर्यों' का करीबी संबंधी भी माना जाता है.
मिडियन और फारसी कबीलों के आने से करीब एक हजार साल पहले (3000 ईसा पूर्व) ईरान के पठार के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से (आज का दक्षिणी इराक) में मानव बस्तियां बस चुकी थीं, जो बाद में एलामाइट सभ्यता के रूप में उभरी. इसका मतलब था कि उस इलाके में फारसियों के आगमन से एक हजार साल पहले भी लोग रह रहे थे. फिर धीरे-धीरे मध्य एशिया से आए इन कबीलों ने अपना प्रभाव जमाना शुरू किया और करीब 1000 ईसा पूर्व मेदियों और फारसियों के रूप में दो अलग-अलग ईरानी साम्राज्यों का विकास शुरू हुआ.
फारसी साम्राज्य की शुरुआत अर्ध-खानाबदोश जनजातियों के एक समूह के रूप में हुई थी जो ईरानी पठार पर भेड़, बकरी और मवेशी पालते थे. फारसी साम्राज्य आधुनिक ईरान से जुड़े कई राजवंशों की श्रृंखला का नाम है. इसका इतिहास कई शताब्दियों तक फैला रहा. खासकर छठी शताब्दी ईसा पूर्व से शुरू होकर फारसी सांस्कृतिक विरासत के तौर पर 20वीं सदी तक फैला हुआ है. यही वजह है कि सदियों तक, दुनिया के अधिकांश लोग इस क्षेत्र को फारस के नाम से जानते थे.
हखामनी: पहला फारसी साम्राज्य
फारसी साम्राज्य का प्रभाव ईसा पूर्व 559 में महान साइरस द्वितीय के सत्ता में आने के साथ शुरू हुआ. प्रथम फारसी साम्राज्य की स्थापना साइरस महान ने लगभग 550 ईसा पूर्व में की थी. इन्होंने अपने साम्राज्य को इतिहास के सबसे विशाल साम्राज्यों में से एक बना दिया.
फारसी साम्राज्य पश्चिम में यूरोप के बाल्कन प्रायद्वीप से लेकर पूर्व में भारत की सिंधु घाटी तक फैला हुआ था. लौह युग के इस राजवंश को हखामनी या एकमेनिड साम्राज्य (Achaemenid Empire) भी कहा जाता है. हखामनी राजा धर्मनिष्ठ पारसी थे. इतिहास में ऐसे कई उल्लेख मिलते हैं, जिसमें महान साइरस को एक सहिष्णु शासक बताया गया है, जो अपनी प्रजा को अपनी भाषा बोलने और अपने धर्मों का पालन करने की अनुमति देते थे.
साइरस द ग्रेट को साइरस सिलेंडर में अमर कर दिया गया है, जो एक मिट्टी का सिलेंडर है जिस पर 539 ईसा पूर्व में यह कहानी खुदी हुई है कि कैसे उन्होंने राजा नबोनिडस से बेबीलोन को जीत लिया और नियो-बेबीलोनियन साम्राज्य का अंत कर दिया.
यूरोप से लेकर एशिया और अफ्रीका तक फैला था
साइरस महान के बाद हखामनी साम्राज्य के चौथे राजा दारियस महान का इतिहास में सबसे ज्यादा जिक्र है. उन्होंने फारसी साम्राज्य पर उस समय शासन किया जब वह अपने चरम पर था. दारियस द ग्रेट के शासनकाल में अपने चरम पर, फारसी साम्राज्य यूरोप के बाल्कन प्रायद्वीप से लेकर (वर्तमान बुल्गारिया, रोमानिया और यूक्रेन के कुछ हिस्सों में) उत्तर-पश्चिमी भारत में सिंधु नदी घाटी और दक्षिण में मिस्र तक फैला हुआ था. यहां तक कि अफ्रीका के कुछ हिस्सों, जिनमें लीबिया और मिस्र पर भी इस साम्राज्य का कब्जा था.
आज हम निर्बाध रूप से अफ्रीका, एशिया और यूरोप तक आना-जाना करते हैं. चाहे रास्ता जलमार्ग से होकर जाए या जमीन से. पहली बार अफ्रीका, एशिया और यूरोप - इन तीन महाद्वीपों के बीच परिवहन के नियमित रास्ते बनाने का श्रेय भी फारसी लोगों को जाता है. उन्होंने कई नई सड़कें बनाईं और दुनिया की पहली डाक सेवा विकसित की.
ग्रीक राज्यों को जीतने के अपने असफल प्रयासों और लगभग 150 वर्ष बाद ईसा पूर्व 330 के दशक में मैसिडोनिया के सिकंदर महान की सेना के हमले के बाद हार का सामना करने का साथ ही इस साम्राज्य का पतन हो गया. 480 ईसा पूर्व में फारसी राजा जेरक्सेस प्रथम ने ग्रीस पर असफल आक्रमण किया था. इसके बाद से फारसी साम्राज्य के पतन का दौर शुरू हो गया.
ऐसे खत्म हुआ पहला फारसी साम्राज्य
फारस की जमीन की रक्षा पर भारी खर्च से साम्राज्य का खजाना कम होने लगा. इससे फारस की प्रजा पर टैक्स का बोझ बढ़ने लगा. अंततः 330 ईसा पूर्व में मैसेडोन के सिकंदर महान की सेना ने हमला कर दिया. इसके साथ ही अचमेनिद राजवंश का पतन हो गया. बाद के शासकों ने फारसी साम्राज्य को उसकी अचमेनिद सीमाओं तक ही सीमित रखने का प्रयास किया. इससे पहले फारस 200 से अधिक वर्षों तक संस्कृति, धर्म, विज्ञान, कला और प्रौद्योगिकी का वैश्विक केंद्र बना रहा.
इसके बाद यहां सिकंदर के उत्तराधिकारियों ने कुछ समय के लिए शासन किया. सिकंदर के उत्तराधिकारी सेल्यूसिडों के अधीन यहां हेलेनाइज्ड शासन एक शताब्दी तक चला, जब तक कि पूर्वी इलाके से एक नए ईरानी राजवंश, पार्थियनों का उभार नहीं हुआ था. ईरान के उत्तर पूर्व इलाके, जिसे पर्थिया कहा जाता था. वहां रहने वाले परानी लोग जो मूल रूप से खानाबदोश थे, संगठित होने लगे और हेलेनाइज्ड शासकों के नियंत्रण को नकार दिया.
रोमन साम्राज्य को इस फारसी राजवंश ने दी थी कड़ी शिकस्त
पार्थियन साम्राज्य (लगभग 247 ईसा पूर्व – 224 ईस्वी) ईरान में एक प्रमुख राजनीतिक और सांस्कृतिक शक्ति का केंद्र रहा. इस फारसी राजवंश की स्थापना आर्सेस प्रथम की अगुवाई में पारनी लोगों ने की थी. अपने चरम पर यह साम्राज्य यूफ़्रेट्स नदी से लेकर सिंधु नदी तक फैला हुआ था. एक समय इनका सिल्क रोड पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव था.
इतिहास में इन्हें रोमन साम्राज्य के एक बड़े दुश्मन के रूप में जाना गया. पार्थियन साम्राज्य ने ईरानी इतिहास को नया रूप दिया और आने वाले समय में फारसी साम्राज्य का स्थान ले लिया. ईरान में सबसे लंबे समय तक पर्थियन राजाओं ने शासन किया. करीब 500 सालों तक पर्थियन साम्राज्य प्रभाव में रहा.
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पर्थियन उभरते रोमन साम्राज्य के लिए एक गंभीर शत्रु साबित हुए , जिसने उसे उसकी सबसे बड़ी हार में से एक दी. यह 53 ईसा पूर्व में कैरे के मैदानों में हुए युद्ध में मिली थी. इस जंग में रोमन सेनापति क्रैसस को घुड़सवार तीरंदाजों से बनी एक छोटी पार्थियन सेना ने पराजित कर दिया था. इसके साथ ही रोमनों को अपने इलाके से खदेड़कर भगा दिया था. इस जंग में रोमनों की लगभग दो-तिहाई सेना और कई खत्म हो गई थी. 500 वर्षों तक ईरान पर राज करने के बाद, 224 ईस्वी में पार्थियनों को एक अन्य राजवंश ने उखाड़ फेंका. इस राजवंश का नाम सासानियन था, जो पर्थियन के ही संबंधी थे.
ससानियन: अंतिम पारसी साम्राज्य
सासानियन निस्संदेह पार्थियनों के वंशज थे. उनका साम्राज्य ज्यादा सेंट्रलाइज्ड था. सासानियन ने प्रशासन को सुदृढ़ किया गया और पारसी धर्म को एक आधिकारिक और अधिक स्पष्ट रूप से परिभाषित धर्म के रूप में बढ़ावा दिया. समय के साथ, सासानियन राजा, विशेष रूप से खुसरो द्वितीय, पूर्व-इस्लामिक ईरान और उसके प्रशासन की सभी अच्छाइयों का प्रतीक बन गए. अपने पूर्ववर्तियों की तरह ही ससानियन भी रोमन और फिर बीजान्टिन साम्राज्यों के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे. फिर इनके साथ संघर्षों का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ, जिसने दोनों साम्राज्यों को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया. इस तरह 7वीं सदी तक ससानियन ईरान पर राज करते रहे. जब तक की इस्लाम का प्रभाव इस क्षेत्र में नहीं बढ़ा.
ईरान में इस्लामी युग की शुरुआत
सातवीं शताब्दी में अरब प्रायद्वीप से एक नई शक्ति का उदय हुआ. इसका नाम इस्लाम था. बीजान्टिन साम्राज्य को हराने के बाद मुस्लिम अरब सेनाओं ने आखिरकार सासानियन साम्राज्य पर भी जीत हासिल कर ली और उसे नए खिलाफत में समेट लिया. ईरानी साम्राज्य इतना विशाल था कि इसे पूरी तरह से अपने रंग में रंगना खिलाफत के लिए काफी मुश्किल रहा. ईरान पहुंचने के बाद इस्लाम को नया रूप मिला. वहीं इस्लाम ने ईरानी दुनिया को देखने का नजरिया बदल दिया. वहीं फारस की संस्कृति का इस्लाम पर गहरा प्रभाव पड़ा. ईरानी विचारों ने खिलाफत के विकास की दिशा को आकार देना शुरू कर दिया.
इस्लामी दुनिया की राजनीतिक और धार्मिक संस्कृति को प्राचीन ईरान की गहरी विरासत ने आकार दिया. इसमें महत्वपूर्ण योगदान देने वाले क्लासिक इस्लामिक एरा के विद्वान और वैज्ञानिक इब्न सीना (एविसेना) और बरमकिद्स के प्रसिद्ध वजीर परिवार शामिल हैं, जो ईरानी दुनिया से ताल्लुक रखते थे.
आज का ईरान
इस्लाम के प्रवेश के साथ ईरान का स्वरूप तेजी से बदला. इस पर मंगोलों और दूसरे विदेशी आक्रमणकारियों ने हमला किया. इस पर कभी सफवी राजवंश और भारत को लूटने वाले नादिर शाह का भी लंबे समय तक प्रभाव रहा. 19वीं सदी की शुरुआत के साथ ही ईरान पश्चिम के प्रभाव में आ गया. 20 सदी के मध्य में ईरान एक नए बदलाव के लिए तैयार हुआ और 1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद इसका स्वरूप पूरी तरह बदल गया. इसके साथ ही पूरी दुनिया का नजरिया भी ईरान को लेकर बदलता रहा. आज ईरान में जो कुछ भी हो रहा है. वो सबकुछ 1979 के बाद शुरू हुआ और ऐसा लगता है कि अब इसके निष्कर्ष सामने आ रहे हैं.