मिडिल ईस्ट में जंग के बाद भारत में एलपीजी का संकट देखने को मिल रहा है. कई जगहों पर पेट्रोल-डीजल की मारामारी देखने को मिल रही है. दरअसल, भारत पेट्रोलियम के मामले में दूसरे देशों पर ज्यादा निर्भर है और इस्तेमाल का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से आयात करता है. लेकिन, इसी बीच भारत दूसरे देशों को भी तेल निर्यात कर रहा है. ऐसे में सवाल है कि आखिर युद्ध संकट के बीच भारत कैसे निर्यात कर पा रहा है और क्या भारत के पास पर्याप्त कच्चा तेल है कि निर्यात भी किया जा सके. तो जानते हैं इन सभी सवालों के जवाब...
क्या अभी भी भारत दूसरे देशों को तेल भेज रहा है?
पहले तो आपके बता दें कि भारत लंबे वक्त से तेल का निर्यात करता है. भारत भले ही तेल का प्रोड्यूसर नहीं है, लेकिन तेल का प्रोसेसर है. इसका मतलब है कि भारत पहले दूसरे देशों से कच्चा तेल मंगाता है और फिर उसे रिफाइनरी में रिफाइन करके दूसरे देशों को बेचता है. भारत रूस जैसे देशों से कच्चा तेल आयात करता है और इसे रिफाइन करके डीजल, नेफ्था और पेट्रोल के रूप में दुनिया भर में निर्यात करता है.
आपको जानकार हैरानी होगी कि भारत रिफाइंड पेट्रोलियम के निर्यात में काफी ऊपर है. Observatory of Economic Complexity के डेटा के अनुसार, साल 2024 में, भारत ने 65.4 बिलियन डॉलर का रिफाइंड पेट्रोलियम एक्सपोर्ट किया, जिससे वह दुनिया में रिफाइंड पेट्रोलियम का दूसरा सबसे बड़ा एक्सपोर्टर (कुल 215 देशों में से) बन गया. भारत नीदरलैंड्स, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर आदि देशों को भारी मात्रा में तेल निर्यात करता है.
अब जानते हैं कि क्या अभी भी भारत तेल निर्यात कर रहा है, तो इसका जवाब है हां. इतना ही नहीं, ईरान जंग और व्यापार में बदलाव के बीच भारत के डीजल निर्यात में 7 साल की उच्चतम बढ़ोतरी दर्ज की गई है. ईरान के साथ संघर्ष के कारण मध्य पूर्व में ईंधन की आपूर्ति बाधित हुई है, जिससे एशियाई ईंधन बाजारों में ईंधन की मांग काफी बढ़ गई है. रॉयटर्स ने केप्लर के आंकड़ों का हवाला देते हुए खुलासा किया कि मार्च में दक्षिण पूर्व एशिया को भारत का डीजल निर्यात सात साल से अधिक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया.
भारत तो खुद आयात पर निर्भर है, फिर संकट में दूसरे देशों को क्यों दे रहा?
निर्यात में हुई इस वृद्धि से भारतीय रिफाइनरियों के स्पॉट सेल मार्जिन में बढ़ोतरी हो रही सकती है, जिन्होंने युद्ध के कारण बाधित मध्य पूर्व की आपूर्ति की भरपाई के लिए बड़ी मात्रा में तत्काल रूसी कच्चे तेल की खरीद की है. सरकार ने हाल ही में डीजल पर 21.5 रुपये प्रति लीटर निर्यात शुल्क लगाया ताकि घरेलू आपूर्ति प्राथमिकता बने, लेकिन मार्च 2026 में निर्यात फिर भी बढ़ रहा है. तेल निर्यात पर रोक ना लगने की वजह ये है कि अभी भारत के पास पर्याप्त तेल है और पैनिक की कोई स्थिति नहीं है.
रिपोर्ट्स के अनुसार, अभी रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार 64 फीसदी है (यानी 9-10 दिनों का), लेकिन कुल स्टॉक (कंपनी सहित) 74 दिनों का है और निर्यात आयातित कच्चे तेल से होता है. यानी अभी भारत के पास तेल की कमी नहीं है और आयात होने वाले तेल में खास कमी नहीं आई है.
जंग में दूसरे देशों से तेल आ पा रहा है?
बता दें कि कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 में कुल कच्चा तेल आयात 127 मिलियन बैरल रहा (फरवरी के 145 से कम). लेकिन, रूस से 55.5 मिलियन बैरल (9 महीने का उच्चतम, पिछले महीने से 89% बढ़ोतरी) आया. अप्रैल 2026 तक रूस से आयात 1.9-2.0 मिलियन बैरल प्रतिदिन पहुंच गया, जो मध्य पूर्व की कमी की भरपाई कर रहा है. ईरान युद्ध से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से मिडिल ईस्ट की आपूर्ति प्रभावित हुई और आयात कम हुआ, लेकिन रूस, अंगोला से तेल ज्यादा आने लगा.