ईरान और अमेरिका इजरायल के बीच चल रही जंग की वजह से पूरी दुनिया में कच्चे तेल और गैस को लेकर हाहाकार मचा हुआ है. भारत में भी खासकर LPG (लिक्विड पेट्रोलियम गैस) को लेकर काफी मारामारी हो रही है. क्योंकि, किचेन में इस्तेमाल होने वाले एलपीजी के लिए हमारा देश पूरी तरह से विदेशों से होने वाली सप्लाई पर निर्भर है. लेकिन PNG (पाइप्ड नेचुरल गैस) के साथ ऐसा नहीं है. सरकार भी पीएनजी के इस्तेमाल को प्रोत्साहित कर रही है. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर पीएनजी पर निर्भरता बढ़ाने पर क्यों जोर दिया जा रहा है और इसकी कमी क्यों नहीं हो रही है?
भारत के रसोईघरों अधिकतर LPG सिलेंडर का इस्तेमाल होता है. यह एलपीजी खाड़ी देशों (सऊदी अरब, UAE, कुवैत) से आती है. एलपीजी दो तरह से भारत पहुंचती है. इन देशों से कच्चा तेल भारत आता है तो इसे रिफाइन किया जाता है. कच्चे तेल से डीजल और पेट्रोल निकालने के दौरान LPG एक बायप्रोडक्ट के तौर पर मिलती है. यह ब्यूटेन और प्रोपेन गैस के रूप में अलग होती है. फिर इसे लिक्विफिकेशन संयंत्रों में भेजा जाता है, जहां इसे प्रेशराइज्ड कर लिक्विड बनाया जाता है. इसके बाद इसे सिलेंडरों में भरकर अलग-अलग जगहों पर भेजा जाता है. भारत की अपनी रिफाइनरियां (IOC, BPCL, HPCL) इसी तरह कुछ LPG बनाती हैं.
एलपीजी को लेकर क्यों हो रही मारामारी
वहीं दूसरी तरह खाड़ी देशों से भी एलपीजी सीधे तौर पर भारत पहुंचती है. मुख्य रूप से सऊदी अरब (Saudi Aramco) से, जिसे 'ऑटोगैस/LPG कार्गो' कहा जाता है. यह जहाजों से कांडला, कोच्चि और हल्दिया जैसे बंदरगाहों पर पहुंचती है. फिर इसे अलग-अलग बॉटलिंग प्लांट भेजा जाता है, जहां इसे कमर्शियल और घरेलू सिलेंडरों में भरकर गैस कंपनियों के बड़े-बड़े स्टोर तक पहुंचाया जाता है.
इस तरह बाहर से इसकी सप्लाई, फिर इसे रिफाइन करने या इसके लिक्विफिकेशन, बॉटलिंग और ट्रांसपोर्टेशन में काफी खर्च आता है. इस वजह से एलपीजी का इस्तेमाल खर्चीला सौदा साबित होता है. इसके साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि भारत घरेलू तौर पर पर्याप्त LPG नहीं बनाता है, ज्यादातर आयात करता है. इसलिए मौजूदा समय में इसको लेकर मारामारी हो रही है.
PNG की इसलिए नहीं हो रही किल्लत
अब सवाल उठता है कि बड़े शहरों में घरों तक सीधे पाइप से आने वाली PNG की किल्लत क्यों नहीं हो रही. PNG पूरी तरह से LPG से अलग है. यह मीथेन गैस होता है, जो सीधे सोर्स से पाइप लाइन के जरिए हमारे घरों तक पहुंचता है. पीएनजी को घरों तक पहुंचाने में ट्रांसपोटेशन, लिक्विफिकेशन और बॉटलिंग जैसे प्रोसेस पर खर्च नहीं करना पड़ता है. यही वजह है कि PNG काफी सस्ती होती है.
पीएनजी के भारत में हैं कई सोर्स
पीएनजी का अधिकांश उत्पादन भारत में ही होता है. भारत में अपने गैस भंडार हैं, जिनमें सबसे मशहूर आंध्र/ओडिशा तट के पास स्थित KG बेसिन (रिलायंस, ONGC) हैं. इसके अलावा राजस्थान, गुजरात के खंभात बेसिन और पूर्वोत्तर में भी गैस क्षेत्र हैं. इन घरेलू स्रोतों से निकले नेचुरल गैस पाइप लाइन से सीधे डिस्ट्रिब्यूशन प्लांट तक जाते हैं और वहां से ये पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए हमारे घरों तक पहुंचते हैं.
फिर भी देश में घरेलू इस्तेमाल के लिए इसका पर्याप्त उत्पादन नहीं होता है. इसके बावजूद PNG के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता थोड़ी कम है. क्योंकि, घरेलू सोर्स के अलावा भी नेचुरल गैस खाड़ी देशों के अलावा अलग-अलग स्रोत से आसानी से पहुंच जाती है. भले ही इसकी सप्लाई दूर देश से हो, लेकिन प्रोसेसिंग आसान होने की वजह से दूर से आने पर भी ये सस्ती पड़ती है. PNG में, एक बार जब पाइप आपके घर तक पहुंच जाता है, तो सप्लाई चेन के ज़्यादातर हिस्से की जरूरत ही नहीं पड़ती. यह सीधे हमारे घरों तक जमीन के नीचे बिछी पाइपों के जरिए पहुंचती रहती है.
क्यों PNG की सप्लाई पर नहीं होगा असर
पीएनजी का घरेलू उत्पादन ज्यादा नहीं होने के बावजूद इसके पाइपलाइन नेटवर्क को अलग-अलग सोर्स से सप्लाई मिल सकती है. इसमें घरेलू फ़ील्ड, अलग-अलग इंपोर्ट टर्मिनल और अलग-अलग देशों से आने वाली सीधे गैस की सप्लाई शामिल होती है. यह LPG की जटिल सप्लाई चेन से कहीं ज्यादा मज़बूत व्यवस्था है. इसलिए PNG की सप्लाई पर ज्यादा असर नहीं पड़ रहा है.
इन दिनों कई खाड़ी देशों में जंग की वजह से LPG के लिक्विफिकेशन और प्रोसेसिंग संयंत्र प्रभावित हुए हैं. इस वजह से होर्मुज स्ट्रेट खुल जाने के बाद भी एलपीजी की सप्लाई बाधित रह सकती है, जबकि PNG के साथ ऐसा कुछ नहीं है. इसके लिए किसी लिक्विफिकेशन की जरूरत नहीं होती. यह सोर्स से सीधे पाइपलाइन के जरिए इंपोर्ट टर्मिनल तक पहुंच सकती है या फिर खाड़ी देशों के अलावा भी दूसरे देशों में स्थित स्रोत से इसकी सप्लाई हो सकती है.