इतिहास में आज का दिन जापान के फुकुशिमा परमाणु दुर्घटना के लिए जाना जाता है. यह इतिहास की दूसरी सबसे भीषण परमाणु आपदा मानी जाती है. 11 मार्च 2011 को ही जापान में आए अब तक के सबसे विनाशकारी भूकंप के दौरान फुकुशिमा दाइची परमाणु संयंत्र में विस्फोट हो गया था. भूकंप और सुनामी की वजह से कई दिनों तक परमाणु रिएक्टर में विस्फोट होते रहे थे.
भूकंप के बाद आई सुनामी ने पूर्वोत्तर होंशू के तोहोकू क्षेत्र को पूरी तरह से नष्ट कर दिया. पहले से ही भयावह तबाही और जानमाल के नुकसान के अलावा, इस प्राकृतिक आपदा के कारण फुकुशिमा दाइची परमाणु संयंत्र में विस्फोट होने लगे. इसके चलते 100,000 से अधिक लोगों को विस्थापित होना पड़ा था.
इस आपातकाल के दौरान, फुकुशिमा संयंत्र के तीनों चालू परमाणु रिएक्टर सफलतापूर्वक बंद हो गए, लेकिन बैकअप बिजली और कूलेंट प्रणालियां विफल हो गईं. इसके कारण तीनों रिएक्टरों में ईंधन की छड़ें पिघल गईं. जब बचाव दल मलबे में जीवित बचे लोगों की तलाश कर रहे थे और देश भूकंप और उसके बाद आई सुनामी से जूझ रहा था, तब कई दिनों तक परमाणु आपदा का सिलसिला चलता रहा.
कई दिनों तक होते रहे थे विस्फोट
रिएक्टर 1 और 3 में क्रमशः 12 और 14 मार्च को विस्फोट हुआ, जिसके कारण सरकार ने 20 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले सभी लोगों को जगह खाली करने का आदेश दिया. 15 मार्च को रिएक्टर 2 वाले भवन में एक और विस्फोट हुआ, जिससे और भी अधिक रेडिएशन निकलना शुरू हो गया. हजारों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े क्योंकि कर्मचारी हेलीकॉप्टरों, जल तोपों और समुद्री जल पंपों का उपयोग करके अत्यधिक गर्म हो रही फैसिलिटी को ठंडा करने का प्रयास कर रहे थे.
इसके व्यापक परिणाम आने वाले महीनों में स्पष्ट हो गए, जिसके चलते सरकार ने संयंत्र के 30 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले सभी निवासियों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया. हालांकि. इससे उन 154,000 लोगों को कोई खास राहत नहीं मिली जिन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया था, और न ही उन 18,000 से अधिक लोगों के परिजनों को जिन्होंने भूकंप और सुनामी के कारण अपनी जान गंवाई थी.
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कुछ लोगों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना आवश्यक नहीं था, क्योंकि दुर्घटना के तुरंत बाद विकिरण का स्तर अनुमान से कम हो गया था. हालांकि कई लोग अपने घरों में लौटने में सक्षम थे, लेकिन 2021 तक 371 वर्ग किलोमीटर का इलाके को खाली लगा गया.
इस आपदा के वास्तविक हताहतों की संख्या दशकों तक पता नहीं चल पाई. 2018 में, सरकार ने घोषणा की कि संयंत्र के एक पूर्व कर्मचारी, जिसने परमाणु दुर्घटना के दौरान सेवा की थी, इस आपदा से विकिरण के कारण आधिकारिक तौर पर मरने वाला पहला व्यक्ति था. आज इस आपदा को कुख्यात परमाणु दुर्घटनाओं की रैंकिंग में चेर्नोबिल के बाद दूसरे स्थान पर माना जाता है.