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First Copy Products: कहीं फर्स्ट कॉपी के नाम पर ठगे तो नहीं जा रहे आप? 

महंगे ब्रांड के सामान का शौक लगभग हर किसी को होता है. लेकिन जब वही प्रोडक्ट बहुत कम कीमत में 'फर्स्ट कॉपी', 'मास्टर कॉपी' या 'AAA क्वालिटी' के नाम पर मिलने लगे, तो कई लोग बिना ज्यादा सोचे-समझे उसे खरीद लेते हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर फर्स्ट कॉपी होती क्या है?

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भारत के कई शहरों में ऐसे बाजार हैं जहां ब्रांडेड जैसे दिखने वाले प्रोडक्ट आसानी से मिल जाते हैं. ( Photo: ITG)
भारत के कई शहरों में ऐसे बाजार हैं जहां ब्रांडेड जैसे दिखने वाले प्रोडक्ट आसानी से मिल जाते हैं. ( Photo: ITG)

आजकल लोकल मार्केट हो या बाजार हो या ऑनलाइन शॉपिंग, हर जगह एक शब्द खूब सुनाई देता है-'फर्स्ट कॉपी'. दुकानदार बड़े भरोसे से कहते हैं- मैडम, ओरिजिनल जैसी क्वालिटी है, AAA क्वालिटी, मास्टर कॉपी है, कोई पहचान ही नहीं पाएगा. कीमत भी इतनी कम होती है कि कई लोग बिना ज्यादा सोचे खरीद लेते हैं. आखिर 50 हजार का बैग अगर 2-3 हजार रुपये में मिल जाए तो किसका मन नहीं डोलेगा? लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि फर्स्ट कॉपी आखिर होती क्या है? क्या यह खरीदना सच में फायदे का सौदा है या सस्ती डील के नाम पर बड़ा नुकसान?

हाल ही में दुबई और वियतनाम में नकली ब्रांडेड सामान के खिलाफ हुई बड़ी कार्रवाई ने एक बार फिर इस कारोबार की सच्चाई दुनिया के सामने ला दी है. आइए जानते हैं कि फर्स्ट कॉपी का पूरा खेल क्या है और खरीदारी करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए.

दुनिया भर में नकली ब्रांड्स पर कार्रवाई
हाल ही में दुबई के अधिकारियों ने नकली ब्रांडेड सामान के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए सैकड़ों प्रोडक्ट जब्त किए. इनमें कपड़े, जूते, बैग, घड़ियां, कॉस्मेटिक्स और कई मशहूर ब्रांड के प्रोडक्ट शामिल थे. अधिकारियों का कहना है कि नकली सामान सिर्फ ग्राहकों को ही नहीं, बल्कि असली कंपनियों और पूरी अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाता है. वहीं, बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 8 जुलाई को वियतनाम में भी बड़े पैमाने पर नकली लग्जरी सामान जब्त किया गया. वियतनाम लंबे समय से सस्ते नकली ब्रांडेड सामान के बड़े बाजार के रूप में जाना जाता है.

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इस साल की शुरुआत में पुलिस ने वियतनाम के हो ची मिन्ह सिटी के पास दो गोदामों पर छापा मारकर 23 हजार से ज्यादा नकली चप्पलें बरामद की थीं. इन पर नाइकी, एडिडास, क्रॉक्स और गूचू जैसे बड़े ब्रांड्स के लोगो लगे हुए थे. जब्त सामान की कीमत करीब 72.56 लाख रुपये आंकी गई. दिलचस्प बात यह है कि विदेशों में जिन असली चप्पलों की कीमत करीब 900 डॉलर तक होती है, उनकी नकली कॉपी वहां सिर्फ 30 डॉलर में बिक रही थी. सिर्फ चप्पलें ही नहीं, बल्कि शनेल के बैग, प्राडा और रोलेक्स की टी-शर्ट और  जैसी महंगी घड़ियों की भी खुलेआम नकली कॉपी बेची जा रही थीं.

आखिर क्या होती है 'फर्स्ट कॉपी'?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि फर्स्ट कॉपी कोई रजिस्टर्ड प्रोडक्ट नहीं होती. फर्स्ट कॉपी का मतलब है किसी मशहूर ब्रांड की हूबहू नकल. देखने में यह असली जैसी लग सकती है, लेकिन इसे उस कंपनी ने नहीं बनाया होता. उस पर ब्रांड का लोगो, डिजाइन और पैकेजिंग तक कॉपी कर दी जाती है, लेकिन वह पूरी तरह नकली प्रोडक्ट होता है. मान लीजिए किसी मशहूर कंपनी का बैग 50 हजार रुपये का है और वही डिजाइन आपको 2 या 3 हजार रुपये में मिल रहा है, तो लगभग तय है कि वह असली नहीं है. यही वजह है कि कई दुकानदार इसे फर्स्ट कॉपी, मास्टर कॉपी या प्रीमियम कॉपी जैसे नाम देकर बेचते हैं ताकि ग्राहक इसे बेहतर क्वालिटी समझकर खरीद लें.

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लोग आखिर खरीदते क्यों हैं?
इसका सबसे बड़ा कारण है कम दाम. हर कोई लाखों या हजारों रुपये खर्च करके महंगे ब्रांड नहीं खरीद सकता. ऐसे में जब वही डिजाइन बेहद कम दाम में मिलता है तो लोगों को लगता है कि उन्होंने बढ़िया डील कर लिया. सोशल मीडिया ने भी इस ट्रेंड को काफी बढ़ाया है. इंस्टाग्राम और फेसबुक पर ऐसे हजारों विज्ञापन दिखाई देते हैं जिनमें दावा किया जाता है कि ये फैक्ट्री आउटलेट का माल है और ओरिजिनल जैसी क्वालिटी है. इसके साथ ही ये कहा जाता है कि ये प्रोडक्ट आपको 90% तक डिस्काउंट में मिल जाएंगे. यहीं सबसे ज्यादा लोग फंस जाते हैं.

सिर्फ पैसों का नहीं, सेहत का भी खतरा
कई लोगों को लगता है कि ये प्रोडक्ट लेना सही है. लेकिन अगर थोड़ा लंबा सोचें तो जवाब अक्सर नहीं होता है. क्योंकि नकली सामान जल्दी खराब हो जाता है. उसकी क्वालिटी असली प्रोडक्ट जैसी नहीं होती. कई बार कुछ महीनों में ही उसे बदलना पड़ जाता है. यानी शुरुआत में जो पैसे बचते हुए दिखाई देते हैं, बाद में वही ज्यादा खर्च बन जाते हैं. फर्स्ट कॉपी का नुकसान सिर्फ आपकी जेब तक सीमित नहीं है. अगर नकली चार्जर इस्तेमाल किया जाए तो वह गर्म होकर खराब हो सकता है और आग लगने जैसी घटना भी हो सकती है.

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नकली कॉस्मेटिक में ऐसे केमिकल हो सकते हैं जो त्वचा को नुकसान पहुंचाएं, एलर्जी पैदा करें या लंबे समय तक स्किन प्रॉब्लम की वजह बन जाएं. इसी तरह नकली जूते और कपड़ों में इस्तेमाल होने वाला खराब मटेरियल कई लोगों में स्किन एलर्जी, खुजली और दूसरी परेशानियां पैदा कर सकता है. यानी सस्ती डील कई बार महंगी पड़ सकती है.

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सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा हो रही ठगी
आजकल सबसे ज्यादा नकली सामान सोशल मीडिया के जरिए बेचा जा रहा है. फोटो में शानदार प्रोडक्ट दिखाया जाता है, लेकिन डिलीवरी होने पर सामान बिल्कुल अलग निकलता है. कई मामलों में तो पैसे लेने के बाद सामान भेजा ही नहीं जाता. इसी वजह से दुबई पुलिस ने लोगों से अपील की है कि नकली सामान खरीदने, बेचने और उसका प्रचार करने से बचें. कई देशों में यह कानून का उल्लंघन भी माना जाता है.

भारत में भी मिलते हैं ऐसे बाजार
भारत के कई शहरों में ऐसे बाजार हैं जहां ब्रांडेड जैसे दिखने वाले प्रोडक्ट आसानी से मिल जाते हैं. हालांकि यह समझना जरूरी है कि इन बाजारों में मिलने वाला हर सामान नकली नहीं होता. कई दुकानों पर एक्सपोर्ट सरप्लस, लोकल ब्रांड और असली सामान भी मिलता है. इसलिए सिर्फ बाजार देखकर किसी सामान को नकली या असली नहीं कहा जा सकता. असली पहचान खरीदते समय जांच-पड़ताल से ही होती है.

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भारत में कहां-कहां 'फर्स्ट कॉपी' के नाम पर सामान बिकता है?
दिल्ली: करोल बाग, सरोजिनी नगर, पालिका बाजार, कमला नगर, गांधी नगर और लाजपत नगर में जूते, बैग, कपड़े, घड़ियां और एक्सेसरीज की फर्स्ट कॉपी मिलने की चर्चा रहती है.
मुंबई: हीरा पन्ना मार्केट, लिंकिंग रोड (बांद्रा), फैशन स्ट्रीट और क्रॉफर्ड मार्केट.
कोलकाता: न्यू मार्केट और गड़ियाघाट मार्केट.
बेंगलुरु: कमर्शियल स्ट्रीट और चिकपेट.
हैदराबाद: बेगम बाजार और सुल्तान बाजार
चेन्नई: पोंडी बाजार और रिची स्ट्रीट (खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स).
जयपुर: बापू बाजार और जौहरी बाजार में आपको महंगे स्टोन आसानी से मिल जाते हैं.
अहमदाबाद: लाल दरवाजा और रानी नो हजीरो मार्केट.

खरीदारी से पहले इन बातों का रखें ध्यान
अगर कोई दुकानदार किसी प्रोडक्ट को फर्स्ट कॉपी, फैक्टरी आउटलेट, ऑरिजनल क्वालिटी बताकर बेच रहा है तो जल्दबाजी न करें.

इन बातों की जांच जरूर करें
अगर कीमत असली प्रोडक्ट से 70-90% कम है तो सतर्क हो जाएं. हमेशा बिल जरूर लें. वारंटी कार्ड मांगें. ब्रांड की आधिकारिक वेबसाइट पर कीमत और डिजाइन मिलाकर देखें. बिना बिल वाले सामान से बचें. भरोसेमंद ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म या रजिस्टर्ड स्टोर से ही खरीदारी करें.

ध्यान देने वाली बात यह है कि फर्स्ट कॉपी किसी ब्रांड का आधिकारिक प्रोडक्ट नहीं होती. इसमें किसी कंपनी के ट्रेडमार्क, लोगो और डिजाइन की नकल की जाती है. इसलिए नकली सामान बनाना और बेचना कई मामलों में ट्रेडमार्क और बौद्धिक संपदा  से जुड़े कानूनों का उल्लंघन हो सकता है. अलग-अलग देशों में इसके नियम अलग हो सकते हैं.

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आखिर में सबसे जरूरी बात
हर सस्ती चीज सस्ता सौदा नहीं होती. अगर कोई महंगा ब्रांड आपको बेहद कम कीमत में मिल रहा है, तो एक बार जरूर सोचिए कि आखिर इतना बड़ा डिस्काउंट क्यों दिया जा रहा है. थोड़े पैसे बचाने के चक्कर में अगर आपको खराब क्वालिटी, नकली सामान, सेहत का नुकसान या धोखाधड़ी का सामना करना पड़े, तो यह फायदे का सौदा नहीं कहलाएगा. इसलिए अगली बार जब कोई दुकानदार कहे- सर, ये फर्स्ट कॉपी है... बिल्कुल ओरिजिनल जैसी, तो सिर्फ दाम मत देखिए. बिल, वारंटी, ब्रांड की आधिकारिक जानकारी और प्रोडक्ट की रियलिटी भी जरूर चेक करें.

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