ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के हवाई हमलों में मौत हो गई थी. इसके साथ ही ईरान के साथ युद्ध तेज हो गया था. इधर, कुछ दिनों पहले अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू दोनों की हत्या की मांग करते हुए नारे लगाए गए.
वहीं ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने अपने पिता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या का बदला लेने की कसम खाते हुए सोशल मीडिया पर एक पोस्ट भी किया था. हालांकि, अपने दूसरे सार्वजनिक बयान में नए सर्वोच्च नेता जो हवाई हमले घायल होने के बाद से सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं, उन्होंने कहा कि वह शहीद हुए सभी लोगों के खून का बदला लेंगे. मोजतबा ने 11 जुलाई को पोस्ट में लिखा- यह बदला हमारे राष्ट्र की मांग है, और इसे निश्चित रूप से पूरा किया जाएगा. ये अपराधी, जिनके नाम ऊपर से नीचे तक मालूम हैं, अपने साथ अपने बिस्तर पर शांति से मरने की अधूरी इच्छा लेकर कब्र में जाएंगे.
हालांकि खामेनेई ने ट्रंप का नाम लेकर जिक्र नहीं किया, लेकिन वॉल स्ट्रीट जर्नल के अनुसार , इजरायली खुफिया विभाग ने उस सप्ताह की शुरुआत में ही वाशिंगटन को सूचित कर दिया था कि ईरान हत्या की साजिशों पर विचार कर रहा है.अब अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम की अचानक हुई मौत के बाद ईरान के अखबार ने एक हिटलिस्ट का खुलासा किया है, जिसमें ट्रंप और नेतन्याहू दोनों के नाम हैं.
ट्रंप भी मानता है वो ईरान की हिटलिस्ट में है...
वहीं, ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर जवाब देते हुए कहा कि उनकी जान पर किसी भी तरह के हमले के जवाब में अमेरिका ईरान को तबाह कर देगा. ट्रम्प ने अपने पोस्ट में कहा - 1000 मिसाइलें तैयार हैं और इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की ओर टारगेट हैं, और यदि ईरानी सरकार अमेरिका मौजूदा राष्ट्रपति की हत्या करने या हत्या का प्रयास करने की अपनी धमकी पर अमल करती है, जिसे दुनिया के कई कोनों में दोहराया गया है, तो तुरंत हजारों और मिसाइलें दागी जाएंगी.
ट्रंप लंबे समय से कहते आ रहे हैं कि वे खुद को ईरानी शासन का निशाना मानते हैं. पिछले हफ्ते तुर्की के अंकारा में नाटो शिखर सम्मेलन में ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि वे ईरान की 'किल लिस्ट' में नंबर 1 पर हैं.उन्होंने 10 जुलाई को न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि “मैं लंबे समय से उनकी सूची में हूं.अगर कुछ भी होता है, तो उन पर इतनी भीषण बमबारी की जाए जितनी उन्होंने पहले कभी नहीं देखी हो.
अब सवाल उठता है कि आखिर ट्रंप ऐसी बातें क्यों कह रहे हैं और ईरान भी जो ऐसी धमकियां दे रहा हैं, आखिर ये धुआं उठा कहां से? इसे समझने के लिए उन मामलों पर नजर डालना जरूरी है, जब ट्रंप की हत्या की साजिशों का पर्दाफाश किया गया और उनका कनेक्शन ईरान से था. 2025 की शुरुआत में राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ ईरान से जुड़ी दो साजिशों का पता चलने के बाद ही ट्रंप ने ऐसी टिप्पणी की थी.
जब ट्रंप की हत्या के लिए IRGC ने भेजे किलर
द टाइम की रिपोर्ट के मुताबिक, पहला मामला जुलाई 2024 में सामने आया, जब पाकिस्तानी नागरिक आसिफ मर्चेंट को अमेरिकी राजनेताओं, जिनमें संभवतः ट्रंप भी शामिल थे, उनकी हत्या की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया और बाद में दोषी ठहराया गया. अमेरिकी सरकार ने कहा कि मर्चेंट ने अमेरिकी धरती पर हत्यारों को काम पर रखने के लिए ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के साथ मिलकर काम किया था.
फिर, नवंबर 2024 में ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के लिए चुने जाने के तुरंत बाद, न्याय विभाग ने अफगान नागरिक फरहाद शेकरी के खिलाफ आरोप लगाते हुए कहा कि उसे ईरान की सरकार ने ट्रंप की हत्या की योजना बनाने का निर्देश दिया था.
तेहरान ने बदला लेने को क्यों बताया वैध अधिकार
ईरानी नेतृत्व अमेरिका के खिलाफ प्रतिशोध की मांग करता रहता है. ट्रंप की हत्या को एक ऐसा मिशन बताया, जिसे ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन ने अपना वैध अधिकार और कर्तव्य बताया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी देश के नेतृत्व पर बड़े हमले के बाद इस तरह की बयानबाजी अपेक्षित है. लेकिन, 2020 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान ईरानी कुद्स फोर्स के नेता कासिम सुलेमानी की मौत के लिए भी अमेरिका जिम्मेदार था.
क्विंसी इंस्टीट्यूट फॉर रिस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ्ट के कार्यकारी उपाध्यक्ष ट्रिटा पारसी ने टाइम को बताया कि मुझे लगता है कि इसी घटना ने इस तरह की धमकियों और जवाबी धमकियों के लिए रास्ता खोल दिया है.पिछले 47 वर्षों से दोनों देशों के बीच दुश्मनी जितनी गहरी रही है, सुलेमानी की हत्या के बाद और उससे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण, खामेनेई की हत्या के बाद यह एक नए स्तर पर पहुंच गई.
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पारसी का कहना है कि खामेनेई की नई धमकियां ईरानी अधिकारियों को शांत करने के लिए एक तरह का लालच है, जो आंतरिक रूप से तर्क देते हैं कि बदला लेना राष्ट्र का अधिकार है. उन्होंने समझाया कि ये तर्क मुख्य रूप से उन मुट्ठी भर अति-कट्टरपंथियों की ओर से आ रहे हैं जिन्होंने कूटनीति का विरोध किया है, जिन्होंने समझौता का विरोध किया है, जो होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण छोड़ने के पक्ष में नहीं हैं.