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क्षेत्रीय समीकरण, न्यू और ओल्ड गार्ड.... टीम धामी के 5 नए मंत्रियों का जानें बैकग्राउंड

उत्तराखंड में लंबे इंतजार के बाद पुष्कर सिंह धामी कैबिनेट का विस्तार हो गया है. अगले साल होने वाले चुनावों से पहले क्षेत्रीय और जातीय संतुलन बनाने के लिए यह फेरबदल बेहद अहम माना जा रहा है.

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 कैबिनेट के जरिए सीएम धामी ने साधे गढ़वाल-कुमाऊं के समीकरण (Photo-ITG)
कैबिनेट के जरिए सीएम धामी ने साधे गढ़वाल-कुमाऊं के समीकरण (Photo-ITG)

उत्तराखंड की राजनीति में पिछले दो साल से जो सवाल हवा में तैर रहा था, अब उसका जवाब फाइनली मिल गया है. काफी समय से अटकलों और टलते फैसलों के बीच आखिरकार धामी मंत्रिमंडल के विस्तार हो चुका है.

अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में अब एक साल से भी कम वक्त बचा है, ऐसे में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी टीम की 'खाली कुर्सियों' को भरकर न केवल शासन को रफ्तार देना चाहते हैं, बल्कि क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों की बिसात भी बिछा रहे हैं.

पहले मंत्रिमंडल में केवल 7 सदस्य थे जबकि संवैधानिक नियमों के अनुसार यह संख्या 12 हो सकती थी जो अब पूरी हो गई है. 2023 में कैबिनेट मंत्री चंदन रामदास के आकस्मिक निधन और फिर प्रेम चंद्र अग्रवाल के इस्तीफे के बाद से ही पांच पद खाली चल रहे थे. जिन पांच चेहरों को मंत्रीमंडल में जगह मिली है, उनमें शामिल हैं-

 

1- भरत सिंह चौधरी (विधायक, रुद्रप्रयाग): रुद्रप्रयाग सीट से लगातार जीत का परचम लहराने वाले 66 वर्षीय भरत सिंह चौधरी उत्तराखंड की राजनीति का एक मंझा हुआ चेहरा हैं. ठाकुर समाज से आने वाले चौधरी की हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत भाषा पर जबरदस्त पकड़ उन्हें अन्य नेताओं से अलग खड़ा करती है. उनकी राजनीतिक यात्रा काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है. 2007 में एनसीपी और 2012 में निर्दलीय चुनाव में हार का स्वाद चखने के बाद, उन्होंने भाजपा का दामन थामा और 2017 की 'मोदी लहर' में पहली बार विधानसभा पहुंचे. इसी साल जनवरी में उनका एक विवादित बयान, "जो मेरी नहीं सुनेगा, वो मेरे जूते की सुनेगा", सुर्खियों में रहा था, जिससे उनकी राजनीतिक कार्यशैली की काफी चर्चा हुई.

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2. खजानदास (राजपुर रोड): अपनी ही सरकार को आईना दिखाने वाले जुझारू नेता खजानदार राजपुर रोड से वरिष्ठ विधायक हैं और अनुसूचित जाति समुदाय का बड़ा चेहरा हैं. वे अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते हैं. याद होगा जब उन्होंने अपनी ही सरकार के खिलाफ देहरादून स्मार्ट सिटी के कामों को लेकर धरने का अल्टीमेटम दे दिया था. उनकी यह सक्रियता और समाज पर पकड़ उन्हें कैबिनेट का मजबूत दावेदार बनाती है.

 

3- राम सिंह कैड़ा (विधायक, भीमताल): नैनीताल जिले की भीमताल सीट का प्रतिनिधित्व करने वाले राम सिंह कैड़ा का बैकग्राउंड कांग्रेस से जुड़ा रहा है.  लंबे समय तक कांग्रेस की विचारधारा से जुड़े रहने के बाद, 2017 में टिकट न मिलने पर उन्होंने बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज की. उनकी जनहित की राजनीति और सक्रियता को देखते हुए भाजपा ने उन्हें अपने पाले में किया. 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर दोबारा जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि भीमताल की जनता का उन पर अटूट भरोसा है.

4- मदन कौशिक (विधायक, हरिद्वार): उत्तराखंड भाजपा के सबसे कद्दावर और अनुभवी नेताओं में शुमार मदन कौशिक हरिद्वार की राजनीति के 'अजेय योद्धा' माने जाते हैं. लगातार पांच बार से विधायक और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रह चुके कौशिक के पास शासन और संगठन, दोनों का गहरा अनुभव है. वे राज्य की पिछली कई सरकारों में कैबिनेट मंत्री के रूप में महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. ब्राह्मण समाज के बड़े नेता के तौर पर उनकी पहचान है और हरिद्वार क्षेत्र के हर वर्ग में उनका मजबूत जनाधार है.  

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5. प्रदीप बत्रा (रुड़की): पंजाबी समुदाय से आने वाले प्रदीप बत्रा बीजेपी के उन युवा चेहरों में शामिल हैं जो जमीन पर अपनी पकड़ के लिए मशहूर हैं. रुड़की से लगातार तीन बार विधायक (2012 में कांग्रेस और फिर बीजेपी) बनने वाले बत्रा ने हर चुनाव में अपनी ताकत साबित की है. हालिया लोकसभा चुनावों में भी उनकी मेहनत ने पार्टी नेतृत्व का ध्यान खींचा है.

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