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यूपी: उपचुनाव में सपा के हारते ही मुसलमानों को रिझाने की तैयारी, कई पार्टियां हुईं एक्टिव

आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव नतीजे के बाद सपा सवालों के घेरे में है. बसपा प्रमुख मायावती से लेकर असदुद्दीन ओवैसी और राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल तक ने मुस्लिम वोटों को लेकर सपा के खिलाफ सियासी चक्रव्यूह रचना शुरू कर दिया है. ऐसे में अगर मुस्लिम वोटर सपा से छिटका तो अखिलेश के लिए काफी बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है.

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अखिलेश यादव, असदुद्दीन ओवैसी, मौलाना आमिर रशीदी अखिलेश यादव, असदुद्दीन ओवैसी, मौलाना आमिर रशीदी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मुसलमानों कोे अपने पाले में लाने को पार्टियां एक्टिव
  • मुस्लिम वोटों को लेकर सपा के लिए सियासी चक्रव्यूह
  • ओवैसी से लेकर उलेमा काउंसिल तक आक्रामक हैं

उत्तर प्रदेश के रामपुर और आजमगढ़ में हुए लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी ने जीत हासिल की है. यह दोनों ही सीटें सपा की गढ़ मानी जाती थीं. रामपुर मुस्लिम मतदाताओं और आजमगढ़ यादव मतदाताओं का केंद्र है. बीजेपी ने उपचुनाव में सपा और अखिलेश यादव के 'एमवाई'  (मुस्लिम-यादव) फैक्टर को तार-तार कर दिया है. ऐसे में सूबे की मुस्लिम सियासत को लेकर फिर से नया सियासी ताना-बाना बुना जाने लगे है और असदुद्दीन ओवैसी से लेकर उलेमा काउंसिल तक ने मुसलमानों को सपा से दूर करने के लिए माहौल बनाना भी शुरू कर दिया है. 

बता दें कि 2022 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के मस्लिमों ने एकमुश्त होकर सपा को वोट किया था. सीएसडीएस की रिपोर्ट के मुताबिक 83 फीसदी मुस्लिम सपा के साथ थे. बसपा और कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों को भी मुसलमानों ने वोट नहीं किया था. असदुद्दीन औवैसी की पार्टी AIMIM को भी मुस्लिमों ने नकार दिया था. इतनी बड़ी तादाद में मुस्लिम समुदाय ने किसी एक पार्टी को 1984 चुनाव के बाद वोट किया था.

2022 के विधानसभा चुनाव में सपा 47 से बढ़कर 111 सीटों पर पहुंच गई. सपा से 31 मुस्लिम विधायक जीते थे जबकि वैसे कुल 34 मुस्लिम विधायक हैं. इसके बावजूद आखिर साढ़े तीन महीने में ऐसा क्या हुआ कि मुस्लिमों का अखिलेश यादव से मोहभंग हो रहा है? 

बीजेपी को हराने में सक्षम नहीं सपा?

आजमगढ़ और रामपुर उपचुनाव में बीजेपी सपा के गढ़ में कमल खिलाने में सफल रही. ऐसे में उपचुनाव रिजल्ट आने के बाद बसपा अध्यक्ष मायावती से लेकर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल के मौलाना आमिर रशीदी तक मुस्लिम मतदाताओं को सियासी संदेश दे रहे हैं कि बीजेपी को हराने की ताकत और साहस सपा में नहीं है. 

वोट का महत्व समझें मुसलमान-ओवैसी

वहीं, एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, 'रामपुर और आजमगढ़ उपचुनाव के नतीजे स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि सपा में बीजेपी को हराने की क्षमता नहीं है. मैं मुसलमानों से अपील करूंगा कि वे अपना वोट बर्बाद न करें. ऐसे बेकार दलों पर अपना बहुमूल्य वोट बर्बाद करने के बजाय, मुसलमानों को अब अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनानी चाहिए और अपने भाग्य का फैसला खुद करना चाहिए. महाराष्ट्र में शिवसेना के 40 विधायक भाग गए तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? इसलिए मुसलमानों को अपने वोट के महत्व को समझने की जरूरत है. 

ओवैसी ने कहा कि अखिलेश यादव में इतना अहंकार है कि जिस सीट से उनके पिता मुलायम सिंह यादव सांसद बने. बाद में वे सांसद बने. वे वहां जाकर जनता को ये भी बताने नहीं गए, कि वे चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. इतना अहंकार, इसी की वजह से सपा की हार हुई. उन्होंने कहा, अब बीजेपी की जीत के लिए कौन जिम्मेदार है? अखिलेश यादव अब किसे बीजेपी की बी टीम और सी टीम बताएंगे.

उलेमा काउंसिल का बयान भी आया

उपचुनाव नतीजे आने के बाद मुसलमानों के अंडरकरंट को समझने के लिए मौलाना आमिर रशीदी का महत्वपूर्ण बयान आया है. मौलाना पूर्वींचल में सक्रिय उलेमा काउंसिल के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. ये वही उलेमा काउंसिल है, जिसका गठन बटला हाउस एनकाउंटर के बाद हुआ था. 2020 में इसी उलेमा काउंसिल के लोग आजमगढ़ जिले में सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन में बड़ी तादाद में गिरफ्तार हुए थे. 

मौलाना आमिर रशीदी ने बयान में कहा कि सपा इस उपचुनाव में अपना गढ़ (आजमगढ़) और किला (रामपुर) दोनों गवां चुकी है. नई सपा न तो विपक्ष की सही भूमिका अदा कर पा रही है और न ही अपने बुनियादी वोटरों के साथ खड़ी हो पा रही है. 2022 के विधानसभा चुनाव में मुसलमानों का एकतरफा वोट लेने वाली सपा मुस्लिमों के मुद्दों पर अब बेरुखी दिखा रही है और पूरी तरह से खामोश है. ऐसे में मुसलमानों ने भी दोनों उपचुनाव में अपना पैगाम दे दिया है. मुसलमान अब गूंगी-बहरी सियासी कयादत का बोझ अपने कंधों पर नहीं उठाने वाला है.

अखिलेश यादव और सपा आंदोलन से दूर 

दरअसल, मौलाना आमिर रशीदी सपा प्रमुख अखिलेश यादव को मुस्लिमों से जुड़े मुद्दों को मुखर होकर न उठाने के लिए जिम्मेदार बता रहे हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में मुसलमानों ने सपा का खुलकर साथ दिया था. ऐसे में मुसलमानों के एक वर्ग का मानना है कि जरूरी नहीं कि अखिलेश यादव हर घटना पर बोलें, लेकिन यह जरूरी है कि नाइंसाफी वाली घटनाओं पर बोलें, सड़कों पर आएं. 2022 के चुनाव से पहले और अब बाद में अखिलेश यादव और उनकी पार्टी मुसलमान ही नहीं किसी बड़े धरना-प्रदर्शन या आंदोलन से दूर हैं. 

उपचुनाव में बसपा ने रामपुर लोकसभा सीट पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारा था जबकि आजमगढ़ में शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को कैंडिडेट बनाया था. आजमगढ़ में बसपा 2.66 लाख वोट हासिल कर भले ही तीसरे नंबर पर रही, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव से उसका प्रदर्शन बेहतर हुआ है. ये माना जा रहा है कि मुस्लिमों का 50 फीसदी से ज्यादा वोट आजमगढ़ में बसपा को मिला है, जिससे मायावती और उनकी पार्टी को सियासी संजीवनी मिली है.

'बीएसपी के पास ही भाजपा को हराने की शक्ति'

बसपा प्रमुख मायावती ने ट्वीट कर कहा, 'यूपी के इस उपचुनाव परिणाम ने एकबार फिर से यह साबित किया है कि केवल बीएसपी में ही भाजपा को हराने की सैद्धान्तिक और जमीनी शक्ति है. यह बात पूरी तरह से खासकर समुदाय विशेष को समझाने का पार्टी का प्रयास लगातार जारी रहेगा ताकि प्रदेश में बहुप्रतीक्षित राजनीतिक परिवर्तन हो सके.'

मायावती साफ तौर पर दलित-मुस्लिम कॉम्बिनेशन पर ही आगे बढ़ सकती हैं और 2024 के लोकसभा चुनाव में इसी फॉर्मूले पर लड़ने का संकेत दे रही हैं. 

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता अगर सपा के छिटका तो अखिलेश यादव के भविष्य की राजनीति के लिए सियासी संकट खड़ा हो सकता है. इसकी वजह यह है कि सपा का सियासी आधार मुस्लिम वोटों पर टिका है और अगर यह वोट छिटकर बसपा या फिर किसी मुस्लिम पार्टी के साथ जाता है तो निश्चित तौर पर अखिलेश की टेंशन बढ़ सकती है. सपा को 2022 के चुनाव में करीब 32 फीसदी वोट मिले हैं, जिनमें आधा से ज्यादा वोट सिर्फ मुस्लिमों के हैं. इसीलिए अखिलेश यादव को मुस्लिमों को साधने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी होगी? 

 

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