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बॉडी बिल्डर्स से भरा पड़ा है दिल्ली के पास का यह गांव, गली-मोहल्ले में घूमते नजर आएंगे 'पहलवान'

गांव के 50 प्रतिशत से अधिक युवा बॉडीबिल्डिंग से जुड़े हुए हैं. इस गांव को पहलवानों के गांव के नाम से जाना जाता है. बॉडीबिल्डिंग और बड़े मसल्स इस गांव में एक स्टेटस सिंबल हैं.

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bodybuilding in mirzapur village bodybuilding in mirzapur village

'मिर्जापुर' (Mirzapur) नाम सुनते ही हमारे जहन में एक्शन से भरपूर वेब सीरीज आती है. लेकिन इसके इतर दिल्ली से कुछ किमी दूर स्थित मिर्जापुर गांव बॉडी बिल्डिंग (Bodybuilding) के लिए काफी मशहूर है. दावा है कि ग्रेटर नोएडा के जेवर क्षेत्र में स्थित ये मिर्जापुर गांव उत्तर भारत का सबसे बड़ा बॉडीबिल्डरों वाला गांव है, जहां 50 प्रतिशत से अधिक युवा या तो प्रतियोगिता के लिए या आकर्षक दिखने के लिए बॉडीबिल्डिंग से जुड़े हुए हैं. इस गांव में हट्टे-कट्टे युवाओं का दिखना आम बात है.

स्थानीय जिम के मालिक और प्रोफेशनल बॉडी बिल्डर ठाकुर भूपेंद्र भाटी ने बताया कि ये इस गांव की प्राचीन काल से ही परंपरा रही है. इस गांव को पहलवानों के गांव के नाम से जाना जाता था. हालांकि, आधुनिक प्रतिस्पर्धी बॉडीबिल्डिंग पांच साल पहले ही यहां शुरू हुई, जब मैंने बॉडीबिल्डिंग में मेडल जीते. मैं फरीदाबाद में पढ़ता था, जहां से मेरी ट्रेनिंग हुई और इसके बाद मैंने कई टूर्नामेंटों में भाग लिया. वर्तमान में बॉडीबिल्डिंग का क्रेज काफी बढ़ गया और इस गांव के 50 प्रतिशत से अधिक युवा बॉडीबिल्डिंग से जुड़े हुए हैं.

बाउंसर का काम नहीं करते गांव के लोग

आम धारणाओं के विपरीत, कोई भी स्थानीय बॉडी बिल्डर पब और बार में बाउंसर के रूप में काम नहीं कर रहा है.

स्थानीय बॉडी बिल्डर ठाकुर संदीप भाटी ने बताया, "हमारा एक समृद्ध गांव है, यहां के अधिकांश पुरुष और युवा खुद का काम करते हैं या फिर नौकरी करते हैं. वह अच्छे पढ़े लिखे भी हैं, इसलिए थोड़े बहुत पैसे मिलने वाली बाउंसर की नौकरी के लिए उन्हें जाने की कोई आवश्यकता नहीं है. हम खुद पर खर्च करने के लिए पैसा कमाते हैं. हम राजपूत हैं और हमारे पास एक योद्धा संस्कृति है, यही कारण है कि हम शराब और धूम्रपान के बजाय अपने शरीर पर पैसा और समय खर्च करते हैं. हमारे गांव के पुरुषों को बाउंसर बनने की जरूरत नहीं है, वे खुद बाउंसरों को रखने में सक्षम हैं." 

बता दें कि इस गांव में युवाओं और पुरुषों के लिए काम पर जाने से पहले जिम जाने की परंपरा सी बन गई है. वहीं जो लोग सुबह जिम नहीं जा पाते, वे शाम को वर्कआउट के लिए जाते हैं. ग्रामीणों का कहना है कि ऐसे युवाओं के लिए जिम कभी-कभी रात के एक बजे तक भी खुला रहता है.

स्थानीय बॉडी बिल्डर ठाकुर प्रमोद भाटी ने कहा, "यह हमारे खून में है. कोई भी हमें वर्कआउट करने से नहीं रोक सकता. एक बार जब आप शुरू कर देते हैं, तो वापस लौटते. बॉडीबिल्डिंग और बड़ी मांसपेशियां इस गांव में एक स्टेटस सिंबल है. किसी को शायद ही कोई छोटा बाइसेप्स वाला आदमी मिलेगा. हमारा परिवार भी हमें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करता है, क्योंकि पूरा क्षेत्र हमारे गांव को बाहुबलियों के गढ़ के रूप में पहचानता है."

गौरतलब है कि बॉडीबिल्डिंग करना एक महंगा शौक है. विशेष रूप से प्रतिस्पर्धी बॉडीबिल्डिंग एक ऐसी चीज है जिसके लिए उचित आहार, ढेर सारे उपकरणों के लिए समय के साथ-साथ बहुत सारे पैसे की आवश्यकता होती है.

जिम मालिक भूपेंद्र ने कहा, "गांव में कई ऐसे हैं जो प्रतिस्पर्धी बॉडीबिल्डिंग के लिए वर्कआउट कर रहे हैं. लेकिन बहुत से ऐसे भी हैं जो इस गांव की विरासत को बनाए रखने के लिए कसरत करते हैं. हमें अपनी विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने पर गर्व है. आशा है कि अन्य लोग भी हमारे इस कदम का पालन करेंगे और वे जो पैसा कमाते हैं, उसका उपयोग पार्टी करने के बजाय फिट और मस्कुलर बने रहने के लिए करेंगे."

 

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