प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक कौशल विकास के साथ खिलवाड़ के कई मामले सामने आए हैं. झूठे सर्टिफिकेट और नामों से सब्सिडी का पैसा दलालों के पास पहुंच रहा है.
कौशल विकास के जरिए प्रधानमंत्री मोदी का सपना है कि देश का नौजवान व्यावसायिक विषयों में प्रशिक्षित होकर रोजगार पैदा करें. इसके लिए सरकार ने भारी भरकम बजट भी रखा है, लेकिन आज तक की टीम ने जब जमीनी स्तर पर जांच पड़ताल शुरू की तो पता चला कि झूठे सर्टिफिकेट और नामों से सब्सिडी का पैसा दलालों द्वारा खाया जा रहा है.
40 करोड़ लोगों को रोजगार का लक्ष्य
प्रधानमंत्री मोदी की महात्वाकांक्षी कौशल विकास योजना की शुरुआत जुलाई 2015 में की गई थी. इसके जरिए साल 2022 तक देश के करीब 40 करोड़ लोगों को रोजगार देने का लक्ष्य रखा गया. चाहे मंत्रालय हों या तमाम एनजीओ या फिर प्राइवेट कंपनियां, इनका मकसद है कि 2022 तक कौशल विकास का यह लक्ष्य हासिल कर लिया जाए.
कौशल विकास योजना का मकसद बड़े पैमाने पर लोगों को तेजी के साथ उच्च पैमाने पर व्यावसायिक प्रशिक्षण मुहैया कराना है ताकि अगले दशक तक देश दुनिया के सबसे बड़े रोजगार वाले देश के रूप में तैयार हो सके, लेकिन जब आज तक ने स्किल इंडिया मिशन से जुड़ा हुआ कपड़ा मंत्रालय के इंटिग्रेटेड स्किल डवलपमेंट स्कीम की जांच पड़ताल शुरू की तो पाया कि इस कार्यक्रम के रास्ते में कई सवाल पत्थर बनकर खड़े हैं.
यहां यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि कपड़ा मंत्रालय का इंटिग्रेटेड स्किल डवलपमेंट स्कीम (आईएसडीएस) प्रोजेक्ट पब्लिक प्राइट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल पर चलता है. इसमें काम करने वाली एजेंसियों को प्रति उम्मीदवार दस हजार रुपये की तय राशि की 75 फीसदी सरकारी सब्सिडी मिलती है, लेकिन हमने जब जांच पड़ताल शुरू की तो पता चला कि जिनको फायदा मिलना था, उनमें से कुछ लोग भ्रष्ट बिचौलियों के धोखे का शिकार हुए.
योजना में गड़बड़झाला का पूरा मामला सामने आने के बाद कौशल विकास मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का कहना है कि पूरे मामले की जांच की जाएगी. दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी.
बिना प्रशिक्षण मिला सर्टिफिकेट
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के दूरदराज वाले गांव चौकिन पुरवा में हमने आईएसडी योजना में फायदा पाने वालों की लिस्ट निकालने का प्रयास किया. सरकारी योजनाओं में जिनका नाम है, उनमें से तीन लोगों की हमने निशानदेही की.
आईएसडीएस के रिकॉर्ड में तारा चंद्रा एक प्रशिक्षित दर्जी हैं जिन्होंने मॉडर्न एजुकेशन सोसायटी में सिलाई का प्रशिक्षण लिया है. इसके लिए उन्हें कपड़ा मंत्रालय की ओर से 23 सितंबर, 2017 को सर्टिफिकेट (नंबर 17210867803) भी दिया गया, जबकि खुद तारा चंद्र का कहना है कि वो कभी भी उस केंद्र पर गए ही नहीं.
तारा चंद्र के अलावा राकेश को भी सिलाई में प्रशिक्षण के लिए इसी सोसायटी से कपड़ा मंत्रालय की ओर से जारी सर्टिफिकेट (कंडिडेट नंबर 1507398) हासिल हुआ है.
आईएसडीएस की वेबसाइट पर 5 फरवरी 2018 को राकेश को रोजगार पाने वालों में दिखाया गया है और वो भी महीने की 6500 रुपये की कमाई पर, लेकिन खुद राकेश का कहना है कि वो किसी ट्रेनिंग के लिए कभी गए ही नहीं. अनिता देवी का भी यही हाल है जिन्हें 23 सितंबर 2017 को जारी सर्टिफिकेट (नंबर 17210867810) दिया गया. इनका भी नाम आईएसडीएस के फायदेमंद लोगों की सूची में शामिल है.
दूसरे गांव का भी यही हाल
चौकिन पुरवा ही पास के एक अन्य अतर्रा गांव में भी यही गड़बड़झाला दिखा. इस गांव के रामानुज को भी आईएसडीएस के तहत दर्जी होने का सर्टिफिकेट मिल गया है. इन्हें MAEER, महाराष्ट्र की ओर से सर्टिफिकेट (नंबर 17130665810) दिया गया है.
लेकिन रामानुज को पता ही नहीं है कि 2016 में महाराष्ट्र एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग एंड एजुकेशनल रिसर्च यानी MAEER से उसको ट्रेनिंग दी जा चुकी है क्योंकि वो कभी वहां गए ही नहीं. जब उनसे कार्यक्रम के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि छेदीलाल नाम के एक बिचौलिये ने उनको ठग लिया.
रामानुज का आरोप है कि उस दलाल ने सरकारी ट्रेनिंग का झूठा वादा करके उनका आधार कार्ड तक ले लिया था.
महाराष्ट्र एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग एंड एजुकेशनल रिसर्च के पुणे स्थित दफ्तर में रामानुज के आरोपों की सच्चाई की जांच की गई तो इसके कॉर्डिनेटिंग ऑफिसर महेश देशपांडे ने दावा किया कि सरकारी नियमों के मुताबिक ही कार्यक्रम कराया गया था.
सरकारी जांच की जरूरत
महेश देशपांडे इस घोटाले से साफ-साफ इंकार कर गए, लेकिन आजतक के पास जो दस्तावेज और लोगों के बयान हैं, वो बताते हैं कि गड़बड़ियां हुई हैं और इसमें सरकारी जांच की जरूरत है.
जिन नौजवानों को हुनरमंद बनाने के लिए ट्रेनिंग और सर्टिफिकेट दिया गया, उनको उसके बारे में पता ही नहीं. यह सब कागज पर हुआ और बिचौलिये सरकारी सब्सिडी उड़ा ले गए. ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार की योजनाओं को अमल में लाने वाली निजी कंपनियां और संस्थान भी तो इसमें मिले हुए नहीं हैं.
सामाजिक कार्यकर्ता रुबी जैनब जो यूपी के बांदा जिले में अलीगंज स्थित अल फिजा नाम का एनजीओ चलाती हैं. उनका एनजीओ अल फिजा उपेक्षित-वंचित समुदाय के लोगों को व्यावसायिक प्रशिक्षण देता है. कपड़ा मंत्रालय से जुड़े सोनीपत के एक संगठन मॉडर्न एजुकेशन सोसयटी ने रुबी जैनब के एनजीओ को आईएसडीएस कार्यक्रम के तहत पिछले साल 150 महिलाओं को सिलाई में ट्रेनिंग देने के लिए चुना था.
आरटीआई से हुआ खुलासा
इसके बाद जैनब ने ट्रेनिंग क्लास शुरू की. उनको लगता था कि सरकार की तरफ से प्रायोजित ये एक भरोसेमंद स्कीम है. शुरुआती दौर में सब कुछ अच्छा चलता रहा, लेकिन उनके परेशान होने की घड़ी तब आई जब मॉडर्न एजुकेशन सोसायटी के इंस्पेक्टरों ने अचानक उनके एनजीओ में आना बंद कर दिया. तब जैनब ने कार्यक्रम के बारे में जानकारी के लिए एक आरटीआई फाइल की जिसमें मिले जवाब ने उनको हिलाकर रख दिया.
23 अगस्त, 2018 को आरटीआई की ओर से भेजे गए जवाब से खुलासा हुआ कि उनके एनजीओ से 146 महिलाओं को पहले ही ट्रेनिंग मिल चुकी है. इतना ही नहीं, उनमें 95 महिलाओं को तो काम भी मिल गया. जैनब के मुताबिक उनके यहां ट्रेनिंग लेने वालों को न तो कोई कोर्स सर्टिफिकेट मिला, ना ही उस प्रोग्राम को कराने के लिए उनको कोई भुगतान हुआ.
लेकिन आरटीआई से पता चला कि मंत्रालय ने अलग-अलग जगहों पर आईएसडीएस कोर्स के चलाने के लिए सोनीपत के मॉडर्न एजुकेशन सोसायटी को भुगतान भी कर दिया और वो भी एक करोड़ 12 लाख रुपये की भारी भरकम रकम राशि.
20 साल की शबनम का नाम भी जैनब के सेंटर पर सिलाई कोर्स में दर्ज है, लेकिन ना तो उसको डिप्लोमा सर्टिफिकेट मिला, ना कोई काम, जबकि आरटीआई के जवाब से पता चला कि उम्मीदवारों की एक लंबी चौड़ी लिस्ट तो बड़ी कंपनियों में नौकरी भी पा चुकी है.
गड़बड़ी से इंकार
आजतक की टीम जब मॉडर्न एजुकेशन सोसायटी के तत्कालीन प्रेसिडेंट मोहिंदर गौर के पास उनकी सफाई के लिए पहुंची तो उन्होंने सिरे से किसी तरह की गड़बड़ी के आरोप को खारिज कर दिया. मोहिंदर गौर ने किसी तरह की गड़बड़ी से इंकार कर दिया. अपने बचाव में उन्होंने मंत्रालय के वही आंकडे़ दिखाए जिन पर जैनब का विवाद था.
यूपी के अतर्रा गांव में स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता राजा भैया का आरोप है कि व्यावसायिक प्रशिक्षण का झूठा भरोसा देकर बिचौलिये गांव वालों के आधार कार्ड इकट्ठा कर रहे हैं. राजा भैया ने स्किल इंडिया मिशन से जुड़े हुए राज्य सरकार के कार्यक्रम को चलाने के लिए अपना सेंटर शुरू किया, लेकिन इनका कहना है कि भ्रष्टाचार के कारण उन्होंने इसे बंद कर दिया.
ये सारी पड़तालें यही बताती हैं कि भ्रष्ट और अनैतिक शक्तियां हमारे नौजवानों के रोजगार के लिए शुरू हुई दूरदर्शी कार्यक्रमों में कैसे पलीता लगा देते हैं.