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अरुण जेटली का विकल्प तलाशना मुश्किल, निधन से बीेजेपी को हुए 5 बड़े नुकसान

वाजपेयी और मोदी सरकार में मंत्री रहे अरुण जेटली के निधन से भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) को कई बड़े नुकसान हुए हैं. वह पार्टी में हर तरह की जिम्मेदारियां निभाने में आगे थे.

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बीजेपी के संकटमोचक माने जाते थे अरुण जेटली. (फाइल फोटो-आईएएनएस)
बीजेपी के संकटमोचक माने जाते थे अरुण जेटली. (फाइल फोटो-आईएएनएस)

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के दिग्गज नेता अरुण जेटली का निधन पार्टी के लिए बड़ा नुकसान है. जेटली को पार्टी का संकटमोचक भी कहा जाता था. उन्होंने कई बार अपनी यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर उन्हें दिग्गज राजनीतिक बताते हुए कहा कि वह एक मुखर नेता थे,जो बौद्धिक और कानूनी क्षेत्र में दक्षता रखते थे. वहीं  पार्टी अध्यक्ष और गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि अरुण जेटली के निधन से हुए नुकसान की भरपाई जल्दी नहीं हो सकती. अमित शाह ने अरुण जेटली के निधन को व्यक्तिगत नुकसान भी बताया.

जेटली के निधन को बीजेपी के कई नेता पार्टी ही नहीं अपनी निजी क्षति के तौर पर बताते हैं. वजह कि जेटली संकट के समय नेताओं की व्यक्तिगत तौर पर भी मदद करने में आगे थे. अपने राजनीतिक करियर के दौरान अरुण जेटली बीजेपी में कई भूमिकाओं में रहे. वह पदों तक सीमित रहने की बजाए हर तरह की जिम्मेदारियां आगे बढ़कर निभाते रहे. कहा जा रहा है कि बीजेपी के लिए अरुण जेटली का विकल्प ढूंढना नामुमकिन तो नहीं मगर मुश्किल जरूर है.

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1-कौन सेट करेगा जेटली की तरह पार्टी का नैरेटिव

अरुण जेटली ने हमेशा बीजेपी का नैरेटिव सेट किया. खुद बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी इस बात को मानते हैं.  नितिन गडकरी का कहना है कि अरुण जेटली ने बौद्धिकों के बीच बीजेपी का नैरेटिव सेट करने में अहम भूमिका निभाई. चुनावों के दौरान मीडिया की स्ट्रेटजी क्या होगी, यह जेटली बखूबी तय करते थे. यही नहीं, पार्टी की हर मीटिंग से पहले जितनी तैयारी अरुण जेटली करके आते थे, उतना शायद ही दूसरा नेता. अरुण जेटली जो बोलते थे, उससे पार्टी की लाइन तय होती थी.

2-सच्चे संकट मोचक

बीजेपी की बात हो या फिर पार्टी नेताओं की, जब भी संकट आया, उसे दूर करने के लिए अरुण जेटली सामने खड़े हो जाते थे.  चाहे पार्टी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी को जैन हावाला कांड से उबारने का मामला हो या फिर गोधरा दंगों और इशरत जहां-सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर के कानूनी पचड़े से मोदी-शाह को बाहर निकालने का. हर जगह अरुण जेटली ने अहम भूमिका निभाई. यही नहीं जब बीजेपी सरकार नीतिगत मुद्दों और सरकारी फैसलों पर घिरी तब अरुण जेटली ने जमकर बचाव किया. नोटबंदी, जीएसटी, राफेल आदि मुद्दों पर जेटली ने ब्लॉग लिखने से लेकर तमाम प्रेस कांफ्रेंस कर फैसलों का बचाव किया.

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3-कानूनी और आर्थिक परामर्शदाता

अरुण जेटली सुप्रीम कोर्ट के दिग्गज वकील होने के नेता कानून के ज्ञाता रहे. मोदी सरकार की ओर से तैयार हर तरह के बिल की ड्राफ्टिंग में अरुण जेटली की भूमिका रहती थी. पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन निधन पर जारी बयान में कह चुकी हैं कि कानूनी मसलों  पर पार्टी जेटली से ही राय लेकर आगे बढ़ती थी. यही नहीं कानून के साथ आर्थिक मामलों में भी उनका समान अधिकार था. यही वजह है कि पीएम मोदी ने पहले कार्यकाल में उन्हें वित्तमंत्री बनाया. दूसरे कार्यकाल में भी वह वित्त मंत्री बनते. मगर स्वास्थ्य कारणों से उन्होंने 2019 के चुनाव से पहले ही राजनीति और सरकार से खुद को दूर रखने का फैसला कर लिया था. सूत्र बताते हैं कि योग्यता को देखते हुए पार्टी ने उन्हें बिना पोर्टफोलियो के भी मंत्री बनने का ऑफर दिया था. मगर जेटली को पद का लोभ नहीं रहा.

4- बीजेपी और दूसरे दलों के बीच बने रहे सेतु

बीजेपी और सहयोगी दलों के बीच अरसे से अरुण जेटली सेतु बने रहे. वाजपेयी-आडवाणी के दौर में बने एनडीए के प्रमुख शिल्पकारों में से एक माने जाते थे. 2019 के लोकसभा चुनाव में जब बिहार में नीतीश की जदयू, राम विलास पासवान की लोजपा और बीजेपी में सीटों का पेच फंसा तो अरुण जेटली ने ही इसे सुलझाया. खुद राम विलास पासवान कह चुके हैं कि उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से कहा था कि यह काम अरुण जेटली को सौंप दीजिए, वह बखूबी करेंगे.

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कभी 90 के दशक में बीजपी राजनीतिक तौर पर अछूत पार्टी मानी जाती थी. वजह कि कांग्रेस की तुलना में बीजेपी से दूसरे राजनीतिक दल दूरियां बनाकर चलते थे. मगर वाजपेयी ने एनडीए की छतरी तले कई दलों को साथ लाकर इस धारणा को तोड़ दिया. बीजेपी को स्वीकार्यता दिलाई. बताया जाता है कि तब अरुण जेटली एनडीए के शिल्पकारों में से एक रहे. अपने उदारवादी चेहरे और जेपी आंदोलन से जुड़ाव होने की वजह से दूसरे दलों के नेताओं से अच्छे संबंधों के चलते वह एनडीए के गठन में अहम भूमिका निभाने में सफल रहे. कई बार अहम मुद्दों पर विपक्ष से भी समन्वय बनाने में अरुण जेटली बीजेपी की मदद करते रहे.

5-कुशल रणनीतिकार, चुनाव मैनेजर

यह अलग बात है कि अरुण जेटली हमेशा राज्यसभा के जरिए संसद जाते रहे. जिंदगी में पहली बार 2014 में अमृतसर से लोकसभा चुनाव लड़े भी तो हार गए. फिर भी वह बीजेपी के लिए कुशल चुनावी रणनीतिकार रहे. हर चुनाव में बीजेपी का मेनिफेस्टो तैयार करने में अहम भूमिका निभाते रहे. 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचार कैंपेन की उन्होंने कमान संभाली. उन्होंने ही 2014 में यह तय किया था कि चुनावी पोस्टरों में बीजेपी नहीं मोदी सरकार का नारा दिया जाएगा. हर पोस्टर में सिर्फ और सिर्फ मोदी छाए रहेंगे. क्योंकि बीजेपी की ओर से कराए गए आंतरिक सर्वे में जनता के बीच मोदी की अपार लोकप्रियता का पता चला था. उस वक्त जेटली ने चर्चित बयान देते हुए कहा था कि इस बार प्रधानमंत्री का चेहरा संसदीय बोर्ड नहीं देश की जनता तय करेगी. 2002 और 2008 में गुजरात और कर्नाटक राज्य का प्रभारी रहते हुए उन्होंने बीजेपी को सफलता दिलाई थी.

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