लोकसभा चुनाव 2019 से पहले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस को मिली जीत के बाद पार्टी के हौसले बुलंद हैं. तीन राज्यों के शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सहित कई दलों के नेता शामिल हुए, लेकिन ममता बनर्जी, मायावती और अखिलेश यादव शामिल नहीं हुए.
कांग्रेस शपथ ग्रहण के जरिए सत्ताधारी बीजेपी को 'विपक्षी ताकत' का एहसास कराने की कोशिश में थी. ऐसे में विपक्ष के तीन बड़े नेताओं का कांग्रेस के समारोह में न पहुंचने पर सवाल उठने लगे हैं.
बता दें कि कांग्रेस ने तीन राज्यों में शपथ ग्रहण कार्यक्रम के लिए 25 पार्टियों को न्योता भेजा था. राहुल ने इसके जरिए विपक्षी एकता का ताना-बाना बुना था. सोमवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल के साथ पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार, एलजेडी नेता शरद यादव, डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला साथ नजर आए. कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी, पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौडा, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव, जेएमएम अध्यक्ष हेमंत सोरेन भी नजर आए.
हालांकि सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, बसपा प्रमुख मायावती और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी कांग्रेस के इस समारोह में शामिल नहीं हुए. जबकि कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में विपक्ष दलों ने एकजुटता दिखाई थी. इन तीनों राज्यों से ज्यादा विपक्षी नेता जुटे थे.
कांग्रेस के इन तीन राज्यों में 'मेगा शो' में विपक्षी एकता का प्रदर्शन की उम्मीद जताई जा रही थी. लेकिन ऐसा कर पाने में वो सफल नहीं हो सकी. राजनीतिक जानकारों की मानें तो तीनों दल कांग्रेस की अगुवाई में नहीं चलना चाहते हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि उन्होंने अपने आपको दूर रख रहे हैं. इससे साफ जाहिर है कि विपक्ष अभी तक राहुल गांधी के नाम पर एकमत नहीं है.
हालांकि तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में नतीजों ने कांग्रेस को बल जरूर मिला है, वहीं कुछ नेता राहुल गांधी के नेतृत्व के भरोसे 2019 लोकसभा चुनाव लड़ने को राजी हैं. डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने पीएम पद के प्रत्याशी के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नाम को आगे बढ़ाया.
राहुल के पीएम प्रत्याशी बनाए जाने पर कई दल हैं जो राजी नहीं है. इसमें सपा, टीडीपी, बसपा, टीएमसी और एनसीपी स्टालिन के राय से सहमत नहीं हैं. उनका मानना है कि लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री के बारे में फैसला होना चाहिए. यही वजह है कि सोमवार को शपथ ग्रहण के समारोह में विपक्ष के तीन बड़े नेता नजर नहीं आए.