दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल को शराब घोटाले में निचली अदालत ने बरी कर दिया था. इस फैसले के खिलाफ जांच एजेंसी ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की है. दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच इस मामले की सुनवाई करेगी. अब अरविंद केजरीवाल ने यह ऐलान किया है कि वह जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की कोर्ट में पेश नहीं होंगे.
उन्होंने इसे लेकर जस्टिस स्वर्णकांता को पत्र भी लिखा है. अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता को पत्र लिखकर कहा है कि वह खुद या वकील के जरिये उनके सामने पेश नहीं होंगे. उन्होंने यह भी कहा है कि मेरी जस्टिस स्वर्णकांता से न्याय मिलने की उम्मीद टूट गई है.
इसलिए मैंने महात्मा गांधी के सत्याग्रह की राह पर चलने का फैसला लिया है. दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने यह भी कहा है कि जस्टिस स्वर्णकांता के फैसले की अपील में सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार रखूंगा.
इस पूरे विवाद पर वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश टम्टा ने महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं को स्पष्ट किया है. उन्होंने पांच पॉइंट में इस पूरे मामले के हर पहलू पर प्रकाश डाला है.
1. वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश टम्टा के अनुसार, अगर किसी आरोपी को बरी किया जाता है तो अदालत उसे 'धारा 437A CrPC' के तहत एक बॉन्ड साइन करने को कहती है. इसका मतलब है कि आरोपी भविष्य में किसी भी अपील की सुनवाई के दौरान कोर्ट में पेश होने का वादा करता है.
2. कोर्ट में पेश न होने पर क्या होगा?
अगर आरोपी इस बॉन्ड का पालन नहीं करता है, तो अदालत उसके खिलाफ, पहले जमानती वारंट (Bailable Warrant) और उसके बाद गैर-जमानती वारंट (Non-Bailable Warrant) जारी कर सकती है.

3. केजरीवाल केस में क्या स्थिति है?
राउज एवेन्यू कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल और अन्य 22 आरोपियों को डिस्चार्ज करने के बाद 'धारा 437 CrPC' के तहत बेल बॉन्ड भरने को कहा था.
इसका मतलब है कि, केजरीवाल ने एक 'पर्सनल बॉन्ड' और एक 'श्योरिटी (गारंटर)' दिया है. उन्होंने यह वादा किया है कि हाई कोर्ट में अपील की सुनवाई के दौरान वह पेश होंगे.
4. हाई कोर्ट में क्या हो सकता है?
अगर अरविंद केजरीवाल पेश नहीं होते हैं तो हाई कोर्ट उनके खिलाफ वारंट जारी कर सकता है. सुनवाई एकतरफा (Ex Parte) भी चल सकती है.
5. एक्स-पार्टी सुनवाई का असर
अगर केजरीवाल कोर्ट में पेश नहीं होते तो अदालत सिर्फ CBI और अन्य पक्षों की दलीलें सुनेगी. केजरीवाल को अपनी बात रखने का मौका नहीं मिलेगा.
अगर फैसला CBI के पक्ष में जाता है तो मामला फिर से ट्रायल कोर्ट में जाएगा. वहां केजरीवाल को आरोपी के रूप में पेश होना पड़ेगा. वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश टम्टा के मुताबिक, कानूनी प्रक्रिया साफ है, बेल बॉन्ड के तहत कोर्ट में पेश होना अनिवार्य है. अगर ऐसा नहीं होता है, तो न सिर्फ वारंट जारी हो सकते हैं, बल्कि केस की सुनवाई भी आरोपी की गैरमौजूदगी में आगे बढ़ सकती है, जिसका सीधा असर केस के नतीजे पर पड़ सकता है.
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अरविंद केजरीवाल ने लाइव आकर रखी अपनी बात
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि यह कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट का मुद्दा है. जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के दोनों बच्चे केंद्र सरकार के वकीलों के पैनल में हैं. उन्होंने कहा है कि भारत सरकार के पैनल में 700 से ज्यादा वकील हैं, लेकिन सबसे ज्यादा केस जिन वकीलों को उनमें जस्टिस शर्मा के बच्चे शामिल हैं.
जस्टिस स्वर्णकांता से व्यक्तिगत विरोध नहीं- केजरीवाल
केजरीवाल ने कहा कि तुषार मेहता सरकारी वकीलों को केस आवंटित करते हैं. उन्होंने कहा है कि ऐसे में जब जस्टिस शर्मा के बच्चों को केस देने वाला व्यक्ति ही जब सरकार की ओर से उनके सामने खड़ा होगा, क्या वह मुझे न्याय दे पाएंगी. केजरीवाल ने कहा कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से मेरा कोई व्यक्तिगत विरोध नहीं है. उन्होंने कहा कि मेरे लिए आसान रास्ता था कि एक बड़ा वकील रखूं और अपना मुकदमा लड़ूं. लेकिन मैंने अंतरात्मा की आवाज सुनी.
पूर्व सीएम ने किया सत्याग्रह का ऐलान
केजरीवाल ने महात्मा गांधी की राह पर चलकर सत्याग्रह का ऐलान करते हुए कहा कि जस्टिस शर्मा की कोर्ट के फैसले को लेकर सभी कानूनी रास्ते, सभी कानूनी अधिकार सुरक्षित रखता हूं. उन्होंने कहा कि मुझसे या आम आदमी पार्टी से जुड़ा कोई भी केस अगर भविष्य में जस्टिस शर्मा की कोर्ट में जाता है और उसमें तुषार मेहता, केंद्र सरकार और बीजेपी पार्टी नहीं रहे, तो हम उनकी कोर्ट में भी अपना केस मजबूती से लड़ेंगे.
केस की मौजूदा स्थिति
इस मामले में एक असामान्य स्थिति सामने आई है. हाईकोर्ट के आदेशों से पता चलता है कि 23 आरोपियों में से केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, विजय नायर समेत कई लोगों ने अभी तक सीबीआई की अपील पर औपचारिक जवाब दाखिल नहीं किया है. वे लगातार सिर्फ जज के recusal की मांग पर बहस करते रहे हैं. हाईकोर्ट ने 9 मार्च, 16 मार्च, 6 अप्रैल, 13 अप्रैल और 20 अप्रैल को बार-बार जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया.
महत्वपूर्ण बात यह है कि हाईकोर्ट ने अभी तक आरोपियों के डिस्चार्ज आदेश पर कोई रोक नहीं लगाई है. सिर्फ उस हिस्से पर रोक लगाई गई है, जिसमें सीबीआई अधिकारी के खिलाफ टिप्पणियां और विभागीय जांच के निर्देश दिए गए थे. 14 मार्च को केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट में भी हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन वह याचिका अभी “defects” के कारण लंबित है.
अब इस मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल को तय है, जहां सीबीआई अपनी दलीलें शुरू कर सकती है.
कानून क्या कहता है?
धारा 437A CrPC के तहत, किसी आरोपी को बरी या डिस्चार्ज होने के बाद भी बॉन्ड भरना होता है कि अपील होने पर वह उच्च अदालत में पेश होगा.
धारा 446 CrPC के मुताबिक, अगर आरोपी पेश नहीं होता, तो बॉन्ड जब्त हो सकता है और अदालत उसे पेश कराने के लिए वारंट जारी कर सकती है.
धारा 386 CrPC कहती है कि अपील की सुनवाई के दौरान अदालत आरोपी या उसके वकील को सुन सकती है. लेकिन अगर आरोपी उपस्थित नहीं होता, तब भी अदालत आगे की कार्रवाई कर सकती है, जैसे मामले को दोबारा ट्रायल के लिए भेजना.
इसके अलावा, अदालत “एमिकस क्यूरी” (amicus curiae) नियुक्त कर सकती है, जो आरोपी की ओर से कानूनी सहायता दे.
क्या हो सकता है आगे?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अगर केजरीवाल अदालत में पेश नहीं होते, तो:
अदालत पहले जमानती वारंट जारी कर सकती है
इसके बाद गैर-जमानती वारंट (NBW) भी जारी हो सकता है
आरोपी की ओर से अदालत एमिकस क्यूरी नियुक्त कर सकती है
वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा के मुताबिक, “यह आपराधिक अपील है, इसलिए ex-parte कार्यवाही का सवाल नहीं उठता. प्राकृतिक न्याय के तहत सभी पक्षों को सुनना जरूरी है.”
वहीं वरिष्ठ वकील सतीश तमटा का कहना है कि अगर आरोपी बॉन्ड के बावजूद पेश नहीं होता, तो अदालत वारंट जारी कर सकती है.
अदालतों के पुराने फैसले क्या कहते हैं?
2008 में दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले में कहा गया था कि अगर आरोपी जानबूझकर पेश नहीं होता, तो यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है.जस्टिस विक्रमजीत सेन और वी.के. शाली की बेंच ने कहा था कि 'जो व्यक्ति खुद सुनवाई में शामिल नहीं होता, वह अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत नहीं कर सकता.' अदालत ने यह भी कहा था कि अपील में अनुपस्थित रहने के बावजूद आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है.
एक रिटायर्ड हाईकोर्ट जज ने नाम न छापने की शर्त पर कहा,'अगर आपको कार्यवाही की जानकारी है और फिर भी आप पेश नहीं होते, तो इसके कानूनी परिणाम होंगे. कानून को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.'