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बंगाल चुनाव: इन सीटों पर नोटा ने कर दिया वो कांड, जो हारने वाले को ताउम्र चुभेगा

पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 के नतीजों ने जहां एक ओर सत्ता परिवर्तन की बड़ी कहानी लिखी, वहीं दूसरी ओर नोटा ने हारने वाले उम्मीदवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है. बंगाल की इन सीटों पर जीत का अंतर इतना कम रहा कि वहां नोटा दबाने वाले वोटरों की संख्या हार-जीत के फासले से कहीं ज्यादा निकल गई.

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बंगाल चुनाव में 4 सीटों पर नोटा ने नेताओं की पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया है. (Photo: ITG)
बंगाल चुनाव में 4 सीटों पर नोटा ने नेताओं की पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया है. (Photo: ITG)

एक पुरानी कहावत है कि हारकर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं, लेकिन बंगाल चुनाव के इन आंकड़ों को देख लीजिए, यहां असली बाजीगर कोई नेता नहीं बल्कि नोटा बन गया है. ईवीएम का वो आखिरी बटन जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, उसने इस बार बंगाल की कई सीटों पर ऐसा खेल किया है कि हारने वाले उम्मीदवार अपना सिर पकड़ कर बैठे होंगे.

मामला बड़ा दिलचस्प है और थोड़ा पेचीदा भी. लोकतंत्र में जनता जनार्दन होती है, लेकिन जब जनता का एक हिस्सा हाथ जोड़कर कह दे कि साहब, हमें आपमें से कोई पसंद नहीं, तो समझ लीजिए कि हार-जीत का सारा गणित बिगड़ने वाला है. बंगाल की चार सीटों सतगछिया, जंगीपाड़ा, इंदस और रैना विधान सभा सीट पर जो कुछ भी घटा है, वो किसी सस्पेंस वाली फिल्मी कहानी से कम नहीं है. यहां जीत का सेहरा किसी और के सिर बंध सकता था, लेकिन जनता की एक खामोश नाराजगी ने पूरी बाजी ही उलट दी है.

आसान भाषा में कहें तो इन सीटों पर नोटा ने वो काम कर दिया जो विपक्षी पार्टियां नहीं कर पाईं. यहां हार-जीत का अंतर इतना बारीक है कि अगर नोटा दबाने वाले चंद मतदाता भी किसी एक तरफ झुक जाते, तो इन विधानसभाओं के चेहरे कुछ और ही होते. अब आंकड़ों के इस खेला को समझिए कि कैसे इन चार सीटों पर नोटा ने नेताओं की पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया है.

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हार-जीत के अंतर से ज्यादा रिजेक्शन वाले वोट

अब जरा सतगछिया विधान सभा सीट का हाल समझिए. यहां बीजेपी के अग्निस्वर नस्कर ने टीएमसी की सोमश्री बेताल को हरा तो दिया, लेकिन जीत का अंतर जानकर आप दंग रह जाएंगे, जो कि सिर्फ 401 वोट है. मजे की बात ये है कि इसी सीट पर 1654 लोगों ने नोटा का बटन दबाया है. यानी जीत के अंतर से चार गुना ज्यादा लोगों ने कह दिया कि हमें कोई पसंद नहीं. अगर इन 1600 लोगों में से मामूली वोट भी सोमश्री की तरफ चले जाते, तो आज पासा पलट चुका होता.

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यही कहानी जंगीपाड़ा सीट पर भी नजर आती है, जहां बीजेपी के प्रसेनजित बाग ने टीएमसी के स्नेहाशीष चक्रवर्ती को 862 वोटों के मामूली अंतर से मात तो दे दी, लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि यहां 2388 लोगों ने नोटा का बटन दबाया है. अब आप खुद ही सोचिए कि जहां हार-जीत का फैसला 1000 वोटों से भी कम पर टिका हो और वहां रिजेक्शन वाले वोट ढाई हजार के करीब पहुंच जाएं, तो हारने वाले उम्मीदवार के मन में ये टीस तो ताउम्र रहेगी कि काश वो उन नाराज वोटरों को अपनी तरफ मोड़ पाते.

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इंदस और रैना विधान सभा सीट का किस्सा भी कुछ ऐसा ही रहा, जहां चुनावी गणित ने सबको चौंका दिया. धनखली में बीजेपी के निर्मल कुमार ने महज 900 वोटों से जीत तो दर्ज की, लेकिन वहां 1582 लोगों ने किसी को भी अपना प्रतिनिधि नहीं माना. वहीं पुरसुराह की बात करें तो यहां बीजेपी के सुभाष पात्रा ने 834 वोटों से बाजी तो मार ली, लेकिन यहां भी 1442 लोगों ने नोटा का ही बटन दबाना बेहतर समझा.

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बंगाल में पहली बार कमल का उदय

4 मई 2026 की तारीख पश्चिम बंगाल के इतिहास में दर्ज हो गई है. राज्य में पहली बार बीजेपी ने 207 सीटों पर जीत दर्ज की है. इस चुनाव नतीजे के साथ ही ममता बनर्जी के उस 15 साल लंबे शासन का अंत हो गया है, जो 20 मई 2011 से लगातार चला आ रहा था.

सबसे बड़ा उलटफेर भवानीपुर सीट पर हुआ, जहां बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को शिकस्त दी. इस चुनाव में टीएमसी महज 80 सीटों पर सिमट कर रह गई है. साफ है कि बंगाल की जनता ने इस बार बदलाव के लिए वोट किया है, लेकिन ये चार सीटें यह भी बताती हैं कि जनता की खामोश नाराजगी ने इस हार-जीत के अंतर को और भी कड़वा बना दिया है.

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