बहुत कम नेताओं को राजनीति में इतनी तेजी से सफलता मिलती है, जितनी राघव चड्ढा को आम आदमी पार्टी और संसद में मिली. वे AAP प्रमुख अरविंद केजरीवाल के सबसे करीबी या यूं कहें कि वह केजरीवाल की 'आंखों का तारा' हुआ करते थे. यही कारण है कि 2019 लोकसभा चुनाव में दक्षिण दिल्ली से हारने के सिर्फ 9 महीने बाद ही वे दिल्ली विधानसभा में विधायक बन गए.
इसके बाद वह 2022 के पंजाब चुनाव में वे कोर टीम का हिस्सा थे और अहम फैसलों में उनकी भूमिका रही. पंजाब फतह का इनाम उन्हें जल्द ही मिला और पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया. 2024 तक, संजय सिंह के साथ मिलकर चड्ढा INDIA ब्लॉक के साथ गठबंधन और सीट बंटवारे की बातचीत में भी शामिल रहे.
एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर जिसने AAP की गतिविधियों पर करीब से नजर रखी है, मैं बिना किसी हिचक के यह कह सकता हूं कि अपने गोल्डन टाइम में चड्ढा को अरविंद केजरीवाल से मिलने के लिए किसी अपॉइंटमेंट की ज़रूरत नहीं पड़ती थी. पंजाब के मामलों में वे केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद थे. पंजाब में वे दिल्ली के 'आंख और कान' माने जाते थे.
पंजाब में भले ही 'आप' ने भगवंत मान को मुख्यमंत्री चुना, लेकिन चड्ढा का दबदबा पंजाब के किसी भी अन्य मंत्री की तुलना में बेजोड़ था. लुटियंस दिल्ली जानती थी कि अरविंद केजरीवाल तक पहुंचने वाली हॉटलाइनों में से एक राघव चड्ढा थे.
लेकिन फिर दिल्ली आबकारी नीति का मामला सामने आया. 'आप' का शीर्ष नेतृत्व गहरे संकट में फंस गया. सबसे पहले पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया गिरफ्तार हुए, फिर एक अलग केस में सत्येंद्र जैन गिरफ्तार हुए और अंततः ईडी केजरीवाल के दरवाजे तक पहुंच गई. हालांकि कई लोगों को चड्ढा के अपने सहयोगियों के साथ बिगड़ते रिश्तों की भनक थी, लेकिन केजरीवाल से उनकी नजदीकी के कारण कोई भी नेता उनके खिलाफ खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं करता था.
जब दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल जेल में थे, तब चड्ढा, संदीप पाठक और सुनीता केजरीवाल उन गिने-चुने लोगों की सूची में शामिल थे, जिन्हें तिहाड़ जेल में उनसे मिलने की अनुमति थी. लेकिन केजरीवाल की गिरफ्तारी के दौरान भारत से चड्ढा की लंबी अनुपस्थिति ने आग में घी डालने का काम किया. सोशल मीडिया पर कट्टर 'आप' समर्थक भी पूछने लगे, 'जब पार्टी गहरे संकट में है, तब राघव चड्ढा कहां हैं?'
जेल से केजरीवाल की रिहाई के बाद उन्होंने एक-दो फोटो खिंचवाकर स्थिति को संभालने की कोशिश की, लेकिन 2025 तक पार्टी कैडर में उनके खिलाफ असंतोष साफ दिखने लगा था.
राज्यसभा सांसद के रूप में उन्हें सौंपा गया आखिरी गंभीर काम दिल्ली की मतदाता सूची की जांच करना था. लेकिन आम आदमी पार्टी ने अपना ये किला खो दिया और फरवरी 2025 में भाजपा के हाथों दिल्ली हार गई. इसके बाद संगठनात्मक फेरबदल हुआ. सिसोदिया को पंजाब का प्रभार मिला, गोवा, गुजरात और छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारियां भी बांटी गईं, लेकिन चड्ढा का नाम किसी भी लिस्ट में नहीं था. यह मेरे लिए आश्चर्य की बात नहीं थी, बल्कि पार्टी के आंतरिक मतभेदों पर मेरी समझ पर सार्वजनिक मुहर थी.
क्या गलत हुआ? पतन कैसे शुरू हुआ?
संसद के मौजूदा बजट सत्र के दौरान जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव ला रही थी, तब उस प्रस्ताव पर राघव चड्ढा के हस्ताक्षर नहीं थे. उन्होंने उस पर दस्तखत नहीं किए थे. आने वाले दिनों में आपको यह बात बार-बार सुनने को मिलेगी.
हालांकि, घटनाक्रम से भली-भांति परिचित सूत्रों ने मुझे इस बात की पुष्टि करते हुए बताया कि राघव चड्ढा ने TMC के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए, यह बात बिल्कुल सच है. लेकिन, उन्होंने ऐसा करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि पहले मुझे अपनी पार्टी से बात कर लेने दीजिए. मुझे अपनी पार्टी से सलाह-मशविरा करना होगा. हो सकता है कि उस समय या उस दिन उनसे संपर्क करने का समय सही न रहा हो. यह भी हो सकता है कि वह दिन उनके लिए कोई बुरा दिन रहा हो, या फिर उनका मूड ठीक न रहा हो.
लेकिन सवाल यह है कि क्या AAP में राज्यसभा के डिप्टी लीडर के पद से चड्ढा को हटाने के लिए यह काफी था? बिल्कुल नहीं! अपने बॉस का पसंदीदा होने के साथ-साथ कुछ अतिरिक्त खतरे भी जुड़े होते हैं. AAP में उनकी तेज़ी से हुई तरक्की से कई लोग जलते थे. पंजाब से लेकर दिल्ली तक, लोगों के अपने-अपने कारण थे. लेकिन AAP के सबसे मुश्किल दिनों में उनकी गैर-मौजूदगी लोगों की आंखों में खटकने लगी थी.
AAP के एक अंदरूनी सूत्र ने एक बार मुझे बताया था, 'राघव ने पार्टी प्रमुख को अपनी लंबी गैर-मौजूदगी के बारे में पहले ही बता दिया था. उनकी गैर-मौजूदगी को शीर्ष नेतृत्व ने मंज़ूरी दी थी.'
कुछ नेताओं का मानना था कि AAP में उन्हें बहुत कम समय में ही बहुत कुछ मिल गया.
चड्ढा के एक सहकर्मी ने मुझे बताया, 'पार्टी के भीतर राघव की तरक्की अविश्वसनीय रही है. जहां हम जैसे कार्यकर्ताओं को पीठ थपथपाने जैसी छोटी सी तारीफ पाने के लिए भी लंबी दौड़ लगानी पड़ती थी, वहीं राघव को छोटी सी दौड़ के लिए ही मेडल मिल जाता था. वह मीडिया में AAP का चेहरा बनने के हकदार हैं. उनका व्यक्तित्व बहुत आकर्षक है. INDIA ब्लॉक की बातचीत में वह एक अहम हिस्सा बने रहे. AAP ने उन पर निवेश किया, लेकिन जब फसल काटने, यानी निवेश का फायदा उठाने का समय आया तो राघव को हटा दिया गया.'
पार्टी के एक और सीनियर नेता ने मुझसे कहा, 'ऐसा लगता है कि दोनों के बीच दूरियां बढ़ गई हैं. पार्टी ने सुलह की कोशिश नहीं की. चड्ढा ने भी इसके लिए खास कोशिशें नहीं कीं. जब पार्टी हाईकमान आपमें दिलचस्पी लेना बंद कर देता है, तो रिश्ते सुधारना मुश्किल हो जाता है. उन्होंने भी ऐसी कोई कोशिश नहीं की.'
अब याद कीजिए, जब AAP के टॉप नेताओं को CBI के एक्साइज पॉलिसी केस में बरी किया गया था, तब क्या केजरीवाल के इस खास सिपहसालार (चड्ढा) ने सोशल मीडिया पर एक भी पोस्ट किया था? आप समझ गए होंगे कि उनके सीनियर साथी किस ओर इशारा कर रहे थे.
चड्ढा, जो मीडिया में काफी एक्टिव रहते हैं, उन्होंने उस समय 'सत्यमेव जयते' जैसा कोई बयान भी नहीं दिया, जैसा कि उन्होंने तब दिया था जब केजरीवाल को भ्रष्टाचार के एक मामले में जमानत मिली थी.
AAP के एक सीनियर रणनीतिकार ने यह समझाते हुए कि राज्यसभा में चड्ढा की जगह अशोक मित्तल को क्यों लाया गया, मुझसे कहा, 'राघव AAP के संसदीय एजेंडे पर काम नहीं कर रहे थे. कोई भी राजनीतिक पार्टी यही चाहेगी कि उसका डिप्टी लीडर उसे मिले समय का इस्तेमाल उन मुद्दों पर करे जो पार्टी के एजेंडे या हितों के लिए सबसे ज़रूरी हैं. लेकिन वह अपनी इमेज बनाने में ही व्यस्त थे.'
उन्होंने आगे ज़ोर देते हुए कहा, 'AAP के हितों की सेवा करने के बजाय, वह अपनी ही वाहवाही लूटने में व्यस्त थे. उन्होंने AAP के असली मुद्दों के मुकाबले अपनी पर्सनल रील्स के लिए कंटेंट बनाने को ज़्यादा अहमियत दी.'
खास बात यह है कि लुटियंस दिल्ली में इस बात की ज़ोरदार चर्चा है कि क्या पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले चड्ढा BJP में शामिल हो सकते हैं. संसद में उनके एक साथी ने कहा, 'कोई चड्ढा को मतलबी इंसान कह सकता है, लेकिन मैं उन्हें बेवफा इंसान नहीं मानूंगा. उन्होंने अपने तौर-तरीके सुधारने की कोशिश नहीं की, इसलिए AAP की लीडरशिप ने यह फ़ैसला लिया.'
AAP के कुछ नेताओं का मानना है कि चड्ढा को राज्यसभा में उनकी भूमिका से हटाने की इतनी जल्दी करने की कोई जरूरत नहीं थी. उन्हें बोलने का समय देना है या नहीं, यह फैसला तो संसदीय दल के प्रमुख संजय सिंह के अधिकार क्षेत्र में आता है. यह फ़ैसला लिए बिना भी उनके बोलने के समय को कम किया जा सकता था.
वहीं, कुछ दूसरे लोग इस ओर इशारा करते हैं कि यह संदेश पंजाब के नेताओं के लिए है. राघव और ‘5 फिरोजशाह’ (केजरीवाल का निवास) के बीच के सारे पुल टूट चुके हैं. AAP के अंदर उनका यह पतन भले ही नाटकीय लगे, लेकिन यह चौंकाने वाला नहीं है. हमारे लिए तो यह एक ऐसी बात है जो पहले से ही साफ-साफ लिखी हुई नजर आ रही थी.