संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की मंगलवार को 135वीं जयंती है. बाबा साहेब के नाम से दुनियाभर में मशहूर डॉ. भीमराव आंबेडकर भारतीय संविधान ही नहीं बल्कि सियासत के भी केंद्र बन चुके हैं. दलित व शोषित-पीड़ित समाज डॉ. आंबेडकर को अपना मसीहा मानता है. यही वजह है कि आंबेडकर अपने जीवन में जिस राजनीतिक दल और विचाराधारा के खिलाफ खड़े थे, वो भी आज उनकी जयंती मनाने और उन्हें अपनाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही.
डॉ. भीमराव आंबेडकर जयंती को संसद की चौखट से लेकर सियासी गलियों के चौराहों तक मना रहे हैं. नीले झंडों के बीच सियासी दलों के द्वारा आंबेडकर जयंती को सामाजिक न्याय और समानता के रूप में भव्य स्तर पर मना रहे हैं, जिसका मुख्य फोकस दलित वोट बैंक को साधने पर है.
उत्तर से दक्षिण तक, हर राजनीतिक दल बाबा साहेब की विरासत पर अपना दावा ठोक रहा है, लेकिन सवाल ये उठता है कि अचानक 'जय भीम' का नारा हर पार्टी के लिए इतना ज़रूरी क्यों हो गया? आखिर डा. आंबेडकर प्रेम के पीछे का असली सियासी मकसद क्या है?
सपा, बसपा, बीजेपी मना रही आंबेडकर जयंती
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर बीजेपी, सपा और बसपा के बीच बाबासाहेब की सियासी विरासत पर दावेदारी को लेकर कड़ी प्रतिस्पर्धा देखी जा रही है. योगी सरकार ने 403 विधानसभा क्षेत्रों में 'आंबेडकर मूर्ति विकास योजना' के तहत बाबा साहेब की प्रतिमाओं का सौंदर्यीकरण और बाउंड्री वॉल का निर्माण शुरू किया है. बीजेपी के नेता दलित बस्तियों में आंबेडकर जयंती मनाने का काम कर रहे हैं.
आंबेडकर जयंती पर दलित बहुल सहारनपुर में पीएम मोदी विकास की सौगात देंगे. दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन कर राजनीतिक संदेश देते हुए नजर आएंगे. इस दौरान सीएम योगी आदित्यनाथ सहित दोनों यूपी के डिप्टीसीएम भी मौजूद रहेंगे. सहरानपुर ही नहीं बल्कि पश्चिमी यूपी को बसपा की राजनीतिक प्रयोग के रूप में देखा जाता रहा है.
बसपा उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के आंबेडकर पार्क में आंबेडकर जयंती मना रही है. मायावती ने सुबह ही आंबेडकर को श्रद्धांजली दी. इस तरह से बसपा ने अपने कोर वोटबैंक दलित समाज पर पकड़ बनाए रखने की कवायद मानी जा रही है. सपा भी यूपी के अलग-अलग जिलों में आंबेडकर जयंती मना रही है, अखिलेश यादव ने अपने 'पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक' (PDA) आउटरीच के तहत आंबेडकर जयंती को भव्य रूप से मनाने रहे.
डा आंबेडकर के बहाने वोट बैंक पर नजर?
आंबेडकर जयंती के बहाने सियासी दलों की नजर दलित वोटबैंक पर है. बीजेपी से लेकर सपा और कांग्रेस तक खुद को दलित हितैशी बताने में जुटे हैं. इस तरह सभी दलों की नजर आंबेडकर के बहाने उस बड़े वोटबैंक को साधने की है, जो बाबा साहेब को सियासी और समाजिक मसीहा मानते हैं. डॉ. आंबेडकर ने देश के दलित समुदाय को ही नहीं बल्कि शोषित और पीड़ितों को नई दिशा दिखाई और संविधान के जरिए सम्मान दिया.
यही वजह है कि अंबेडकर जयंती के बहाने देश के दलित और अतिपिछड़ों के वोटबैंक को साधने की रणनीति है. संसद से लेकर सड़क तक सियासी संग्राम छिड़ गया है, क्योंकि देश की सियासत में दलित समुदाय एक बड़ी ताकत है, जो सत्ता बिगाड़ने और बनाने की ताकत रखा है. इसीलिए कांग्रेस से लेकर बीजेपी और सपा ही नहीं सभी दल सियासी संदेश देने में जुटे हैं.
देश में दलित सियासत कितनी अहम है
2011 की जनगणना के मुताबिक देश में दलितों की आबादी करीब 16.63 फीसदी है, जो कुल जनसंख्या में 20.14 करोड़ दलित हैं. देश में अनुसूचित जातियां 1241 जातीय समूहों को बंटी हुई हैं. देश में 76.4 फीसदी दलित ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं और 23.6 फीसदी दलित शहरी इलाकों में रहते हैं. देश की कुल 543 लोकसभा सीट हैं. इनमें से 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं, लेकिन उनका सियासी प्रभाव 150 से ज्यादा सीटों पर है.
सीएसडीएस के आंकड़े के लिहाज से दलित बहुल लोकसभा सीटों का वोटिंग पैटर्न देखते हैं तो बीजेपी को 2024 में 31 फीसदी दलित वोट मिला. जबकि 2019 में यह आंकड़ा 34 फीसदी का था. बीजेपी 3 फीसदी कम वोट मिले और सहयोगी दलों को भी 2 फीसदी वोट मिले थे. कांग्रेस को इस बार 19 फीसदी दलित समाज ने वोट दिया है. कांग्रेस के सहयोगी को दलित वोटों का जबरदस्त फायदा मिला था, जिसमें खासकर सपा को. इसके चलते ही बीजेपी की सीटें घट गई हैं.
दलित बहुल 156 सीटों के नतीजे देखें तो विपक्षी गठबंधन ने 93 और एनडीए ने 57 सीटें जीतीं. दलित वोट वाली 156 सीटों में इस बार 2019 के मुकाबले विपक्ष को 53 सीटों का फायदा कराया और एनडीए को 34 सीट का नुकसान कराया. इससे पहले 2014 और 2019 में दलितों का एकमुश्त वोट बीजेपी को मिला था, जिसके चलते पीएम मोदी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल रहे.
आंबेडकर के सहारे कौन जीतेगा दलितों का दिल
2024 में संविधान और आरक्षण का नैरेटिव सेट करना कांग्रेस के अगुवाई वाले इंडिया गठबंधन का सफल रहा था, जिसके चलते दलित समाज बीजेपी से छिटक गया था. लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी संविधान की कापी लेकर वोट मांग रहे थे और बाद संसद में भी हाथ में संविधान लेकर विपक्ष के कई सांसदों ने शपथ ली थी. यही वजह है कि कांग्रेस डा. आंबेडकर की जयंती के बहाने दलित समाज के विश्वास को बनाए रखने की है.
आंबेडकर जयंती के बहाने कांग्रेस दलित वोट के बीच अपनी पैठ जमाने की कवायद में है, जिसके लिए आक्रमक रुख अख्तियार कर रखा है. इसकी वजह यह है कि बीजेपी की कोशिश कांग्रेस को आंबेडकर और दलित विरोधी कठघरे में खड़े करने की है. इस तरह बीजेपी और कांग्रेस दोनों की नजर दलित वोटबैंक पर है. इसीलिए कांग्रेस ने अपने सबसे बड़े दलित चेहरे मल्लिकार्जुन खरगे को आगे कर रखा है.
पंजाब-यूपी में दलित वोट कितने अहम फैक्टर
देश के 74 जिलों में दलित आबादी 25 फीसदी से भी ज्यादा है यानी हर चार वोटर में एक दलित है. उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के चुनाव में दलित मतदाताओं की काफी अहम भूमिका रहती है. दलितों की सियासी ताकत देखते हुए देश की सियासी पार्टियां उन्हें अपने पाले में लाने की कवायद में लगी रहती हैं.
दलित आबादी वाला सबसे बड़ा राज्य पंजाब है. यहां 31.9 फीसदी और उत्तर प्रदेश में करीब 20.7 फीसदी दलित आबादी है. इस तरह से दलित वोटर सत्ता का खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखता है और उसके लिए अंबेडकर किसी भगवान से कम नहीं है. दलित राजनीति की सबसे बड़ी प्रयोगशाला यूपी रही है, जहां बसपा का गठन कांशीराम ने किया. दलित वोटों के दम पर ही मायावती चार बार यूपी की मुख्यमंत्री रहीं. बसपा के राजनीतिक रूप से कमजोर होने के चलते दलित वोटों को साधने के लिए सपा से लेकर बीजेपी और कांग्रेस तक की नजर है.