मुस्लिम और ईसाई समुदाय के अनुसूचित जाति के स्टेटस को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया के पीठ ने अहम फैसला सुनाया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदू धर्म से कोई सिख धर्म या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करता है, तो उसे अनुसूचित जाति (दलित) का नहीं माना जाएगा.
पिछले साल आंध्र हाई कोर्ट में एक ईसाई पादरी के तरफ से एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज किए गए मामले की वैधता पर अप्रैल 2025 में फैसला आया था, जिसमें कहा कहा गया था कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई धर्म अपनाता है और उसका पालन करता है तो दलित समुदाय का नहीं माना जाएगा. इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और सर्वोच्च अदालत ने भी फैसले को बरकार रहा है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से साफ है कि कोई व्यक्ति दलित समुदाय का व्यक्ति इस्लाम या फिर ईसाई धर्म को अपनाता है तो सिर्फ एससी कैटेगिरी के आरक्षण से वंचित नहीं, बल्कि एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कानून के प्रावधानों का पात्र नहीं रह जाता है.
ऐसे में सवाल खड़ा हो गया है कि धर्मांतरण के बाद क्या जाति का सवाल खत्म हो जाता, क्योंकि भारत में ईसाई और इस्लाम धर्म में जाति व्यवस्था पूरी तरह हिंदू धर्म की तरह जस की तस बनी हुई है.
पहले जान लेते हैं कि मामला क्या है?
आंध्र प्रदेश के चिंथाडा आनंद पॉल नाम के एक व्यक्ति एक चर्च में पादरी के रूप में जुड़े थे, जो पहले हिंदू धर्म के दलित जाति से थे और बाद में ईसाई धर्म अपना लिया था. चिंथाडा आनंद ने अक्काला रामी रेड्डी पर मारपीट और जातिसूचक गालिंया देने के आरोप लगाते हुए एससी-एसटी एक्ट के तहत 2021 में मुकदमा दर्ज कराया था.
यह मामला बाद में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट तक पहुंचा और 30 अप्रैल 2025 को मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस हरिनाथ एन ने कहा कि ईसाई धर्म में जाति-व्यवस्था का कोई अस्तित्व नहीं है. अदालत ने फैसला सुनाया कि जैसे ही कोई व्यक्ति ईसाई धर्म में परिवर्तित होता है, उसी दिन वह अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय का सदस्य नहीं रह जाता. इसलिए, वह व्यक्ति एससी-एसटी एक्ट जैसे संरक्षण वाले कानून का सहारा नहीं ले सकता. इसी आधार पर अदालत ने आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया था.
आनंद पॉल ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन देश के सर्वोच्च अदालत ने भी आंध्र प्रदेश के हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने पर व्यक्ति का अनुसूचित जाति का दर्जा तत्काल प्रभाव से पूरी तरह खत्म हो जाता है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले प्रेसिडेंशियल ऑर्डर 1950 के पैरा 3 पर आधारित है. यही देश का कानून है. अदालत का काम केवल कानून की व्याख्या करना है. इसे साफ है कि किन्हें एससी माना जाएगा और किसे नहीं.
जाति व्यवस्था सभी धर्मों में विद्यमान
जाति व्यवस्था दक्षिण एशिया में सभी धर्मों मे विद्यमान हैं, चाहे सैद्धांतिक तौर पर वे जाति को न भी मानते हों. हिंदू धर्म से सिख और बौद्ध धर्म अपना चुके दलितों को एसी आरक्षण का लाभ और उन्हें हिंदू दलितों के तरह सभी सुविधाएं मिलती हैं, इस्लाम और ईसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को इससे महरूम रखा गया है. मुस्लिम और इसाई को सिर्फ आरक्षण ही नहीं बल्कि एससी-एसटी एक्ट से बाहर रखा गया है जबकि मुसलमान और ईसाई दोनों में धर्मांतरण के बाद भी जाति व्यवस्था जब की तस बनी हुई है.
अनुसूचित जाति के संदर्भ में 1950 भारत के राष्ट्रपति द्वारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत जारी किया गया एक महत्वपूर्ण आदेश है, जिसने यह तय किया कि किन जातियों को अनुसूचित जाति माना जाएगा और किन्हें नहीं. 341 के तहत राष्ट्रपति, जातियों, नस्लों, जनजातियों या जनजातियों के समूहों को एससी जाति में शामिल करने का निर्देश जारी कर सकते हैं. 1950 में इस अनुच्छेद के प्रावधानों का इस्तेमाल कर सिर्फ `अस्पृश्य और बहिष्कृत; हिंदुओं को ही अनुसूचित जातियों में शामिल किया गया था, जिन्हें आज दलित कहा जाता है.
ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी भेदभाव
सेंटर फ़ॉर पब्लिक इन्ट्रेस्ट लिटिगेशन ने इस्लाम और ईसाई धर्म अपनाने वाले दलित समुदाय के लोगों को अनुसूचित जातियों का लाभ न दिए जाने की लड़ाई सर्वोच्च अदालत में लड़ी, लेकिन सफलता नहीं मिली. ईसाई और मुसलमान बन जाने के बावजूद उनके साथ सामाजिक भेदभाव जारी है. ईसाई समुदाय के लिए अलग चर्च हैं तो मुस्लिम समुदाय में पसमांदा और अशराफ की अलग-अलग क़ब्रगाह हैं.
लंबे समय से इस तथ्य से इनकार करने के बाद कैथोलिक चर्च ने स्वीकार किया है कि दलित ईसाइयों के साथ भेदभाव होता है. ऐसे में इस्लाम और ईसाई धर्म में भी दलितों को बराबरी का हक़ दिलाने के लिए कई संगठन लंबे वक़्त से इस मुद्दे पर आंदोलन करते रहे हैं. उन्हीं में से एक नेशनल काउंसिल ऑफ दलित क्रिश्चियन है तो दूसरी तरफ मुस्लिम पसमांदा महाज है. हालांकि, मुसलमानों का सामंती वर्ग यह बात नहीं मानता और धार्मिक अस्मिता के सवाल पर ही अधिक फोकस करता है.
मुसलमान और ईसाइयों में उन्हें जाति के सवाल को स्वीकार करने का मतलब था वैचारिकी या धार्मिक तौर पर यह बात स्वीकार करना होता कि उनके समाजों में भी यह समस्या है. भारत में ईसाई समुदाय के अनेक धार्मिक नेताओं ने 1990 के बाद से इस बात को स्वीकार करना शुरू कर दिया था कि दलित ईसाई के प्रति चर्च में भी भेदभाव है, लेकिन मुसलमानों के ऊंची जातियों का नेतृत्व इसे बिल्कुल स्वीकार नहीं करना चाहता था.
हिंदुओं की तरह मुस्लिम में जाति व्यवस्था
ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के अध्यक्ष और पूर्व सांसद अली अनवर अंसारी aajtak.in बातचीत करते हुए कहते हैं कि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया था कि मुस्लिमों में भी जाति भेद है. मुस्लिम दलितों के साथ भी हिंदू दलितों की तरह भेदभाव होता है. मुस्लिम पसमांदा जाति के साथ कोई अशराफ मुस्लिम अपनी बेटी-बेटी की शादी तक नहीं करता, ये भेदभाव जाति के आधार पर है. मुस्लिमों में वैसी जाति व्यवस्था है, जैसे हिंदुओं में है. हिंदू में वर्ण व्यवस्था चार वर्ग में बंटी हुई है तो मुस्लिमों में वैसी ही स्थिति है.
अली अनवर कहते हैं कि मुसलमानों में दलित जाति आज भी वही काम कर रही है, जैसे हिंदुओं में करती है. भेदभाव भी वैसा ही हो रहा. अनुसूचित जातियों को मिलने वाले लाभ उन्हें भी मिलना चाहिए. रंगनाथ मिश्र आयोग ने कहा था कि 1950 में राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 341 के तहत जारी किए गए अध्यादेश में पैरा 3 को जोड़ कर जिस तरह दलित मुस्लिमों और ईसाइयों को अनसूचित जाति के दायरे से बाहर किया था, वह असंवैधानिक था.
वो ख़त्म होना चाहिए. प्रधानमंत्री मोदी भी कहते हैं कि मुस्लिमों को जाति व्यवस्था है, पसमांदा मुसलमानों का जिक्र करते हैं, लेकिन उन्हें न ही आरक्षण देना चाहते हैं और न ही एससी-एसी एक्ट के तहत इंसाफ. पूअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरएल फ्रांसिस अपने एक लेख में लिखते हैं कि हिंदू समुदायों के लोग जातिवादी व्यवस्था से विद्रोह कर ईसाइयत में आए हैं, लेकिन सच यह है कि उसके बाद उनका गैर-ईसाई दलितों के साथ कोई खास रिश्ता नहीं रहा.
ईसाई धर्म अपना कर भी दलित बने रहे
जातिवादी व्यवस्था और सामाजिक उत्पीड़न-शोषण से मुक्ति की उम्मीद में ही बड़ी संख्या में अनुसूचित जातियों के लोगों ने ईसाइ धर्म अपनाया. माना गया कि ईसाइयत में किसी भी प्रकार के जातिवादी भेदभाव या शोषण के लिए कोई स्थान नहीं है. वंचित वर्गों के बीच अपना आधार ही इस प्रलोभन के तहत बढ़ाया. ई
साई धर्म के बीच दलितों से मत परिवर्तित करके ईसाइयत अपनाने वाले लोगों के साथ समानता का व्यवहार किया जाएगा. ईसाई समाज में समानता के इस स्थान की झूठी आशा में ही दलितों ने ईसाई धर्म अपनाया, लेकिन चर्च नेतृत्व ने मुक्ति की आशा में आए लोगों को महज़ एक संख्या ही माना और उनके विकास पर ध्यान देने की जगह वह अपना साम्राज्य बढ़ाने में लगा रहा.
दलित और गैर-ईसाई दलितों के साथ कोई खास रिश्ता नहीं रहा. यहां तक कि उनकी पूजा-पद्धति, प्रतीक, रहन-सहन और जीवन जीने का ढंग सब बदल गया है. उनकी समस्याओं और तकलीफों को गैर-ईसाई दलितों के समान नहीं देखा जा सकता.
कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया ने 2016 में `पॉलिसी ऑफ दलित एम्पावरमेंट इन द कैथोलिक चर्च इन इंडिया` नाम से प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि दलित ईसाइयों के साथ अन्याय हो रहा है और चर्च में बदलाव की जरूरत है ताकि उन्हें पर्याप्त अधिकार दिए जा सकें. कैथोलिक चर्च भी दोहराता रहा कि हम लंबे समय से दलित ईसाइयों को अनुसूचित जातियों की श्रेणी में शामिल करवाने के लिए लड़ रहे हैं और यह उन्हें मिलना ही चाहिए.
कैसे मिलेगा ईसाई-मुस्लिम को दलित का दर्जा
इससे साफ है कि दलित समुदाय के ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी उनकी हालत जब की तस बनी हुई है. ऐसे में देश में जब तक 1950 के उस राष्ट्रपति आदेश में संशोधन नहीं किया जाता, जिसे नेहरू की कैबिनेट में पारित किया गया था या ईसाइयों और मुसलमानों को शामिल करने के लिए कोई नया कानून नहीं बनाया जाता, तब तक यह कानून बना रहेगा.
रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट से भी साबित हो चुकी है कि मुस्लिम समुदाय में बहुत विविधता है और कोई भी धर्म इस देश के अंदर एक समान नहीं है. सवाल है कि क्या किसी भी देश में नागरिकता के आधार पर लोगों को समान सुविधाएं नहीं मिलनी चाहिए? किसी बात पर केवल इसलिए बहस नहीं होनी चाहिए क्योंकि संविधान सभा में उसके ऊपर कोई चर्चा नहीं हुई? सामाजिक न्याय के लिए क्या धर्म बदल देने से इंसाफ की दरकार खत्म हो जाती है, क्योंकि ईसाई और मुस्लिम दलितों के साथ भी जाति भेदभाव खत्म नहीं हो पा रहा.
धार्मिक किताबों में लिखे से एक शब्द को भी नहीं बदला जा सकता, लेकिन संविधान लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार संशोधित होता रहा है. हो सकता है कि स्वाधीनता के समय दूसरे धर्मों मे दलितों के सवाल उतनी मजबूती से न उठे हों, क्योंकि विभाजन का मूल आधार तो धर्माधारित ही था.
सरकार ने तो साफ कह दिया है कि वह दलित क्रिश्चियन और दलित मुसलमानों को आरक्षण नहीं देना चाहती और उसके पीछे कारण साफ हैं. वह यह कि हिंदुत्व की लॉबी यह मानती है कि यदि धर्म के आधार पर आरक्षण हो गया तो धर्मांतरण की प्रक्रिया और तेज होगी. यही वजह है कि ईसाई और मुस्लिम दलित को हिंदू, सिख और बौद्ध दलितों से अलग रखा जाता है.