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RSS के कार्यक्रम में क्यों गए थे... सावरकर पर क्या सोचते थे? प्रणब मुखर्जी की डायरी के कुछ और पन्ने

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी की किताब चर्चा में है. शर्मिष्ठा ने बताया कि उनकी किताब में कांग्रेस नेता राहुल गांधी का जिक्र बहुत कम है. शर्मिष्ठा ने किताब में कहा, मेरे पिता (प्रणब) को लगता था कि उनके 'गैर-अधीनस्थ' रवैये के कारण राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया. पिता कहा करते थे कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ मेरा कार्यकाल अपने राजनीतिक जीवन का 'स्वर्णिम काल' रहा है.

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पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत प्रणब मुखर्जी. (File Photo)
पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत प्रणब मुखर्जी. (File Photo)

पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी की किताब 'प्रणब माई फादर ए डॉटर रिमेम्बर्स' चर्चा में है. इस किताब में शर्मिष्ठा ने प्रणब की राजनीतिक जिंदगी से जुड़े कई अहम पहलुओं का जिक्र किया गया है. किताब में शर्मिष्ठा ने यह भी बताया कि 2018 में प्रणब राष्ट्रीय स्वयं संघ के दफ्तर क्यों गए थे? साथ ही यह भी दावा किया कि प्रणब, वीर सावरकर को लेकर क्या सोचते थे?

बता दें कि शर्मिष्ठा मुखर्जी की यह किताब सोमवार को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की जयंती पर लॉन्च की गई है. इस कार्यक्रम में कांग्रेस नेता पी.चिदंबरम और भाजपा नेता विजय गोयल भी मौजूद रहे. किताब में प्रणब की डायरियों से संदर्भ लिए गए हैं. किताब में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बारे में भी जिक्र किया गया है. इस किताब के कुछ अंशों पर भी विवाद खड़ा हो गया है. शर्मिष्ठा ने यह भी कहा कि देश के राष्ट्रपति के रूप में उनके पिता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक टीम के रूप में काम किया. 

'मैं नहीं, देश दे रहा है RSS को स्वीकार्यता'

पूर्व नौकरशाह पवन के वर्मा के साथ पुस्तक पर बातचीत के दौरान शर्मिष्ठा ने अपने पिता के आरएसएस कार्यक्रम में हिस्सा लेने और विरोध करने के बारे में भी बात की. उन्होंने कहा, मैंने बाबा (पिता) से उनके फैसले पर तीन-चार दिनों तक लड़ाई की. एक दिन उन्होंने कहा, स्वीकार्यता मैं नहीं, बल्कि देश दे रहा है. बाबा को लगा कि लोकतंत्र संवाद पर आधारित है. यह विपक्ष के साथ बातचीत करने के बारे में है. बताते चलें कि प्रणब मुखर्जी 6 जून 2018 को RSS के कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शामिल होने के लिए नागपुर गए थे. इस बात पर शर्मिष्ठा ने एक्स पर पोस्ट कर ऐतराज जताया था. 

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'ऐसा नहीं है कि देश के प्रति भावना नहीं थी...'

प्रणब की वीर सावरकर के बारे में सोच को लेकर शर्मिष्ठा ने कहा, बाबा यह सोचते थे कि सिर्फ वीर सावरकर अंडमान की सेलुलर जेल में रहे. कई साल तक सजा काटी. वहां किस तरह उत्पीड़न किया जाता था. कई लोग पागल हो गए या आत्महत्या कर लेते थे. उस तरह के टॉर्चर की स्थिति में अगर कोई दया याचिका लिख भी देता है तो उसका मतलब यह कतई नहीं है कि देश के प्रति उनकी कोई भावना नहीं थी. इंदिरा गांधी जी ने भी इस बात को स्वीकार किया. इंदिराजी ने वीर सावरकर के नाम पर स्टाम्प निकाला. लेटर लिखा गया. यह एक नैरेटिव चलाया जाता है. एक तरफ बीजेपी बोलती है कि पंडित नेहरू का कोई योगदान नहीं था. दूसरी तरफ कांग्रेस कहती है कि वीर सावरकर को लेकर कहा जाता है कि वो कायर हैं. इस तरह की कहानियां गढ़ना देश के लिए ठीक नहीं हैं.

'दागी नेताओं को बचाने वाले अध्यादेश के खिलाफ थे प्रणब'

शर्मिष्ठा ने कहा, मेरे पिता भी उस प्रस्तावित अध्यादेश (दागी नेताओं को बचाने वाला) के विरोध में थे, जिसकी एक प्रति राहुल गांधी ने सितंबर 2013 में एक संवाददाता सम्मेलन में फाड़ दी थी, लेकिन उन्हें लगा कि इस पर संसद में चर्चा की जानी चाहिए. बाद में प्रस्तावित किया गया कि ऐसे दागी नेता हाई कोर्ट में अपील लंबित होने तक सदस्य के रूप में बने रह सकते हैं. शर्मिष्ठा ने कहा, मैं ही उन्हें (अध्यादेश फाड़ने की) खबर सुनाने वाली थी. वो बहुत गुस्से में थे.

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'प्रणब के कामकाज से प्रभावित रहती थीं इंदिरा गांधी'

राजनीति छोड़ने वाली शर्मिष्ठा ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने किसी के बारे में अपने पिता के विचारों को तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश नहीं की है. इंदिरा गांधी के साथ अपने संबंधों के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, मेरे पिता कहा करते थे कि इंदिरा गांधी का काल उनके राजनीतिक जीवन का स्वर्णिम काल था. इंदिराजी बाबा पर नजर रखती थीं. अगर कोई एक व्यक्ति था जिसके साथ मेरे पिता की वफादारी थी तो वो इंदिरा गांधी थीं और कोई नहीं. उन्होंने प्रणब के इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में आगे बढ़ने के बारे में भी बात की. उन्होंने कहा, यह एक दिन में नहीं हुआ और बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री (इंदिरा गांधी) उनके पिता के होमवर्क से कितनी प्रभावित रहती थीं.

'इमरजेंसी का किया बचाव'

उन्होंने कहा, असली जुड़ाव आपातकाल के बाद शुरू हुआ. वे हर सुख-दुख में उनके साथ खड़े रहे. उस दौरान कई दिग्गजों ने इंदिराजी को छोड़ दिया था. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उनके पिता उनके प्रति वफादार रहे. उन्होंने इमरजेंसी लगाए जाने का बचाव किया. उन्होंने कहा, उन परिस्थितियों पर भी गौर किया जाना चाहिए जिनके कारण यह हुआ. क्योंकि उस समय देश अराजकता की स्थिति में था. शर्मिष्ठा ने अपने पिता के आकलन को याद किया और कहा, उन्होंने गलती की और उन्हें इसका एहसास हुआ. अगर मुझमें राजनीतिक परिपक्वता होती तो जेपी और इंदिरा गांधी के बीच एक राजनीतिक बैठक आयोजित की जा सकती थी.

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'राजीव गांधी को लेकर क्या बोलीं शर्मिष्ठा?'

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद मां के उत्तराधिकारी के तौर पर राजीव पीएम बनाए गए थे. पूर्व नौकरशाह वर्मा ने प्रणब और राजीव गांधी के बीच 'विश्वास की कमी' के बारे में पूछा. शर्मिष्ठा ने कहा, कुछ लोगों ने ऐसी 'कहानियां गढ़ीं' कि उनके पिता राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनाए जाने के पक्ष में नहीं थे. उन्होंने कहा- 'बाबा के अनुसार, राजीव गांधी और बाबा के बीच गलतफहमी पैदा करने के लिए यह वास्तव में एक मनगढ़ंत कहानी थी. विश्वास की कमी का मुख्य कारण बाबा का कट्टर व्यक्तित्व और उनका गैर-आज्ञाकारी रवैया था. बाबा ने कहा कि राजीव ने मुझे अपने मंत्रिमंडल में ना लेकर सही किया था. क्योंकि मैं एक सख्त रवैये वाला हूं.

'पहले खुद की पार्टी बनाई, फिर कांग्रेस में वापसी'

इसके बाद वर्मा ने प्रणब को जनवरी 1986 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी से हटाए जाने और उसी साल कुछ महीने बाद कांग्रेस से निष्कासन के बारे में बातचीत की. शर्मिष्ठा ने याद किया कि उनके पिता निराश थे और उन्होंने राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का गठन भी किया था, लेकिन बाद में कांग्रेस में लौट आए. उन्होंने बताया कि कैसे उनके पिता पीवी नरसिम्हा राव कैबिनेट में शामिल नहीं किए जाने से नाराज हो गए थे, क्योंकि वो नरसिम्हा राव को अपना दोस्त मानते थे लेकिन उन्हें योजना आयोग के अध्यक्ष पद की पेशकश की गई थी.

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'मनमोहन मतभेदों को संभालना जानते हैं'

शर्मिष्ठा ने अपने पिता और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच कामकाजी संबंधों के बारे में भी चर्चा की. उन्होंने कहा, डॉ. मनमोहन सिंह ने अनुकरणीय शिष्टाचार दिखाया और उन दोनों के बीच गहरा पारस्परिक सम्मान था. वे जानते थे कि मतभेदों को कैसे संभालना है. कांग्रेस शासन के दौरान मुखर्जी के पास प्रमुख विभाग थे. उनके पास रक्षा, विदेश मामले और वित्त का प्रभार था.

'हामिद अंसारी की जीत की संभावनाएं तलाश रही थीं सोनिया'

वर्मा ने शर्मिष्ठा से पूछा कि क्या मुखर्जी राष्ट्रपति पद के लिए पहली पसंद हैं. उन्होंने कहा, मुझे नहीं पता कि वो पहली पसंद थे, दूसरी पसंद थे या तीसरी पसंद थे. लेकिन बाबा की डायरी से मुझे पता चला कि श्रीमती गांधी, हामिद अंसारी जी की संभावना और जीतने की संभावना तलाश रही थीं.

शर्मिष्ठा ने पुस्तक की आलोचना पर प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा, किसी भी वरिष्ठ नेता ने इस पुस्तक पर बात नहीं की है, सिर्फ पृथ्वीराज चव्हाण ने कहा है कि वो इस पर टिप्पणी नहीं कर सकते, क्योंकि उन्होंने इसे नहीं पढ़ा है. शर्मिष्ठा ने कहा कि कांग्रेस नेताओं में सिर्फ चिदंबरम ही कार्यक्रम में पहुंचे, इससे उन्हें दुख हुआ है. 

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