
हर साल केंद्र सरकार बेंगलुरु के टेक कर्मचारियों, मुंबई के व्यापारियों और गुरुग्राम के सैलरीड प्रोफेशनल्स से इनकम टैक्स और कॉरपोरेट टैक्स के रूप में लाखों करोड़ रुपये वसूलती है. इसके बाद यह पैसा राज्यों में बांट दिया जाता है. बात सीधी लगती है.
लेकिन असली ट्विस्ट यहीं है. वित्त वर्ष 2025-26 में अरुणाचल प्रदेश का एक निवासी इस टैक्स पूल से औसतन 1,17,705 रुपये पाएगा, जबकि हरियाणा के एक व्यक्ति को सिर्फ 3,997 रुपये मिलेंगे यानी 29 गुना का फर्क.
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पिछले साल के केंद्रीय बजट में 28 राज्यों को 9.27 लाख करोड़ रुपये बांटने का प्रस्ताव है. जनसंख्या के हिसाब से उत्तर प्रदेश (करीब 20 करोड़ आबादी) को सबसे ज्यादा यानी 1.66 लाख करोड़ रुपये मिल रहे हैं. इसमें कोई हैरानी नहीं. लेकिन जैसे ही आंकड़ों को पलटकर देखा जाए कि हर नागरिक को असल में कितना पैसा मिल रहा है, तभी तसवीर पूरी तरह बदल जाती है.
देश की सिर्फ 4 फीसदी आबादी वाले आठ पूर्वोत्तर राज्यों को प्रति व्यक्ति सबसे ज्यादा हिस्सा मिल रहा है. इसमें अरुणाचल प्रदेश सबसे ऊपर है. यहां सिक्किम को प्रति व्यक्ति 58,878 रुपये और मिजोरम को 42,259 रुपये मिल रहे.
वहीं आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों में प्रति व्यक्ति की बात करें तो महाराष्ट्र में 5,212 रुपये, गुजरात 5,335 रुपये और तमिलनाडु में 5,242 रुपये मिलते हैं. ये सब सूची के निचले पायदान पर हैं. यह कोई सिस्टम की खामी नहीं है. यह वही फॉर्मूला है, जो जानबूझकर ऐसा बनाया गया है.
यह कोई खामी नहीं है. यह वही फार्मूला है, जो बिल्कुल उसी तरह काम कर रहा है जैसा उसे बनाया गया था. हर पांच साल में राज्यों को मिलने वाले हिस्से तय करने वाला वित्त आयोग जानबूझकर वितरण को गरीब और दूर-दराज के राज्यों के पक्ष में झुकाता है. इसमें जनसंख्या का वेटेज 15 प्रतिशत है, जबकि इनकम डिस्टेंस यानी किसी राज्य की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कितनी कम है, इसका वेटेज 45 प्रतिशत रखा गया है. इसके अलावा वन क्षेत्र, जनसांख्यिकीय प्रदर्शन और यहां तक कि टैक्स जुटाने की कोशिश (टैक्स एफर्ट) को भी अलग-अलग वेटेज दिए गए हैं.
इसका नतीजा यह है कि बिहार, जो देश का सबसे गरीब बड़ा राज्य है, उसे 93,255 करोड़ रुपये मिलते हैं जो कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों को मिलाकर भी ज़्यादा है. मध्य प्रदेश को 72,783 करोड़ रुपये मिलते हैं. ये वो राज्य हैं जहां पैसों की जरूरत ज्यादा है, जहां सड़कें और स्कूल कम खर्च में बनते हैं और जहां विकास की कमी सबसे गहरी है.
आलोचक इसे सफलता की सजा कहते हैं. उनका सवाल है कि जब महाराष्ट्र देश की जीडीपी में करीब 15% योगदान देता है, तो उसे टैक्स में सिर्फ 6.3% हिस्सा क्यों? हरियाणा, जिसकी प्रति व्यक्ति आय सबसे ज्यादा है, उसे सबसे कम क्यों?

वहीं समर्थक संविधान की बात करते हैं. संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत वित्त आयोग का काम ही है राज्यों के बीच असमानता को कम करना. आजादी के समय भारत ने खुद को एक रीडिस्ट्रिब्यूटिव फेडरेशन चुना था जहां अमीर राज्यों का पैसा गरीब राज्यों तक पहुंचे. आज का फॉर्मूला उसी सोच को लागू करता है.
आंकड़े तेज़ी से बढ़े हैं. साल 2015-16 में राज्यों को 2.3 लाख करोड़ रुपये मिले थे. एक दशक में यह रकम चार गुना हो चुकी है. हर राज्य को कुल मिलाकर पहले से ज़्यादा पैसा मिल रहा है. केक बड़ा हुआ है, भले ही किसी का टुकड़ा छोटा लगे. फिर भी, असमानता बनी हुई है. और जैसे-जैसे दक्षिणी राज्य अमीर होते जाएंगे और उत्तरी राज्यों की आबादी बढ़ती जाएगी, यह टकराव और तेज होगा.
इस वक्त बैठा 16वां वित्त आयोग उसी पुराने, मुश्किल सवाल से जूझ रहा है. जब सबको लगता है कि उसे ज़्यादा मिलना चाहिए, तब केक कैसे बांटा जाए?
फिलहाल, पैसा बह रहा है, हैदराबाद के आईटी पार्कों से लेकर असम के चाय बागानों तक. मुंबई के ट्रेडिंग फ्लोर से मणिपुर के धान के खेतों तक. फॉर्मूला चलता रहता है, ट्रांसफर होते रहते हैं और 9.27 लाख करोड़ रुपये हर साल इधर-उधर होते हैं जो दुनिया की सबसे बड़ी वार्षिक धन पुनर्वितरण प्रक्रियाओं में से एक है.
यह सही है या गलत, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस राज्य से हैं.